रेडियो… एक ऐसा माध्यम जो दिखता नहीं, लेकिन सुनते ही अपनापन जगा देता है। डिजिटल दौर में जहां हर चीज़ स्क्रीन पर सिमट गई है, वहीं रेडियो आज भी आवाज़ के जरिए दिलों तक पहुंचने की ताकत रखता है। विश्व रेडियो दिवस हमें याद दिलाता है कि तकनीक बदल सकती है, लेकिन संवाद का भरोसा और मानवीय जुड़ाव कभी पुराना नहीं होता। यह माध्यम हमें बताता है कि संचार केवल तस्वीरों और वीडियो का खेल नहीं, बल्कि भावनाओं और विश्वास की भी बात है।
रेडियो की सबसे बड़ी ताकत उसकी पहुंच है। दूरदराज के गांव हों, पहाड़ी इलाके हों या समुद्र तटीय बस्तियां जहां इंटरनेट कमजोर पड़ जाता है, वहां रेडियो की आवाज़ अब भी साफ सुनाई देती है। बिजली न हो, नेटवर्क ठप हो जाए, फिर भी बैटरी से चलने वाला एक छोटा सा रेडियो लोगों तक जरूरी जानकारी पहुंचा सकता है। आपदा, बाढ़, तूफान या महामारी जैसी परिस्थितियों में रेडियो ने बार-बार साबित किया है कि संकट के समय सही और त्वरित सूचना कितनी जरूरी होती है। यह सिर्फ खबर नहीं देता, बल्कि भरोसा देता है यह एहसास दिलाता है कि आप अकेले नहीं हैं।
इतिहास गवाह है कि बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलावों के दौर में रेडियो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता आंदोलनों से लेकर जनजागरूकता अभियानों तक, इसने लोगों को जोड़ने और दिशा देने का काम किया। रेडियो की आवाज़ ने सीमाओं को पार किया है और अलग-अलग संस्कृतियों के बीच संवाद की कड़ी बनाई है। यही कारण है कि इसे आज भी लोकतांत्रिक संवाद का मजबूत माध्यम माना जाता है।
आज के समय में सामुदायिक रेडियो की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। छोटे-छोटे समुदायों की स्थानीय भाषा, उनकी समस्याएं, उनकी संस्कृति सबको मंच देने का काम रेडियो करता है। किसान अपने अनुभव साझा करते हैं, महिलाएं अपने अधिकारों पर चर्चा करती हैं, युवा रोजगार और शिक्षा से जुड़ी जानकारी पाते हैं। यह केवल प्रसारण नहीं, बल्कि सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम है। जहां मुख्यधारा का मीडिया अक्सर बड़े शहरों तक सीमित हो जाता है, वहीं सामुदायिक रेडियो जमीनी मुद्दों को आवाज़ देता है।
डिजिटल युग में पॉडकास्ट और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ने रेडियो को एक नया रूप दे दिया है। अब रेडियो केवल ट्रांजिस्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि मोबाइल ऐप्स और इंटरनेट के जरिए दुनिया के किसी भी कोने से सुना जा सकता है। युवा पीढ़ी अपनी पसंद के विषयों पर पॉडकास्ट सुन रही है चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य, करियर या मनोरंजन। इससे साबित होता है कि रेडियो ने खुद को समय के साथ ढाला है, लेकिन उसकी आत्मा वही है आवाज़, जो सीधे दिल तक पहुंचती है।
रेडियो की असली ताकत उसकी सरलता और विश्वसनीयता है। जब दुनिया में फेक न्यूज और सूचनाओं की बाढ़ है, तब रेडियो की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। प्रशिक्षित एंकर और विश्वसनीय स्रोतों से प्रसारित खबरें श्रोताओं में भरोसा कायम करती हैं। रेडियो सिर्फ सूचना नहीं देता, बल्कि समाज में जागरूकता, संवाद और एकता की भावना भी मजबूत करता है।
विश्व रेडियो दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम इस सशक्त माध्यम को सिर्फ मनोरंजन तक सीमित रखेंगे, या इसे बदलाव और जागरूकता का हथियार बनाएंगे? रेडियो की आवाज़ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी दशकों पहले थी फर्क बस इतना है कि अब वह और भी ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है। बदलती तकनीक के बीच, रेडियो हमें यह सिखाता है कि सच्ची ताकत दिखने में नहीं, बल्कि सुनने और समझने में होती है।
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