दक्षिण एशिया की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। बांग्लादेश में 17 फरवरी 2026 को तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह घटना क्षेत्रीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत के बाद यह पहला निर्वाचित पुरुष प्रधानमंत्री बनना, एक तरफ पुरानी राजनीतिक असंतुलनों से मुक्ति का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ अनेक अनिश्चितताओं और संभावनाओं का जन्मदाता भी। 12 फरवरी को हुए चुनाव में बीएनपी ने 299 में से 212 सीटें जीतीं, जबकि जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को 77 सीटें मिलीं। यह जीत 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले जनआंदोलन का परिणाम है, जिसने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका था। लेकिन सत्ता की यह नई शुरुआत स्थिरता की गारंटी नहीं है। अर्थव्यवस्था की कमजोरी, कट्टर ताकतों का उभार और क्षेत्रीय संतुलन की जटिलताएं तारिक रहमान के सामने कठिन परीक्षा पेश कर रही हैं।

कौन हैं तारिक रहमान?

तारिक रहमान का जन्म 20 नवंबर 1965 को हुआ। वे पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र हैं। उनका परिवार बांग्लादेश की राजनीति का प्रमुख हिस्सा रहा है। 1971 के मुक्ति संग्राम में उनके पिता ने स्वतंत्रता की घोषणा की थी। तारिक ने 1980 के दशक में राजनीति में प्रवेश किया और 2001–2006 के बीएनपी शासन में वरिष्ठ पद संभाले। 2007 में सैन्य-समर्थित अंतरिम सरकार ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार किया, जिसे उन्होंने राजनीतिक साजिश बताया। 2008 में वे लंदन निर्वासन में चले गए, जहां से 17 वर्षों तक पार्टी का नेतृत्व किया। दिसंबर 2025 में वापसी के बाद उन्होंने ढाका-17 और बोगरा-6 सीटों से जीत हासिल की। खालिदा जिया की मृत्यु के बाद वे बीएनपी चेयरमैन बने। उनका सफर यातनाओं, कानूनी लड़ाइयों और निर्वासन से भरा रहा है। उनकी विचारधारा ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ पर आधारित है, जो राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखती है। लेकिन यह नारा कितना व्यावहारिक सिद्ध होगा, यह समय बताएगा, क्योंकि राजनीतिक विरासत और पुराने आरोप अभी भी उनके पीछे छाया बने हुए हैं।

2024 का जनआंदोलन और सत्ता परिवर्तन की पृष्ठभूमि

तारिक रहमान की सत्ता तक पहुंच को समझने के लिए 2024 की घटनाएं केंद्रीय हैं। छात्र-नेतृत्व वाले व्यापक आंदोलन ने चुनावी अनियमितताओं, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी और बढ़ती असंतुष्टि के खिलाफ जनभावना को तेज किया। इसने शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बाहर किया। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने चुनावों की निगरानी की। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने 2026 के चुनावों को अपेक्षाकृत स्वतंत्र और निष्पक्ष माना, हालांकि कुछ अनियमितताओं की शिकायतें आईं। मतदान प्रतिशत लगभग 60 था। बीएनपी की यह जीत लगभग दो दशक बाद सत्ता में वापसी है, लेकिन जमात-ए-इस्लामी की मजबूत उपस्थिति (77 सीटें) राजनीतिक परिदृश्य को जटिल बनाती है।

अर्थव्यवस्था और शासन की कठिन परीक्षा

तारिक रहमान ऐसे समय में सत्ता संभाल रहे हैं जब बांग्लादेश गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। रेडीमेड गारमेंट उद्योग (जो निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक है) वैश्विक मांग के उतार-चढ़ाव से प्रभावित है। 2025 में निर्यात वृद्धि महज 0.89 प्रतिशत रही। महंगाई अभी भी ऊंची है (6.5–7.26 प्रतिशत के आसपास अनुमानित), बेरोजगारी बढ़ रही है और विदेशी मुद्रा भंडार 2024 के निचले स्तर से 30 अरब डॉलर के करीब पहुंचा है, लेकिन कमजोर है। नई सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और रोजगार सृजन का वादा किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुधारों को लागू करना आसान नहीं होगा। बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय से ध्रुवीकृत रही है। संस्थागत बदलाव के लिए व्यापक सहमति जरूरी है। यदि ये प्रयास विफल हुए, तो युवा आकांक्षाएं (जो 2024 की क्रांति से निकलीं) फिर उबल सकती हैं।

