सोशल मीडिया खोलिए, कोई न कोई जंगल में खड़ा होकर “वन-स्नान” कर रहा होगा। कोई घास पर नंगे पैर चलकर “धरती से जुड़ने” का फायदा गिना रहा होगा। इन चलनों के लिए लोग महंगे आयोजन बुक कर रहे हैं, हज़ारों रुपए की विशेष चटाइयाँ खरीद रहे हैं। स्वास्थ्य उद्योग का यह खेल अब लाखों-करोड़ों का हो चुका है। 2024 में दुनियाभर की स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था करीब 6.7 खरब डॉलर की आँकी गई। लेकिन असली सवाल यह है क्या ये चलन वाकई काम करते हैं, या सिर्फ एक महंगा फैशन है?
पहले समझते हैं ये हैं क्या?
वन-स्नान यानी जापानी भाषा में “शिरिन-योकू” इसका मतलब है जंगल में जाकर शांत बैठना, धीरे-धीरे चलना, पेड़ों की खुशबू और आवाज़ों को महसूस करना। यह कोई कसरत नहीं है। यह सिर्फ प्रकृति के साथ जुड़ने का एक तरीका है।
धरती से जुड़ना यानी “भू-संपर्क” इसका मतलब है ज़मीन से सीधे जुड़ना। नंगे पैर घास, मिट्टी या रेत पर चलना। इसके पीछे सोच यह है कि धरती की सतह पर प्राकृतिक विद्युत-कण होते हैं, जो हमारे शरीर में जाकर फायदा पहुँचाते हैं।
विज्ञान क्या कहता है?
यहाँ बात सीधे करते हैं। दोनों चलनों पर शोध हुआ है और कुछ नतीजे हैरान करने वाले हैं।
वन-स्नान के मामले में प्रमाण ज़्यादा पक्के हैं। शोध बताते हैं कि वन-स्नान से रक्तचाप और हृदय गति में कमी आती है, तनाव के हार्मोन जैसे कोर्टिसोल का स्तर घटता है, नींद बेहतर होती है, और चिंता व अवसाद के लक्षणों में राहत मिलती है। इतना ही नहीं, शोध यह भी दिखाता है कि जंगल में समय बिताने से शरीर की रोग-रक्षक कोशिकाएं ज़्यादा सक्रिय हो जाती हैं। जापान में तो अब वैद्य इसे एक निश्चित समय के लिए लिख कर देने लगे हैं।
भू-संपर्क की बात करें तो कुछ अध्ययनों में पाया गया कि धरती से जुड़ने पर शरीर में दर्द कम होता है, नींद बेहतर होती है, और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र में सकारात्मक बदलाव आता है। कुछ शोधों में यह भी सामने आया कि भू-संपर्क से शरीर में ऑक्सीकरण का दबाव कम होता है यानी वो प्रक्रिया जो उम्र बढ़ने और बीमारियों को बढ़ावा देती है, उसे धीमा किया जा सकता है।
पर रुकिए पूरी तस्वीर देखिए
इतना पढ़कर लगता है कि बस कल से जंगल में भाग जाएं। लेकिन यहाँ सच्चाई यह है कि भू-संपर्क पर अभी ज़्यादा ठोस शोध नहीं है जो थोड़े-बहुत अध्ययन हैं, उनमें भाग लेने वालों की संख्या बहुत कम है। वन-स्नान पर हुए शोध में भी अध्ययनों के तरीके अलग-अलग हैं, जिससे सीधे तुलना करना मुश्किल हो जाता है। कोई भी विशेषज्ञ यह नहीं कह रहा कि ये चलन किसी इलाज की जगह ले सकते हैं।
तो फिर लोग इन पर लाखों क्यों खर्च कर रहे हैं?
इसकी वजह स्वास्थ्य उद्योग का बढ़ता कारोबार है। वन-स्नान, पैदल भ्रमण और प्रकृति-भ्रमण जैसी गतिविधियाँ स्वास्थ्य पर्यटन में तेज़ी से बढ़ रही हैं। विशेष चटाइयाँ जिन पर आप घर बैठे भू-संपर्क कर सकते हैं इनकी कीमत तीन हज़ार रुपए से लेकर पंद्रह हज़ार रुपए तक होती है। वन-स्नान शिविरों के लिए लोग एक सप्ताहांत पर बीस हज़ार से पचास हज़ार रुपए तक खर्च कर रहे हैं। यह उद्योग आपकी थकान, चिंता और मानसिक थकावट को भुनाना जानता है।
भारत के लिए ख़ास बात
यहाँ एक दिलचस्प सच्चाई है ये चलन हमारे लिए नए नहीं हैं। भारत में सदियों से मंदिरों में नंगे पैर चलने की परंपरा रही है यह भू-संपर्क का ही एक रूप है। आयुर्वेद में “वनवास” यानी जंगल में समय बिताने को उपचार का हिस्सा माना गया है। फर्क बस इतना है कि पश्चिम ने इसे एक नया नाम दिया, सुंदर पैकेज बनाया और महंगे दाम पर बेचा।
तो क्या करें?
अगर आप वन-स्नान या भू-संपर्क आज़माना चाहते हैं, तो इसके लिए हज़ारों रुपए खर्च करने की ज़रूरत नहीं। घास पर नंगे पैर चलें, बगीचे में मिट्टी में हाथ डालें, किसी तालाब या नदी में पैर रखें ये सब भू-संपर्क के सरल और निःशुल्क तरीके हैं। किसी बगीचे में हफ्ते में एक घंटे शांति से बैठना भी वन-स्नान का एक रूप हो सकता है।
वन-स्नान और भू-संपर्क पर जो शोध है, वह उम्मीद जगाता है लेकिन अभी यह पूरी तरह सिद्ध नहीं है। इन्हें किसी वैद्य की सलाह या दवाई की जगह कभी नहीं लेना चाहिए। ये आपकी दिनचर्या में एक अच्छा जोड़ हो सकते हैं बशर्ते आप इन्हें समझदारी से अपनाएं और किसी की चमकदार बाज़ारबाज़ी में न बहें। प्रकृति से जुड़ना ज़रूरी है लेकिन उसके लिए लाखों खर्च करना बिल्कुल ज़रूरी नहीं।
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