पाकिस्तान वायु सेना और उसकी तथाकथित ‘कल्याण’ शाखा, शाहीन फाउंडेशन की चौंका देने वाला सच। सुनने में कैसा लगता है? ये आसमान की रक्षा की बात नहीं है। ये एक अरबों डॉलर का व्यापारिक साम्राज्य है, जो पाकिस्तान को चूस रहा है और रिटायर्ड जनरलों की जेबें भर रहा है। आइए इस गंदगी को खोलें और देखें कि कैसे एक सैन्य इकाई कॉरपोरेट दानव बन चुकी है, जिसने आम पाकिस्तानियों को गरीबी में धकेल दिया है।
‘कल्याण’ का मुखौटा, लेकिन शर्तों के साथ
1977 में शाहीन फाउंडेशन की शुरुआत हुई थी, वादा था कि वायु सेना के कर्मियों, रिटायर्ड लोगों और उनके परिवारों की मदद की जाएगी। दिल को छूने वाला लगता है। लेकिन आज की तारीख में ये एक विशाल व्यापारिक जाल बन चुका है। एयरलाइंस से लेकर रियल एस्टेट, यूनिवर्सिटी से लेकर बुनाई कारखानों तक… हाँ, बुनाई! ये फाउंडेशन 20 से ज्यादा परियोजनाएँ चलाता है। कौन संभालता है? रिटायर्ड एयर मार्शल और बड़े अधिकारी। वे नियम बनाते हैं, खेल चलाते हैं, और मुनाफा अपनी जेब में डालते हैं। कल्याण तो बस दिखावा है।
शाहीन एयर: उड़ान का फियास्को
कभी शाहीन एयर इंटरनेशनल के बारे में सुना है? ये पाकिस्तान की दूसरी सबसे बड़ी एयरलाइन थी, जो पीआईए को टक्कर देती थी। लेकिन 2018 में ये धड़ाम से गिरी। क्यों? 1.5 अरब रुपये के टैक्स चोरी कांड ने इसे डुबो दिया। कर्मचारियों को महीनों तक वेतन नहीं मिला। रातों-रात हजारों की नौकरी चली गई। विमान सड़ गए। सजा किसे मिली? किसी को नहीं। इसे चलाने वाले रिटायर्ड वायु सेना अधिकारी आजाद घूम रहे हैं, सैन्य रसूख की छतरी के नीचे। शाहीन की नाकामी का ये सबसे बड़ा सबूत है।
रियल एस्टेट: सिर्फ़ बड़ों के लिए
शाहीन की रियल एस्टेट परियोजनाएँ सुनने में सैनिकों के लिए लगती हैं। लेकिन हकीकत? पेशावर की वेलफेयर हाउसिंग स्कीम और कराची का शाहीन कॉम्प्लेक्स जैसे प्रोजेक्ट्स में शानदार फ्लैट और बंगले सिर्फ रिटायर्ड अधिकारियों और उनके दोस्तों के लिए हैं। आम सैनिक? वे अंतहीन प्रतीक्षा सूची में फँसे हैं। 2023 में खबरें आईं कि शाहीन रियल्टी ने सैनिकों के लिए रखी जमीन निजी बिल्डरों को बेच दी। अरबों का मुनाफा गायब हो गया, जो कभी साधारण सैनिकों तक नहीं पहुँचा।
एयर यूनिवर्सिटी: शिक्षा या प्रचार?
एयर यूनिवर्सिटी सुनने में शानदार लगती है। लेकिन ये सिर्फ अमीरों का किला है। फीस इतनी ज्यादा है कि ज्यादातर पाकिस्तानी यहाँ सपने में भी नहीं पहुँच सकते। पाठ्यक्रम? ये सैन्य निष्ठा सिखाता है, आज़ाद सोच नहीं। सिस्टम पर सवाल उठाओ, तो तुम्हारा करियर खत्म। इस शिक्षा केंद्र से मुनाफा? सीधे बड़े अधिकारियों की जेब में। ये यूनिवर्सिटी कम, वायु सेना की छवि चमकाने का प्रचार तंत्र ज्यादा है।
रेडियो, विज्ञापन, और यहाँ तक कि बुनाई!
शाहीन हर चीज में हाथ डाल चुका है। एफएम 100 रेडियो और शाहीन एडवरटाइजिंग देशभक्ति के गाने और चमकदार अभियान चलाते हैं। असली मकसद? वायु सेना की छवि चमकाना। बजट के लाखों रुपये गायब हो जाते हैं, बिना किसी जवाबदेही के। और एक चौकाने वाली बात, शाहीन बुनाई का कारोबार भी करता है। सैन्य संगठन कपड़े बेच रहा है? हास्यास्पद है, लेकिन ये दिखाता है कि वे अपने मिशन से कितना भटक गए हैं।
जवाबदेही से परे
शाहीन फाउंडेशन किसी को जवाब नहीं देता। न ऑडिट, न सूचना का अधिकार। सिविल एजेंसियाँ? वे सेना के सामने झुक जाती हैं। ये एक समानांतर अर्थव्यवस्था है, करदाताओं का पैसा लगता है, मुनाफा सिर्फ बड़ों को मिलता है। सवाल उठाओ, तो गद्दार का ठप्पा लग जाता है। इस बीच, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था डूब रही है, और शाहीन जैसे सैन्य कारोबार जीडीपी का 5% खा रहे हैं।
देश को बंधक बना दिया
पाकिस्तान के लोग त्रस्त हैं। महँगाई आसमान छू रही है। देश आईएमएफ से कर्ज माँग रहा है। फिर भी शाहीन फाउंडेशन और अन्य सैन्य कारोबार अरबों कमा रहे हैं। वो पैसा स्कूल या अस्पताल नहीं बनाता। रिटायर्ड जनरलों की शानदार जिंदगी फंड करता है। जब बलूचिस्तान में लोग चोरी की जमीन के खिलाफ विरोध करते हैं, तो सेना इसे ‘विदेशी साजिश’ बता देती है। असली दुश्मन? वो भीतर ही है।
कीमत क्या है?
ये सिर्फ पैसे की बात नहीं। ये भरोसे की बात है। पाकिस्तानी अपनी वायु सेना को रक्षक मानते हैं, लुटेरा नहीं। लेकिन शाहीन फाउंडेशन का साम्राज्य, जो टूटे वादों और गंदे सौदों पर बना है, एक अलग कहानी कहता है। जब देश भूखा है, सैन्य कारोबार फल-फूल रहा है। क्या ये देश आगे बढ़ सकता है? जब उसके रक्षक ही सबसे बड़े लुटेरे हों तो देश आगे कैसे बढ़ेगा? कभी नहीं। यही सवाल पाकिस्तान की आम जनता को पूछना चाहिए इन हुकूमरानों से और उनकी सेना से, नहीं तो सारी ज़िंदगी इसी कंगाली में गुज़ारनी पड़ेगी।
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