इस्लामी राजनीति और लोकतांत्रिक संतुलन

चुनावी परिणामों का एक चिंताजनक पहलू जमात-ए-इस्लामी और सहयोगी दलों की उल्लेखनीय उपस्थिति है। यह दोहरी चुनौती पेश करती है। एक ओर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, दूसरी ओर उदार और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा। अल्पसंख्यक समुदायों (विशेषकर हिंदू और बौद्ध) की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि 2024 के बाद कुछ घटनाएं रिपोर्ट हुईं। नई सरकार को इन मूल्यों के बीच संतुलन बनाना होगा। तारिक रहमान की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी: क्या वे आर्थिक प्रगति के साथ देश को सही मायने में धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बना पाएंगे? कट्टर ताकतों के बढ़ते प्रभाव के बीच सफलता की संभावना संदिग्ध लगती है।

भारत-बांग्लादेश संबंधों का नया अध्याय

भारत के लिए तारिक रहमान की सरकार विशेष महत्व रखती है। दोनों देशों के बीच चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा, व्यापार (लगभग दो अरब डॉलर), ऊर्जा सहयोग और सुरक्षा साझेदारी है। शेख हसीना के शासन में संबंध घनिष्ठ रहे, लेकिन बीएनपी के साथ ऐतिहासिक सतर्कता बनी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले बधाई दी और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला शपथ ग्रहण में उपस्थित थे। तारिक ने ‘न दिल्ली, न पिंडी… बांग्लादेश प्रथम’ का नारा दिया, जो स्वतंत्र विदेश नीति दर्शाता है। भारत की प्रमुख चिंताएं हैं:

  • सीमा सुरक्षा और अवैध आव्रजन
  • तीस्ता जल बंटवारा
  • अल्पसंख्यक सुरक्षा
  • चीन का बढ़ता प्रभाव

नई सरकार ने संकेत दिया है कि विदेश नीति राष्ट्रीय हित पर आधारित होगी। यह संबंध खराब होने का मतलब नहीं, बल्कि अधिक संतुलित और व्यावहारिक संवाद की संभावना है। लेकिन तारिक के पहले संबोधन में भारत का स्पष्ट उल्लेख न होना कुछ सवाल खड़े करता है। गंगा जल संधि का नवीनीकरण और सीमा हत्याओं को रोकना तत्काल प्राथमिकताएं हैं। यदि ये मुद्दे सुलझे नहीं, तो संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।

लोकतंत्र, विरासत और भविष्य की परीक्षा

तारिक रहमान का उदय बांग्लादेश की राजनीति में नए युग का संकेत है। वे राजनीतिक विरासत और भविष्य की आशाओं के प्रतीक हैं। उनकी सबसे बड़ी चुनौती विश्वास बनाना होगा, बांग्लादेशियों के बीच, देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर। निर्वासन से सत्ता तक की यात्रा ने उन्हें प्रतीकात्मक नेता बना दिया है, लेकिन पुराने आरोप और राजवंशीय छवि अभी भी सवाल उठाते हैं। यह सत्ता परिवर्तन अवसर भी है और कठोर परीक्षा भी।

तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना बांग्लादेश के राजनीतिक पुनर्जन्म की कहानी है। यदि नई सरकार स्थिरता, आर्थिक सुधार और संतुलित विदेश नीति स्थापित कर पाती है, तो यह परिवर्तन ऐतिहासिक सिद्ध हो सकता है। लेकिन चुनौतियां भारी हैं: अर्थव्यवस्था की कमजोरी, कट्टरवाद का उभार और क्षेत्रीय संतुलन। तारिक का प्रधानमंत्री बनना बांग्लादेश के लिए आशा की किरण है, लेकिन भविष्य अनिश्चित है। सुधारों को लागू करना, संबंधों को मजबूत करना और युवा आकांक्षाओं को पूरा करना जरूरी है। यदि वे सफल हुए, तो बांग्लादेश दक्षिण एशिया में मजबूत लोकतंत्र बन सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है: कट्टरवादियों के बढ़ते प्रभाव के बीच क्या वे सफल होंगे? समय ही इसका जवाब देगा।

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