कल्पना करो, स्वतंत्रता दिवस का दिन है। हर दुकान, हर घर भारतीय तिरंगा लहरा रहा है। वो केसरिया, सफेद, और हरा रंग। ये सिर्फ़ कपड़ा नहीं, भारत की धड़कन है, हर भारतीय की शान है। लेकिन क्या तुम्हें पता है इस तिरंगे को किसने बनाया? चलो, मैं तुम्हें बताता हूँ पिंगली वेंकैया की कहानी, वो शख़्स जो पिंगली वेंकैया भारतीय ध्वज डिज़ाइनर के नाम से जाना जाता है। आंध्र के एक छोटे से गाँव का वो नौजवान, जिसने बड़ा सपना देखा। वो सिर्फ़ स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। वो एक विद्वान थे। एक सपने देखने वाले, जिन्होंने भारत की पहचान को रंग दिया। ये उनकी कहानी है, और यक़ीन मानो, इसे सुनना और उनके बारे में जानना ज़रूरी है!
सपनों भरा बचपन
पिंगली वेंकय्या का जन्म 1876 या 1878 में हुआ, आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम के पास भटलापेनुमारु गाँव में। तेलुगु ब्राह्मण परिवार में पले-बढ़े, वो बचपन से ही सवाल पूछने और नई जानकारी जुटाने के इच्छुक थे। हमेशा कुछ न कुछ नया सीखते थे। 19 साल की उम्र में वो ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और दक्षिण अफ्रीका भेझे गए, जहाँ दूसरा बोअर युद्ध चल रहा था। वहाँ उन्होंने देखा कि भारतीय सैनिक ब्रिटिश यूनियन जैक को सलामी दे रहे हैं। ये बात उन्हे चुभ गई। वो सोच में पड़ गए की हमारा झंडा कहाँ है? हमारा अपना झंडा होना चाहिए। यहीं से उनका वो सपना शुरू हुआ जिसने भारत को अपनी गरिमा दी, भारतीय तिरंगा। और हाँ, यहीं उनकी मुलाक़ात हुई महात्मा गांधी से, जिससे आगे चलकर उनकी ज़िंदगी बदल गई।
कई हुनर, कई नाम
वेंकैया कोई साधारण इंसान नहीं थे। वो जापानी और उर्दू जैसी भाषाएँ धड़ल्ले से बोलते थे। 1913 में, बापटला में उन्होंने जापानी में पूरा भाषण दिया। लोग हैरान रह गए, और उन्हे ‘जापान वेंकैया’ का नाम मिला। वेंकैया ने मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से भूविज्ञान पढ़ा, कपास की किस्मों पर शोध किया, जिससे उन्हे ‘पट्टी (कपास) वेंकय्या’ कहा गया। हीरे की खदानों में भी वो माहिर थे, इसलिए उनको ‘डायमंड वेंकय्या’ नाम से भी पुकारा जाने लगा। उन्होंने आंध्र नेशनल कॉलेज में पढ़ाया, और पत्थरों पर किताब लिखी, थल्ली रायी। वेंकैया अपने आप में चलते-फिरते विश्वकोश थे।
अपने झंडे का सपना
1906 में, वेंकैया कलकत्ता में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सत्र में गए। वहाँ कांग्रेस की सभाओं में ब्रिटिश झंडा देखकर उसका खून खौल उठा। भारत को अपना प्रतीक चाहिए था, जिसे हम गर्व से अपना कह सकें। उन्होंने दुनिया भर के झंडों का अध्ययन शुरू किया। 1916 तक, वेंकैया ने भारत के लिए एक ‘राष्ट्रीय ध्वज’ नाम की किताब लिख डाली, जिसमें 30 डिज़ाइन थे। हर डिज़ाइन में भारत की संस्कृति और इतिहास की झलक थी। 1918 से 1921 तक, वो मछलीपट्टनम में पढ़ाते हुए कांग्रेस को अपने आइडिया बताते रहे। वो सिर्फ़ सपना नहीं देख रहे थे, वो एकजुट भारत की नींव रख रहे थे।
