पिछले फ़रवरी में मैं डेनमार्क के फ़ैरो आइलैंड्स में था। आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच, नॉर्थ अटलांटिक में बसे इस आइलैंड समूह (द्वीपसमूह) में जाने की मेरी चाहत सालों पुरानी थी। समंदर किनारे की ऊँची चट्टानें जो अनंत पानी में समा जाती हैं, हरियाली से भरी पहाड़ियाँ, छोटे-छोटे गाँव, घास की छत वाले घर… तस्वीरें देखकर हमेशा लगता था कि फ़ैरो जाना ही है। जब जाना हुआ, तो भावनाएँ समंदर की लहरों की तरह हिलोरें मार रही थीं। ऊपर से भीड़ भी बहुत कम। मौसम थोड़ा अजीब ज़रूर था कभी तेज़ धूप तो अचानक बारिश! पर यह तो इन आइलैंड्स की ख़ूबसूरती का ही हिस्सा है। गर्मी का तापमाड्स की एक ना भूलने वाली यात्रा
लंबा सफ़र, शाकाहारी खाने की चिंता ये सब बातें इस देश में पहुँचते ही बेमानी हो गईं। इनकी जगह ले ली कभी न भूलने वाले अनुभवों ने।
न 4 से 8 डिग्री के बीच रहता है। दिसंबर से लगभग चार महीने बर्फ़ गिरती है, और मार्च से कुदरत उसे पिघलाने का काम शुरू कर देती है।
मेरी यात्रा की शुरुआत फ़ैरो आइलैंड्स की राजधानी तोर्शान (Tórshavn) से हुई। पहुँचते ही मैंने एक सेल्फ़-ड्राइव कार रेंट पर ली, क्योंकि इसके बिना आइलैंड्स का सही मज़ा नहीं लिया जा सकता यह मुझे पहले ही पता चल चुका था। फ़ैरो में आप भारतीय ड्राइविंग लाइसेंस के साथ गाड़ी चला सकते हैं। वैसे अंतरराष्ट्रीय लाइसेंस साथ रखना समझदारी है, क्योंकि हमारा लाइसेंस अंग्रेज़ी में होता है और वहाँ की ऑफिशियल भाषा फ़ैरोइज़ (Faroese) है। पब्लिक बसें हैं ज़रूर, पर उनकी फ़्रीक्वेंसी कम है। आइलैंड्स की सड़कें बहुत अच्छी क्वालिटी की हैं, और समंदर के नीचे बनी टनल (सुरंगें) इन आइलैंड्स को आपस में बहुत ही स्मूथली जोड़ती हैं। यहाँ भेड़ें इतनी ज़्यादा हैं कि गाड़ी चलाते समय अचानक रास्ते में आ जाती हैं। इसलिए ड्राइविंग करते वक़्त भेड़ों और धुंध (फ़ॉग) का ख़ास ध्यान रखना पड़ता है। इसी तरह ऊँचाई वाले इलाक़ों के लिए मैंने वॉटरप्रूफ़ पैकिंग, मज़बूत जूते और थर्मल कपड़े साथ रखने की सावधानी बरती थी। मेरी एडवांस रिसर्च बहुत काम आई।
मुलाफ़ोसर (Múlafossur) वॉटरफ़ॉल इस ट्रिप की एक अद्भुत जगह थी। यह गासादालुर (Gásadalur) गाँव के वागार (Vágar) आइलैंड पर है। गाँव की आबादी मुश्किल से अट्ठारह है! यह आइलैंड ऐसा है कि पत्थर की विशाल चट्टानों से सीधा अटलांटिक समंदर में गिरता है। फ़रवरी का महीना होने के कारण पहाड़ियों पर बर्फ़ ज़मी थी। सफ़ेद चादरें, धुंध, समंदर, चट्टानें और इंद्रधनुष सब कुछ एक साथ देखने को मिला। गाँव से इस वॉटरफ़ॉल तक जाने का रास्ता आसान है। गाँव में घर भले ही कम थे, लेकिन बेहद ख़ूबसूरत थे।
