हर साल 15 अगस्त को टीवी पर एक तस्वीर लगभग तय होती है। प्रधानमंत्री लाल किले कीदीवार से तिरंगा फहराते हैं। देश को संबोधित करते हैं। करोड़ों लोग उस पल को देखते हैं।
यह दृश्य इतना जाना-पहचाना है कि शायद ही कभी हम रुककर सोचते हैं आखिर लाल किला ही क्यों?
दिल्ली में कई ऐतिहासिक इमारतें हैं। फिर आज़ाद भारत ने अपने सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समारोह के लिए लाल किले को ही क्यों चुना?
इसका जवाब सिर्फ इतिहास में नहीं छिपा, इसमें प्रतीकवाद भी है| सत्ता का इतिहास भी है और भारत की आज़ादी की कहानी का एक बेहद दिलचस्प अध्याय भी है।
लाल किले का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल में हुआ। निर्माण 1638 में शुरू हुआ और 1648 में पूरा हुआ।
यह शाहजहानाबाद का शाही किला और मुगल सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र था। दो सदियों से ज्यादा समय तक यहां से मुगल शासन की ताकत दिखाई देती रही।
फिर 1857 आया। विद्रोह के बाद आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेज़ों ने गिरफ्तार किया। उन्हें बाद में रंगून निर्वासित कर दिया गया।
इस तरह लाल किला सिर्फ मुगल वैभव का प्रतीक नहीं रहा। वह भारत में सत्ता के बदलते रूपों का भी गवाह बन गया।
एक दौर में यहां से मुगल बादशाह का शासन चलता था। बाद में ब्रिटिश हुकूमत का प्रभाव यहां दिखाई देने लगा।
लेकिन लाल किले की कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
1945 में यह एक बार फिर इतिहास का गवाह बन गया। आज़ाद हिंद फ़ौज यानी INA के अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे यहीं चलाए गए।
पहले प्रमुख मुकदमे में शाह नवाज़ ख़ान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर मुकदमा चला। इन मुकदमों ने पूरे देश में जबरदस्त राजनीतिक और जनभावना पैदा कर दी |
INA के सैनिकों के प्रति समर्थन बढ़ा और ब्रिटिश शासन के खिलाफ माहौल और तेज हुआ।
यानी जिस जगह पर भारतीय सैनिकों पर मुकदमा चलाया गया था, कुछ ही समय बाद वही जगह स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बनने वाली थी।
इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि 15 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली के प्रिंसेज़ पार्क में, इंडिया गेट के पास, राष्ट्रीय ध्वज फहराया था और 16 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरूने लाल किले से तिरंगा फहराया और देश को संबोधित किया।
देश को संबोधित करने के लिए लाल किला ही क्यों चुना गया?
लाल किला सदियों तक सत्ता का प्रतीक रहा था। उसने मुगल साम्राज्य का दौर देखा, 1857 के बाद सत्ता का बदलाव देखा, ब्रिटिश शासन देखा और INA के मुकदमे देखे।
आज जब हर 15 अगस्त हम सब प्रधानमंत्री को लाल किले से तिरंगा फहराते देखते हैं, तो यह जानना दिलचस्प है कि लाल किले से ध्वजारोहण की शुरुआत भले ही 16 अगस्त 1947 के उस ऐतिहासिक अवसर से हुई थी
लेकिन उसके बाद आने वाले प्रधानमंत्रियों ने हर 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) लाल किले से ही ध्वज फैराया और देश को संबोधित किया|
नेताओं के चेहरे बदलते रहे। सरकारें बदलती रहीं। राजनीतिक दौर बदलते रहे। लेकिन लाल किले की दीवार से देश को संबोधित करने की परंपरा कायम रही।
शायद यही इस परंपरा की सबसे बड़ी ताकत है।
लाल किले की कहानी को समझते समय उसके परिसर में मौजूद सलीमगढ़ किले का उल्लेख भी जरूरी है।
सलीमगढ़ किले में INA के सैनिकों को कैद रखा गया था। आज इस परिसर का एक हिस्सा उस इतिहास की याद दिलाता है।
इसलिए लाल किला सिर्फ आजादी के जश्न की जगह नहीं है। यह उस संघर्ष की याद भी है जिसकी कीमत देश ने चुकाई है।
एक ही परिसर में आपको सत्ता का इतिहास भी मिलता है और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति भी।
आज जब प्रधानमंत्री इसकी प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं, तो हम सिर्फ एक सरकारी समारोह नहीं देखते। हम इतिहास की कई परतों को एक साथ देखते हैं।
यूनेस्को ने 2007 में लाल किला परिसर को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया। आज यह भारत के सबसे पहचाने जाने वाले ऐतिहासिक स्थलों में से एक है।
अगली बार जब 15 अगस्त को आप लाल किले की तस्वीर देखें, तो सिर्फ तिरंगा मत देखिए।
उन लाल दीवारों को भी देखिए। उनके पीछे सदियों का इतिहास है।
शायद यही वजह है कि लाल किला आज सिर्फ एक स्मारक नहीं लगता।
वह भारत की कहानी का एक ऐसा पन्ना है, जिसे हर साल 15 अगस्त को पूरा देश फिर से पढ़ता है।
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