सोचो एक परिवार है जिनके घर में 5-6 सदस्य रहते हैं। बस इतनी बात सुनकर ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आज के समय में घर चलाना कितना मुश्किल है।

अगर आप शहर में हो, तो यह मुश्किल और बढ़ जाती है। शहर में रहना बड़ी बात नहीं, लेकिन शहर में घर चलाना, बच्चों की परवरिश करना और बाकी ज़िम्मेदारियां संभालना  यह सब मिलकर एक टेंशन बना देते हैं जो हमेशा पीछे चलती रहती है।

इस टेंशन से थोड़ी राहत पाने का एक ज़रिया है इंश्योरेंस। हम सबने यह नाम कई बार सुना है। एक ऐसी चीज़ जो हमारी सेविंग्स को सहारा दे सकती है, अगर कभी भविष्य में अचानक ज़रूरत आ पड़े तो हमारी जमा पूंजी हमारे काम आ सके।

लेकिन भारत में इंश्योरेंस पॉलिसी को लेकर लोगों का भरोसा जितना होना चाहिए, उतना है नहीं। कई पॉलिसियां खास तौर पर मिडिल क्लास के लिए बनाई गई हैं, लेकिन सवाल यह है कि मिडिल क्लास के लोगों ने उन्हें खरीदा कितना है?

वजह समझना मुश्किल नहीं। जिस तरह के स्कैम और गलत तरीके से बेचा जाना इंश्योरेंस इंडस्ट्री में आम हो गया है, उससे मिडिल क्लास इंसान डर जाता है कहीं उसकी मेहनत की जमा पूंजी भी हाथ से न निकल जाए।

यह डर बिना वजह नहीं है। आंकड़े खुद इस बात की गवाही देते हैं। लाइफ इंश्योरेंस का कवरेज वित्त वर्ष 2025 में 2.8% से घटकर 2.7% रह गया, जबकि नॉन-लाइफ इंश्योरेंस भी फ्लैट ही रहा। यह तब है जब इंश्योरेंस कंपनियां कमीशन पर खर्चा कम नहीं कर रहीं पिछले साल लाइफ इंश्योरर्स ने 18% ज़्यादा कमीशन दिया, जबकि प्रीमियम सिर्फ 6.7% बढ़ा।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पहले साल का कमीशन जो नए ग्राहक लाने पर मिलता है  40% बढ़ गया, जबकि पुराने ग्राहकों को रिन्यू करवाने वाला कमीशन सिर्फ 9% बढ़ा। इसका सीधा मतलब है: एजेंट्स का पूरा फोकस नए लोगों को जैसे-तैसे बेच देना है, न कि उन्हें सही ज़रूरत के हिसाब से सही पॉलिसी देना।

हेल्थ इंश्योरेंस में भी यही कहानी है। प्राइवेट हेल्थ पॉलिसीज़ में कमीशन का हिस्सा लगभग 25% तक जाता है। यानी जितना पैसा आप प्रीमियम में देते हैं, उसका बड़ा हिस्सा एजेंट की जेब में जाता है सर्विस या सुटेबिलिटी की परवाह किए बिना।

इसी वजह से शिकायतें भी तेज़ी से बढ़ रही हैं। लाइफ इंश्योरेंस में गलत तरीके से बेचने (मिस-सेलिंग) की शिकायतें 14% बढ़ी हैं। जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस में तो यह आंकड़ा 45% तक पहुंचा, और इनमें से दो-तिहाई शिकायतें क्लेम से जुड़ी थीं।

असली परीक्षा वहीं होती है जब क्लेम का वक़्त आता है। कई बार पॉलिसीहोल्डर को तब पता चलता है कि उनका केस अंडरराइट ही क्लेम के वक़्त हुआ, सेल के वक़्त नहीं। मतलब रिस्क चेक करना जब ग्राहक पैसा दे रहा था तब नहीं हुआ, बल्कि जब उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तब हुआ। यही वजह है विवाद और भरोसे की कमी की।

लेकिन बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। रेगुलेटर IRDAI ने एक ज़रूरी कदम उठाया है 1 जनवरी, 2027 से हर इंश्योरेंस पॉलिसी उस इंसान से डिजिटली टैग होगी जिसने असल में वह पॉलिसी बेची। बैंक या कॉर्पोरेट एजेंट नहीं, बल्कि वही व्यक्ति जिसने आपसे बात की और आपको कन्विंस किया।

यह कुछ वैसा ही है जैसे हम उबर ड्राइवर या डिलीवरी बॉय को रेटिंग देते हैं। अब एजेंट भी अनाम नहीं रहेगा उसका काम ट्रेसेबल होगा, और गलत करने वाले एजेंट्स को ढूंढना आसान हो जाएगा।

यह बदलाव अकेला नहीं है। कुछ ऐसा ही सफर म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री ने भी तय किया था। एक वक़्त था जब म्यूचुअल फंड्स भी कॉम्प्लिकेटेड और अनट्रस्टेड प्रोडक्ट समझे जाते थे। रेगुलेटर ने 15 साल तक काम किया, प्रोडक्ट को रिटेल-रेडी बनाया, तब जाकर “म्यूचुअल फंड सही है” कैंपेन आया और आज SIP एक घर-घर का नाम बन चुका है।

इंश्योरेंस इंडस्ट्री भी अब वही सफर शुरू कर रही है  प्रोडक्ट को साफ करना, सही डिस्क्लोज़र देना, और सेलर्स को अकाउंटेबल बनाना। इसमें थोड़ा वक़्त लगेगा, लेकिन अगर यह सही दिशा में चला तो इंश्योरेंस भी एक दिन उतना ही भरोसेमंद बन सकता है जितना आज SIP है।

इंश्योरेंस को कभी भी बोझ या डर की तरह नहीं देखना चाहिए। यह एक ज़िम्मेदारी है अपने परिवार के लिए, अपने बच्चों के लिए, और उस अचानक आने वाले कल के लिए जिसका कोई भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता।

जैसे गाड़ी में बैठते ही हम बिना सोचे सेफ्टी बेल्ट लगाते हैं बस एक एहतियात के तौर पर वैसे ही इंश्योरेंस भी हमारी ज़िंदगी का वही सेफ्टी बेल्ट है। उम्मीद है कि इससे कभी ज़रूरत न पड़े, लेकिन अगर ज़रूरत आ गई, तो यही बेल्ट हमें और हमारे परिवार को संभाल लेगी।

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