सॉर्वैग्सवात्न (Sørvágsvatn) झील एक और ख़ूबसूरत जगह थी। इसके साथ ही मैंने ट्रैलैनीपा (Trælanípa) क्लिफ़ का मज़ा लिया। चट्टान पर स्थित इस झील के विशाल पानी के भंडार के ठीक पास समंदर की लहरें गरज रही थीं। दोनों का इतने पास होना और दोनों का पानी अलग होना यह सोचकर ही रोमांच हो आता था। इसे सामने देखना दिल को मोह लेने वाला अनुभव था। क्लिफ़ के लिए मैंने पैसे देकर एक गाइड की सर्विस ली क्योंकि वह ज़रूरी था, और जानकारी मिलने से मज़ा दुगना हो गया। गाइड ने मुझे वाइकिंग्स (Vikings) की कहानियाँ सुनाईं कि कैसे वे चट्टान से ग़ुलामों को नीचे समंदर में फेंक देते थे।
स्ट्रेमय (Streymoy) का साक्सुन (Saksun) गाँव भी बहुत ख़ूबसूरत था। सच कहूँ तो यह मेरी सबसे पसंदीदा जगह बन गया। काले रेत के बीच और पास की झील को पार करते हुए मैं यहाँ पहुँचा था। घास की छतों वाले घर, पुराना चर्च, फ़ार्म म्यूज़ियम—इन सबने यहाँ की पारंपरिक जीवनशैली का अहसास कराया। ध्यान रहे कि हाई टाइड (ज्वार) के समय गाँव के रास्ते पानी में डूब जाते हैं। इसलिए सफ़र से पहले टाइड का समय जान लेना बेहतर है। इसके अलावा दो और याद रह जाने वाले गाँव त्जोर्नुविक (Tjørnuvík) और गिजोग्व (Gjógv) थे, जो उत्तरी स्ट्रेमय में थे। गाँव का नेचुरल हार्बर, समंदर में खड़ी रंग-बिरंगी बोट्स, छोटी गलियाँ और कैफ़े—सब मन पर छप गए। कालुर (Kallur) जाने का अनुभव भी यादगार था। काल्सॉय (Kalsoy) से फ़ेरी (नाव) लेकर मैं लाइटहाउस पहुँचा। इसके लिए थोड़ी चढ़ाई करनी पड़ी, लेकिन वहाँ से चट्टानों और समंदर का जो नज़ारा दिखा, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता।
राजधानी तोर्शान में टिंगानेस (Tinganes) और ओल्ड टाउन घूमना बहुत बढ़िया रहा। टिंगानेस देश की पुरानी संसद है, जिसकी लाल दीवारें और हरी छतें कमाल की लग रही थीं। शाम को तोर्शान में टहलते हुए यहाँ के वाइब को और बेहतर तरीक़े से महसूस किया जा सकता है। फ़ैरो में एक चिंता खाने की थी एक तो आइलैंड्स और ऊपर से डेनमार्क देश, तो क्या शाकाहारी खाना मिलेगा? लेकिन तोर्शान में वीगन और वेज फ़ूड के काफ़ी ऑप्शन थे। ‘कैफ़े उमामी’ में बर्गर और ‘सिस्ट्रार’ में हरी सब्ज़ियों की डिशिज़ मिलीं, जबकि ‘बाइटिन’ में सैंडविच और सैलेड मिल गए। राजधानी के बाहर थोड़ी दिक्कत थी, पर यह बात मुझे पहले से पता थी, इसलिए मैंने सुपरमार्केट से ब्रेड, दूध, स्नैक्स वगैरह ख़रीद लिए थे। वैसे ब्रेड और हर्बल टी तो कई जगह आसानी से मिल जाती थी।
मुंबई से मेरी फ़्लाइट दुबई होते हुए कोपेनहेगन की थी, जिसमें लगभग बारह घंटे लगे। आगे अटलांटिक एयरवेज़ की फ़्लाइट से आख़िरकार फ़ैरो पहुँचा। पहुँचने में लगभग २४ घंटे लग गए। रिटर्न टिकट क़रीब एक लाख रुपये में पड़ी। लेकिन इस ख़र्चे के सामने जो आनंद मिला, उसके लिए बस यही कहूँगा पूरा पैसा वसूल है!
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