हाल ही में आप किस यात्रा पर घूमने गए थे? मनाली, शिमला, गोवा या फिर कोई छोटा-सा गांव? जहां भी गए हों, आपने अपनी कई तस्वीरें सामाजिक माध्यमों पर जरूर साझा की होंगी।
लेकिन अगर आपसे कहा जाए कि सिर्फ तस्वीर देखकर कोई बता सकता है कि वह कहां की है, तो क्या आप यकीन करेंगे? आप कहेंगे कि जो खुद वहां गया होगा, वही पहचान पाएगा। पर हकीकत इससे कहीं आगे निकल चुकी है।
तकनीक के इस बढ़ते दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता इतनी आगे बढ़ चुकी है कि आपकी निजी जगह भी शायद निजी नहीं रह गई। सामाजिक माध्यमों पर डाली गई कोई भी तस्वीर देखकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कार्यक्रम काफी हद तक बता सकते हैं कि वह जगह कहां की है। चलिए जानते हैं कि यह आखिर कैसे मुमकिन है।
दरअसल, मैकाफी नाम की कंपनी ने हाल ही में इस पर एक अध्ययन किया। नतीजा चौंकाने वाला निकला। बिना जीपीएस जानकारी के, बिना जगह की पहचान बताने वाले निशान के और बिना किसी विवरण के भी कुछ कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियां तस्वीर का सही शहर और देश लगभग नौ में से नौ बार पहचान सकती हैं।
इस अध्ययन में दो कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों का इस्तेमाल हुआ। गूगल का जेमा 3 27बी और अलीबाबा का क्वेन 3 वीएल 30बी। दोनों खुले रूप से उपलब्ध प्रणालियां हैं, यानी इन्हें बिना किसी सदस्यता शुल्क के इस्तेमाल किया जा सकता है। यह तकनीक किसी खास प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि आम लोगों की पहुंच में भी है।
कुल 21,236 यात्रा तस्वीरें इन प्रणालियों को दिखाई गईं और बस एक ही सवाल पूछा गया। यह तस्वीर कहां की है? जेमा 3 27बी ने 87 प्रतिशत बार सही जवाब दिया, जबकि क्वेन 3 वीएल 30बी तो 91 प्रतिशत तक सही निकला।
सवाल उठता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता बिना किसी स्थान की जानकारी के यह सब करती कैसे है? जवाब है तस्वीर में दिखने वाली बारीक चीजें। इमारतों की बनावट, दुकानों के बोर्ड, सड़क के निशान, रोशनी का अंदाज, शहर की ऊंची इमारतें और यहां तक कि खाने के ठेले भी। यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई तेज जासूस तस्वीर के हर कोने को बारीकी से पढ़ ले।
पहले माना जाता था कि तस्वीर से जीपीएस या दूसरी अतिरिक्त जानकारी हटाने से उसकी पहचान छिप जाती है। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को ऐसी जानकारी की जरूरत ही नहीं। वह तस्वीर में दिखाई देने वाली चीजों के आधार पर ही जगह का अंदाजा लगा सकती है।
हालांकि, हर तस्वीर के साथ यह उतना आसान भी नहीं होता। मशहूर जगहों या खास पहचान वाले स्थलों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्यादा सटीक जगह बताई। लेकिन आम समुद्र किनारे, गांव की सड़क या होटल के कमरे जैसी तस्वीरों में सटीक जगह पहचानना मुश्किल रहा। फिर भी ऐसे मामलों में भी देश की पहचान करने की क्षमता काफी मजबूत रही।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि यह जांच सिर्फ अध्ययन तक सीमित नहीं रही। कुछ कर्मचारियों ने अपनी निजी तस्वीरें, जिनमें से कई कभी सामाजिक माध्यमों पर साझा भी नहीं हुई थीं, चैटजीपीटी, क्लॉड और कोपायलट पर आजमाईं। एक उदाहरण में नदी और पेड़ों वाली एक साधारण-सी तस्वीर को कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हेस्टिंग्स-ऑन-हडसन नाम की जगह से जोड़ दिया। यह अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य का एक गांव है।
यानी यह सिर्फ प्रयोगशाला का कमाल नहीं है। यही कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले कार्यक्रम वह काम कर रहे हैं, जिनका हम रोज इस्तेमाल करते हैं। इसी वजह से यह बात एक सामान्य तकनीकी खबर से आगे बढ़कर एक असली चिंता बन जाती है।
अध्ययन के मुताबिक, इससे ठगी करने वाले लोग सामान्य धोखाधड़ी वाले संदेशों से आगे बढ़कर ज्यादा निजी और भरोसेमंद धोखाधड़ी कर सकते हैं। कोई आपकी सार्वजनिक तस्वीरें इंस्टाग्राम, फेसबुक या एक्स से उठाकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रणाली में डाल सकता है और आपकी संभावित जगह और समय का अंदाजा लगा सकता है। मैकाफी ने खास तौर पर ऐसी निजी और भरोसेमंद ठगी की आशंका जताई है।
मान लीजिए आप यात्रा पर हैं और अचानक एक संदेश आता है। “आपके खाते में असामान्य गतिविधि देखी गई है” या “किसी ने आपके उसी शहर से प्रवेश करने की कोशिश की।” संदेश बिल्कुल सही होने की जरूरत नहीं है। बस इतना सही लगना चाहिए कि आपका शक कम हो जाए। क्योंकि आपको लगेगा कि सामने वाले को सच में पता है कि आप कहां हैं।
यह चिंता ऐसे वक्त सामने आई है जब साइबर अपराध भी तेजी से बढ़ रहा है। गृह मंत्रालय से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में 28.15 लाख साइबर अपराध मामले दर्ज हुए, जो 2024 के 22.68 लाख के मुकाबले करीब 24 प्रतिशत ज्यादा हैं। 2025 में भारतीयों को साइबर धोखाधड़ी में कम से कम 22,495 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
इसका मतलब यह नहीं है कि अब तस्वीरें साझा करना बंद कर दिया जाए। बस इतना ध्यान रखना काफी है कि तस्वीर में क्या-क्या दिखाई दे रहा है और वह जानकारी अजनबियों तक कितनी आसानी से पहुंच सकती है।
तो अगली बार कोई तस्वीर साझा करने से पहले एक पल रुककर सोच लीजिए। घबराने की जरूरत नहीं है। अगर तस्वीर में कोई खास पहचान वाला स्थल नहीं है, तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए भी एकदम सटीक जगह बताना उतना आसान नहीं होता।
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