तिरंगे का जन्म
1921 में, गांधी जी विजयवाड़ा आए। उन्होंने वेंकय्या से कहा, “स्वराज आंदोलन के लिए एक झंडा बनाओ। कर सकते हो?” वेंकैया ने पलक भी नहीं झपकी। तीन घंटे में, उन्होंने खादी के कपड़े पर डिज़ाइन बनाया… हिंदुओं के लिए लाल, मुस्लिमों के लिए हरा। गांधी जी को झंडे का डिजाइन पसंद आया, लेकिन उन्होंने एक सुझाव दिया… बाकी समुदायों के लिए सफेद पट्टी डालो… एकता के लिए। उसके बाद इसी झंडे को स्वराज झंडे का रूप में अपनाया गया। ये कांग्रेस की सभाओं में लहराने लगा। 1931 में, लाल रंग केसरिया हो गया, और पट्टियों का क्रम बदला… केसरिया, सफेद, हरा। बीच में रखा गया चरखा, आत्मनिर्भरता का प्रतीक। 22 जुलाई 1947 को, संविधान सभा ने चरखे की जगह अशोक चक्र डालकर इसे अपनाया। बस, फिर क्या था तिरंगा बन गया! इस तरह वेंकैया की कलाकारी ने भारतीय तिरंगे का निर्माण किया।
सादगी में छिपा नायक
वेंकैया ने गांधी जी की तरह सादा जीवन जिया। लेकिन शायद ज़िंदगी को कुछ और ही मंजूर था। इतना बड़ा योगदान देने के बावजूद, वो अपनी जिनदी के आखिरी सालों में भी ग़रीबी में ही रहे। 1963 में उनका निधन हुआ। उनकी आखिरी इच्छा थी कि उन्हे, उनके बनाए तिरंगे में लपेटा जाए। दुख की बात यह है की, उनका नाम सालों तक गुमनामी में रहा। उनकी बेटी, घंटसाला सीता महालक्ष्मी, 100 साल तक जी, और 2022 में चली गई। वेंकैया ने कभी शोहरत नहीं माँगी। उन्होंने भारत के लिए मिशन चुना। हर बार जब तिरंगा लहराता है, तो वो उनका दिल है, जो भारत के लिए धड़कता है।
देर से मिली पहचान
वेंकैया को याद करने में वक़्त लगा। 2009 में, भारत ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। 2014 में, विजयवाड़ा के ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन को उनका नाम मिला, और उनकी मूर्ति भी लगी। 2012 में, आंध्र प्रदेश ने उन्हें भारत रत्न देने की सिफारिश की, पर सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर भी, उनके गाँव में पिंगली वेंकैया भवन उनकी कहानी को ज़िंदा रखता है। आंध्र में उनकी मूर्तियाँ हर जगह हैं। और हर घर तिरंगा जैसी मुहिम ये दिखाती हैं कि उनका झंडा आज भी गर्व जगाता है।
वेंकय्या आज भी प्रेरणा हैं
पिंगली वेंकैया, भारतीय ध्वज डिज़ाइनर, ने हमें सिर्फ़ एक झंडा नहीं दिया। उन्होंने भारत की आत्मा दी। केसरिया साहस का, सफेद सत्य का, हरा समृद्धि का, और अशोक चक्र धर्म का प्रतीक है। उनकी ज़िंदगी जुनून, दिल, और चुपके से देशप्रेम की कहानी है। वो सुर्खियों के पीछे नहीं भागे। उन्हे भारत की फ़िक्र थी। अगली बार जब तिरंगा हवा में लहरे, भटलापेनुमारु के उस नौजवान को याद करो। वेंकैया ही एक मात्र हैं जिनकी वजह है हमारे पास अपना झंडा है। उनकी कहानी को ज़िंदा रखें, क्योंकि ऐसे नायक हमेशा याद किए जाने चाहिए।


