खेलों की दुनिया में अक्सर हम उन्हीं चेहरों को देखते हैं जो टीवी और विज्ञापनों में छाए रहते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के रायपुर, जगदलपुर और सरगुजा में इस समय कुछ ऐसा हो रहा है जो भारतीय खेल इतिहास की एक नई इबारत लिख सकता है। २५ मार्च से ६ अप्रैल २०२६ तक चलने वाले पहले ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स’ केवल एक प्रतियोगिता नहीं बल्कि उस ८.६ प्रतिशत आबादी की प्रतिभा का उत्सव है जिसे अब तक मुख्यधारा के खेल तंत्र ने लगभग भुला ही दिया था।
छोटा बजट और बड़ा कलेजा
टिकेश्वर ध्रुव की कहानी इस आयोजन का असली चेहरा है। रायपुर के एक साधारण परिवार से आने वाले इस १६ साल के लड़के के पास न तो कोई महँगा जिम था और न ही कोई बड़ी स्कॉलरशिप। लेकिन छत्तीसगढ़ की लाल मिट्टी में उसने जो पसीना बहाया है उसका नतीजा आज भारोत्तोलन के अखाड़े में साफ़ दिख रहा है। टिकेश्वर जैसे २,३०० से अधिक खिलाड़ी यहाँ सात अलग-अलग खेलों में अपना दम दिखा रहे हैं। एथलेटिक्स, तीरंदाजी, फुटबॉल, हॉकी, तैराकी और कुश्ती के साथ-साथ मल्लखंभ और कबड्डी को भी इसमें शामिल किया गया है जो हमारी जड़ों से जुड़े खेल हैं।
इतिहास और भूगोल का खेल
यह आयोजन उन क्षेत्रों पर केंद्रित है जहाँ खेल रगों में दौड़ता है। छत्तीसगढ़ की ३२ प्रतिशत आबादी जनजातीय है। वहीं झारखंड और पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे मेघालय और मिजोरम में यह संख्या और भी अधिक है। इन समुदायों की जीवनशैली ऐसी रही है कि शारीरिक दमखम उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। खेती, शिकार और पहाड़ों पर चढ़ना-उतरना उनके लिए किसी ट्रेनिंग से कम नहीं रहा। बस कमी थी तो एक सही रास्ते की। अब कोशिश यह है कि बस्तर के तीरंदाजों और सरगुजा के पहलवानों को वह मंच मिले जहाँ से वे सीधे ओलंपिक का सपना देख सकें।
शब्दों का बोझ और पहचान की लड़ाई
समाजशास्त्रीय नज़रिए से देखें तो ‘ट्राइबल’ शब्द अपने साथ एक औपनिवेशिक बोझ लेकर चलता है। अंग्रेज़ों ने इस शब्द का इस्तेमाल उन लोगों को बाँटने के लिए किया था जिन्हें वे ‘असभ्य’ मानते थे। आज भी हम उसी शब्द का इस्तेमाल प्रशासनिक मजबूरी के कारण कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि गोंद, संथाली, भील और मुंडा जैसे समुदायों के पास अपना एक समृद्ध इतिहास और शासन व्यवस्था रही है। इन खेलों का एक मकसद इस पुरानी छवि को तोड़ना भी है। यह केवल दौड़ने या जीतने की बात नहीं है बल्कि अपनी पहचान को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश है।
महिला शक्ति और समाज का ढांचा
इन खेलों में भाग ले रही महिला खिलाड़ियों की स्थिति देश के बाकी हिस्सों से थोड़ी अलग और बेहतर है। पूर्वोत्तर की खासी और जयंतिया जैसी जातियाँ मातृसत्तात्मक समाज का हिस्सा हैं। यहाँ महिलाओं को घर और समाज में बड़े फैसले लेने का हक़ है। इसलिए जब कोई लड़की मैदान पर उतरती है तो उसे अक्सर अपने ही परिवार से नहीं लड़ना पड़ता। उनके लिए बाधाएँ बाहरी हैं जैसे अच्छे कोच की कमी या ट्रेनिंग सेंटर का दूर होना। अगर हम इन महिलाओं को सही बुनियादी सुविधाएँ दें तो मणिपुर की मुक्केबाज़ी और झारखंड की तीरंदाजी जैसी मिसालें हर ज़िले से निकल सकती हैं।
सिस्टम की सुस्ती और मीडिया का रुख
सरकार ने २०२६ के इन खेलों को ‘विकसित भारत’ के एजेंडे से जोड़ा है। खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के केंद्रों से जोड़ने की बात कही है। योजना कागज़ों पर तो बहुत अच्छी लगती है पर ज़मीन पर इसे उतारना एक चुनौती है। अक्सर देखा गया है कि खिलाड़ी जूनियर स्तर पर तो पदक जीत लेते हैं लेकिन बाद में फंड या नौकरी की कमी के कारण गुमनाम हो जाते हैं। एक और कड़वी सच्चाई यह भी है कि रायपुर के इन मैदानों पर देश के बड़े खेल पत्रकारों की भीड़ नहीं है। शायद मीडिया को अभी भी इन कहानियों में वह ‘ग्लैमर’ नहीं दिखता जो क्रिकेट या बड़े सितारों में है।
भविष्य की ओर एक कदम
बाईचुंग भूटिया और पुलेला गोपीचंद जैसे दिग्गजों ने हमेशा माना है कि भारत के पास प्रतिभा की कमी नहीं है बल्कि उस प्रतिभा को सहेजने वाले तंत्र की कमी है। यह आयोजन एक शुरुआत है। भले ही इसमें कुछ कमियाँ हों या इंतज़ाम उतने भव्य न हों पर यह एक दरवाज़ा खोलता है। अब यह देखना है कि क्या यह सिलसिला २०२६ के बाद भी जारी रहता है। असली सफलता तब मानी जाएगी जब आज जगदलपुर में खेलने वाला खिलाड़ी २०२८ या २०३२ के ओलंपिक में तिरंगा लहराएगा। फ़िलहाल तो यह मौका है उन आँखों की चमक देखने का जिन्होंने पहली बार खुद को किसी बड़े पोस्टर पर देखा है।


