हर साल श्रावण पूर्णिमा आते ही वही तीन कहानियां दोबारा घूमने लगती हैं। कृष्ण-द्रौपदी का किस्सा, रानी कर्णावती और हुमायूं का प्रसंग, और राखी को लेकर तरह-तरह के दावे। मुश्किल यह है कि ज्यादातर लोग इन तीनों को एक ही तराजू में तौल देते हैं, यानी “इतिहास” मानकर आगे बढ़ जाते हैं। जबकि असलियत में इनमें से हर कहानी की अपनी अलग जमीन है, कोई पौराणिक है, कोई लोककथा, और कोई ऐसी जिस पर इतिहासकार खुद बंटे हुए हैं।

शुरुआत करते हैं सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा सुनी जाने वाली कहानी से। महाभारत में एक प्रसंग आता है जहां भगवान कृष्ण की उंगली कट जाती है और द्रौपदी अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उस पर बांध देती हैं। बदले में कृष्ण उन्हें रक्षा का वचन देते हैं, और आगे चलकर चीरहरण के समय वही वचन निभाते भी हैं। यह घटना पूरी तरह महाकाव्य यानी इतिहास-पुराण की परंपरा का हिस्सा है। इसका मतलब यह नहीं कि यह झूठ है, बल्कि इसका मतलब यह है कि इसे इतिहास की उस कसौटी पर नहीं परखा जा सकता जिस पर हम किसी राजा या तारीख को परखते हैं। यह श्रद्धा और नैतिक शिक्षा की कथा है, पुरातात्विक दस्तावेज नहीं। दिलचस्प बात यह है कि मूल महाभारत में इसे सीधे “रक्षाबंधन” के नाम से नहीं जोड़ा गया है, यह जुड़ाव सदियों बाद लोक-परंपरा में बना।

अब बात करते हैं उस कहानी की जो स्कूली किताबों से लेकर टीवी चैनलों तक हर जगह “इतिहास” की तरह पढ़ाई जाती है, यानी रानी कर्णावती और हुमायूं का प्रसंग। कहा जाता है कि सन 1535 के आसपास जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला किया, तब मेवाड़ की विधवा रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर भाई मानते हुए मदद मांगी। कहानी आगे यह भी कहती है कि हुमायूं सेना लेकर निकला भी, लेकिन तब तक चित्तौड़ पर कब्जा हो चुका था।

यहीं पर पेच फंसता है। हुमायूं के दौर के सबसे भरोसेमंद स्रोत माने जाने वाले दस्तावेज, जैसे उसकी बहन गुलबदन बेगम की लिखी “हुमायूंनामा”, में इस राखी वाले प्रसंग का कोई सीधा उल्लेख नहीं मिलता। यह कहानी पहली बार सैकड़ों साल बाद के राजस्थानी भाट-चारण साहित्य और औपनिवेशिक काल की किताबों में विस्तार से सामने आती है, जब तक तथ्य और मौखिक परंपरा आपस में काफी घुल-मिल चुके थे। इसका यह अर्थ नहीं कि यह घटना कभी हुई ही नहीं, बल्कि यह कि इसके पीछे कोई पुख्ता समकालीन प्रमाण नहीं है। इतिहासकार इसे ज्यादातर “किंवदंती” या “लोक-स्मृति” की श्रेणी में रखते हैं, न कि प्रमाणित इतिहास की। यानी यह कहानी मिथक और इतिहास के ठीक बीच की जगह पर खड़ी है, जो शायद इसे इतना दिलचस्प भी बनाती है।

तो फिर असली, प्रमाणिक रूप से पुरानी परंपरा क्या है? इसका जवाब राखी नहीं, बल्कि “रक्षासूत्र” में छिपा है। वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में श्रावण पूर्णिमा के दिन पुरोहित और गुरु अपने यजमानों और शिष्यों की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा का उल्लेख मिलता है, जिसका मकसद सुरक्षा और आशीर्वाद दोनों था। भविष्य पुराण में भी इस दिन का धार्मिक महत्व दर्ज है। शुरुआत में इसका सीधा संबंध भाई-बहन से नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य और पुरोहित-यजमान जैसे रिश्तों से ज्यादा था। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक बनने की यात्रा धीरे-धीरे, कई सदियों में, अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराओं के घुलने-मिलने से हुई।

तो असल सच यह है कि रक्षाबंधन एक ही कहानी नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग तरह के सच का मेल है। एक तरफ शास्त्रों में दर्ज रक्षासूत्र की धार्मिक परंपरा है, जिसकी जड़ें सबसे पुरानी और सबसे पुख्ता हैं। दूसरी तरफ कृष्ण-द्रौपदी जैसी पौराणिक कथाएं हैं, जो श्रद्धा और मूल्यों की भाषा में बात करती हैं। और तीसरी तरफ कर्णावती-हुमायूं जैसी कहानियां हैं, जो लोक-स्मृति और आंशिक इतिहास के धुंधले मेल से बनी हैं।

इसमें बुरा कुछ नहीं है। हर संस्कृति अपने त्योहारों को कहानियों से सजाती है, और यही कहानियां उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिंदा रखती हैं। बस इतना समझना जरूरी है कि धर्मशास्त्र, पुराण और लोककथा तीनों अलग विधाएं हैं, और इन्हें एक ही तराजू में तौलना कहानी के साथ भी नाइंसाफी है और इतिहास के साथ भी। अगली बार जब कोई कर्णावती और हुमायूं की कहानी सुनाए, तो उसे सिरे से खारिज करने की जरूरत नहीं, बस इतना याद रखिए कि यह किस्सा दिल के ज्यादा करीब है, दस्तावेजों के उतना नहीं। और यही बात राखी के उस कच्चे धागे को और खूबसूरत बना देती है, जो बिना किसी सर्टिफिकेट के आज भी हर कलाई पर उतनी ही मजबूती से बंधा मिलता है।

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