आज पूरे देश में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जा रहा है। दफ्तरों में इनडोर खेल प्रतियोगिताएं हो रही हैं, कॉलेजों में फिटनेस कैंप लग रहे हैं, और सोशल मीडिया हैशटैग से भरा पड़ा है।
यूजीसी ने देश भर के उच्च शिक्षण संस्थानों को 28 से 30 अगस्त तक खेल गतिविधियां आयोजित करने का निर्देश दिया है। बड़ी सरकारी बीमा कंपनियां भी अपने दफ्तरों में तीन दिन का खेल अभियान चला रही हैं, ताकि कर्मचारियों को शारीरिक गतिविधि के लिए प्रेरित किया जा सके।
यह सब देखकर लगता है जैसे देश अचानक खेलप्रेमी बन गया हो। लेकिन सवाल यह है कि 31 अगस्त को क्या होगा।
पिछले कई सालों का पैटर्न देखें तो जवाब साफ है। खेल का मैदान बंद हो जाएगा, कोच की जगह फिर से टीचर की टाइमटेबल आ जाएगी, और अगले 364 दिनों के लिए खेल फिर हाशिए पर चला जाएगा। यह कोई नई बात नहीं है। योग दिवस पर भी यही होता है, पर्यावरण दिवस पर भी। साल में एक दिन जोश दिखाकर बाकी समय के लिए संस्थागत जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना, जैसे यह एक तय परंपरा बन चुकी हो।
असली सवाल बजट का है। स्कूलों में पीटी पीरियड अक्सर सबसे पहले काटा जाने वाला पीरियड होता है, जब सिलेबस पूरा करने का दबाव आता है। छोटे शहरों और कस्बों में खेल अकादमियां फंड की कमी से जूझती रहती हैं, जबकि उन्हीं शहरों में एक दिन के आयोजन पर प्रचार और पीआर पर अच्छा-खासा खर्च हो जाता है। यानी निवेश वहां नहीं होता जहां असली प्रतिभा तैयार होती है, बल्कि वहां होता है जहां कैमरा पहुंचता है।
यह विडंबना और गहरी हो जाती है जब हम याद करते हैं कि राष्ट्रीय खेल दिवस किसके नाम पर मनाया जाता है। मेजर ध्यानचंद, जिन्होंने हॉकी में भारत को लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण दिलाए, आज भी हॉकी के सबसे बड़े नाम माने जाते हैं। लेकिन ठीक इसी हफ्ते भारतीय महिला हॉकी टीम वर्ल्ड कप से बाहर हो गई, एक भी मुकाबला जीते बिना नॉकआउट चरण तक पहुंचकर।
यह सिर्फ एक टीम की हार नहीं है। यह उस सिस्टम की तस्वीर है जो साल में एक दिन हॉकी के हीरो को याद करता है, लेकिन बाकी दिन उस खेल को जमीनी स्तर पर सींचने में नाकाम रहता है। जिस खेल का प्रतीक बनाकर पूरा दिन समर्पित किया गया है, उसी खेल का ढांचा हर साल कमजोर होता जा रहा है।
कॉरपोरेट दुनिया में यह चलन और भी साफ नजर आता है। बड़ी कंपनियां साल में एक दिन “स्वास्थ्य और फिटनेस” को लेकर कार्यक्रम करती हैं, प्रेस रिलीज जारी करती हैं, तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालती हैं। यह सामाजिक जिम्मेदारी की तरह दिखता तो जरूर है, लेकिन असल में यह एक तरह का प्रदर्शन है, जिसका मकसद संस्था की छवि चमकाना होता है, न कि कर्मचारियों या समाज में स्थायी बदलाव लाना।
इसकी तुलना उन देशों से करें जहां खेल संस्कृति सच में जड़ें जमाए हुए है। वहां खेल का ढांचा किसी एक तारीख पर निर्भर नहीं करता। स्कूलों में रोज खेल का समय तय होता है, स्थानीय क्लबों को लगातार सहयोग मिलता है, और प्रतिभा खोजने की प्रक्रिया पूरे साल चलती रहती है। भारत में यह निरंतरता अक्सर गायब रहती है, और उसकी जगह एक दिन के जोश-खरोश ने ले ली है।
यह मानना गलत होगा कि एक दिन का आयोजन बेकार है। जागरूकता फैलाने के लिए ऐसे दिन जरूरी हैं, और अगर उनकी वजह से कुछ बच्चे या युवा खेल की तरफ आकर्षित होते हैं, तो यह अच्छी बात है। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब यह दिन असली काम का विकल्प बन जाए, न कि उसकी शुरुआत।
राष्ट्रीय खेल दिवस को सार्थक बनाने का असली तरीका यह नहीं है कि 29 अगस्त को कितने बड़े आयोजन हों। असली पैमाना यह होना चाहिए कि 30 अगस्त, 15 सितंबर या 20 दिसंबर को कोई सरकारी स्कूल का बच्चा खेलने के लिए मैदान और कोच पाता है या नहीं।
जब तक यह बदलाव नहीं आता, राष्ट्रीय खेल दिवस एक कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएगा, जो साल में एक बार जोश दिखाकर बाकी 364 दिन खामोश हो जाता है।
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