सुबह 9 बजे लैपटॉप खुलता है। रात 11 बजे बंद होता है। और फिर शुरू होता है दूसरा दौर Instagram, YouTube, Reels। आँखें थकी हुई हैं, दिमाग़ चाहता है आराम, लेकिन उँगलियाँ स्क्रॉल करती रहती हैं। यह कहानी किसी एक की नहीं बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली के लाखों दफ़्तरी कर्मचारियों की रोज़ की हक़ीक़त है।
हम जब स्क्रीन और आँखों की बात करते हैं, तो ज़्यादातर चर्चा बच्चों के इर्द-गिर्द होती है। लेकिन एक और तबका है जो इस संकट की सबसे बड़ी क़ीमत चुका रहा है भारत का कामकाजी वर्ग, ख़ासकर 25 से 45 साल के शहरी पेशेवर।
काम की स्क्रीन और मनोरंजन की स्क्रीन दोनों एक साथ
DeskTime के एक अध्ययन के मुताबिक़ भारत में औसत कार्यदिवस 9 घंटे 46 मिनट का है, जिसमें से लगभग 6 घंटे 43 मिनट कर्मचारी कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बिताते हैं। IT सेक्टर में यह आँकड़ा और भी चिंताजनक है। 2025 में Blind ऐप द्वारा 1,450 IT पेशेवरों पर किए गए सर्वे में पाया गया कि 72% कर्मचारी हर हफ़्ते क़ानूनी सीमा से ज़्यादा यानी 48 घंटे से अधिक काम करते हैं। इनमें से 83% ने burnout महसूस करने की बात कही।
काम ख़त्म होने के बाद क्या होता है? EY की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीयों ने 2024 में अपने स्मार्टफ़ोन पर सामूहिक रूप से 1.1 ट्रिलियन घंटे बिताए। यानी औसतन हर भारतीय रोज़ाना 5 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर था और इसका क़रीब 70% हिस्सा सोशल मीडिया, वीडियो और गेमिंग में गया।
सोचिए 7 से 8 घंटे काम की स्क्रीन, फिर 4 से 5 घंटे मोबाइल। यही है “डबल स्क्रीन” ज़िंदगी। और यह ज़िंदगी एक ख़ामोश बीमारी को जन्म दे रही है।
आँखें क्या झेल रही हैं?
जब हम किसी स्क्रीन को देखते हैं तो हमारी पलकें झपकने की दर नाटकीय रूप से गिर जाती है सामान्य 14 से 16 बार प्रति मिनट से घटकर सिर्फ़ 4 से 6 बार प्रति मिनट। आँसू सूखते हैं, आँखें जलती हैं, धुंधलापन आता है। इसे Computer Vision Syndrome यानी डिजिटल आई स्ट्रेन कहते हैं।
COVID से पहले दुनिया में इसकी व्यापकता 5% से 65% के बीच थी। महामारी के दौरान यह एकदम से 80% से 94% तक पहुँच गई यह आँकड़ा Frontiers in Public Health जर्नल में प्रकाशित एक समीक्षा में सामने आया। भारत में भी हालत कमोबेश यही है एक अध्ययन के अनुसार भारत में डिजिटल आई स्ट्रेन की व्यापकता लगभग 65% है।
हैदराबाद के विश्वविद्यालय छात्रों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि 75% लोगों ने सिरदर्द की शिकायत की, 50% ने आँखों में जलन बताई और 49% ने आँखों से पानी आने की समस्या दर्ज कराई। ये छात्र हैं जो अभी 20 साल के हैं। जो पेशेवर रोज़ाना दोगुनी स्क्रीन झेल रहे हैं, उनका हाल क्या होगा?
नींद की क़ीमत सबसे महँगी
“डबल स्क्रीन” का सबसे ख़तरनाक नतीजा है टूटी हुई नींद। फ़ोन की नीली रोशनी (blue light) मेलाटोनिन यानी नींद लाने वाले हार्मोन के उत्पादन को रोकती है। नतीजा यह है कि रात 11 बजे रील देखने वाला व्यक्ति रात 1 बजे भी नींद के लिए छटपटाता रहता है।
LocalCircles के 41,000 लोगों पर किए गए 2024 के सर्वे में पाया गया कि भारत में 61% लोग रात को 6 घंटे से कम की नींद ले पाते हैं और यह आँकड़ा 2022 के 50% से बढ़ा है। Wakefit के Great Indian Sleep Scorecard में यह भी सामने आया कि 88% लोग सोने से ठीक पहले फ़ोन इस्तेमाल करते हैं।
डॉक्टर बताते हैं कि नींद की कमी सिर्फ थकान नहीं लाती यह blood pressure बढ़ाती है, मेटाबॉलिज़्म बिगाड़ती है और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाती है। यानी जो व्यक्ति पहले से शुगर, बीपी या तनाव से जूझ रहा है, उसके लिए रात की यह रील-स्क्रॉलिंग और भी महँगी पड़ती है।
“आराम” का भ्रम
यहाँ एक और पेंच है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है। काम के बाद Reels देखना “आराम” नहीं है यह सिर्फ एक अलग तरह की थकान है। जब दिमाग़ 8 घंटे स्क्रीन पर काम करने के बाद 3 घंटे और स्क्रीन देखता है, तो उसे असली आराम नहीं मिलता।
IIM रोहतक के एक अध्ययन में 38,896 युवाओं पर किए गए शोध में पाया गया कि 18 से 25 साल के भारतीय युवा यानी वही लोग जो कल के कामकाजी वर्ग हैं सोशल मीडिया पर औसतन 7 घंटे बिताते हैं। पुरुषों का औसत 6 घंटे 45 मिनट और महिलाओं का 7 घंटे 5 मिनट था। और इनमें से 50% से ज़्यादा समय सिर्फ़ मनोरंजन वाले कंटेंट को देखने में जाता है।
लेकिन आँखें और दिमाग़ इस फ़र्क़ को नहीं समझते। उनके लिए हर स्क्रीन, स्क्रीन है।
क्या किया जा सकता है?
नेत्र विशेषज्ञ 20-20-20 का नियम सुझाते हैं हर 20 मिनट पर स्क्रीन से नज़र हटाकर 20 फ़ीट दूर किसी चीज़ को 20 सेकंड तक देखें। इसके अलावा काम के बाद स्क्रीन और मनोरंजन की स्क्रीन के बीच कम से कम 30 मिनट का अंतर रखें चाय पिएँ, थोड़ा चलें, बाहर जाएँ।
सोने से कम से कम एक घंटे पहले फ़ोन बंद करना नींद की गुणवत्ता में बड़ा फ़र्क़ ला सकता है। यह छोटी-सी आदत नींद, आँखें और मानसिक स्वास्थ्य तीनों पर असर करती है।
असली सवाल यह नहीं है कि आप दिन में कितने घंटे काम करते हैं। सवाल यह है कि काम के बाद भी आप स्क्रीन ही चुन रहे हैं और यह चुनाव आपकी आँखें, आपकी नींद और धीरे-धीरे आपकी सेहत छीन रहा है। जब हर “ब्रेक” एक और स्क्रीन बन जाए, तो असली आराम कब आएगा?
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