महाराष्ट्र में मानसून का आनंद लेने के लिए ढेरों विकल्प हैं। महाबलेश्वर, लोनावला, खंडाला  जरा हटकर सोचें तो कम घूमे गए विकल्प भी हैं। पश्चिमी घाट की चोटी पर गगनबावड़ा ऐसी ही एक जगह है। कोल्हापुर से करीब पचपन किलोमीटर की दूरी पर स्थित गगनबावड़ा हर साल भारी बारिश में सराबोर हो जाता है। यहाँ बादल मेहमान बनकर नहीं, बल्कि निवासी बनकर डेरा डालते हैं। इतने कि सड़कें, पेड़, घर और पहाड़ियाँ धुंध की हल्की चादर में लिपट जाती हैं। कहीं हवा के झोंकों के साथ बारिश तिरछी बरसती है, तो कहीं पल भर के लिए सूरज की किरणें बादलों से झाँक लेती हैं। यही अनूठा माहौल गगनबावड़ा को मानसून के सबसे मनोरम ठिकानों में शुमार कराता है।

सह्याद्रि की मुख्य पर्वतश्रृंखला के किनारे गगनबावड़ा बसा है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई करीब तीन हजार फीट है। इसके पश्चिम में कोंकण क्षेत्र और पूर्व में दक्खन का पठार शुरू होता है। अरब सागर से आने वाले बारिश के बादल सह्याद्रि से टकराने के बाद गगनबावड़ा पर मूसलाधार बरसते हैं। यहाँ का जंगल साल भर हरा-भरा रहता है। छोटी-छोटी नदियाँ, मौसमी झरने और कलकल बहता पानी मानसून में हर तरफ नजर आता है। गगनबावड़ा के आसपास चावल, काजू, आम आदि की खेती होती है। गगनबावड़ा की जिंदगी में बारिश एक पक्की साथी है। यहाँ के घरों की बनावट, खेती के तरीके, कपड़ों और जीवनशैली में मानसून का असर साफ दिखता है।

गगनबावड़ा का इतिहास दिलचस्प है। इसे यह नाम गगनगढ़ किले की वजह से मिला। शिलाहार राजाओं के जमाने से ही इस इलाके का सामरिक महत्व रहा है। बाद में मराठा साम्राज्य के दौर में भी गगनगढ़ का स्थान अटल रहा। आज हालाँकि किले के सिर्फ अवशेष ही बचे हैं। गगनबावड़ा में मराठा संस्कृति की झलक आज भी सुरक्षित है। यहाँ कोंकणी और महाराष्ट्रीयन संस्कृति का मिलन महसूस होता है।

गगनबावड़ा का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ के पॉइंट्स हैं। करूळ घाट और भुईबावड़ा घाट की ओर नजर डालते ही लगता है जैसे धरती अचानक हजारों फीट नीचे चली गई हो। बारिश के दिनों में यहाँ की घाटियाँ बादलों से लबालब भर जाती हैं। मानो नीचे धुंध का समंदर हो और उसमें से पहाड़ों की चोटियाँ झाँक रही हों। हवा की दिशा बदलते ही नजारे का पूरा रंग-ढंग पल भर में बदल जाता है। कभी मौसम साफ हो जाए तो दूर तक फैले जंगल दिखाई देते हैं। तो कभी सामने के पहाड़ भी नजर नहीं आते।

करूल घाट कोंकण की ओर जाने वाला पुराना रास्ता है। इसकी घुमावदार सड़क, गहरी घाटियाँ और बारिश की धुंध किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देती हैं। मानसून में सड़क के दोनों ओर कई झरने आकार लेते हैं। कुछ चंद दिनों के लिए बहते हैं, तो कुछ पूरे मौसम भर। फोटोग्राफरों के लिए करूळ घाट किसी स्वर्ग से कम नहीं। यहाँ जाकर फोटोग्राफी करेंगे तो यह बात माननी ही पड़ेगी। भुईबावड़ा घाट का मिजाज थोड़ा अलग है। यहाँ से दिखने वाली घाटियाँ ज्यादा विस्तृत हैं। हरा-भरा जंगल घना नजर आता है। बारिश के बाद पेड़ों पर चमकती पानी की बूँदें और दूर से सुनाई देती पक्षियों की चहचहाहट माहौल को मोहक बना देती है। सूर्यास्त से पहले अगर बादल थोड़े छँट जाएँ तो आकाश में केसरिया-बैंगनी रंगों का अनोखा मिश्रण बन जाता है। ऐसा नजारा कभी-कभार ही देखने को मिलता है, पर मिल जाए तो यादगार बन जाता है।

प्रकृतिप्रेमियों के लिए गगनबावड़ा के आसपास के जंगल जैवविविधता का खजाना हैं। यहाँ पक्षी, तितलियाँ और औषधीय वनस्पतियाँ भरपूर मात्रा में मिलती हैं। बारिश में जमीन पर हरी काई की चादर बिछ जाती है। पेड़ों के तनों पर फफूँद और काई जंगल को एक अलग ही रूप देते हैं। ट्रेकिंग के शौकीन गाइड के साथ जंगल की सैर कर सकते हैं। बारिश में फिसलन भरे रास्तों से बचना जरूरी है।

गगनगढ़ किले की सैर भी की जा सकती है। भले ही सिर्फ अवशेष बचे हों तो क्या? किले की दीवारें और दरवाजे आज भी मराठा इतिहास की गवाही देते हैं। ऊँचाई से सह्याद्रि पर्वतश्रृंखला और कोंकण की ओर का इलाका देखते ही आँखें ठंडी हो जाती हैं। मानसून में धुंध के बीच किले के अवशेष और भी अद्भुत लगते हैं।

गगनबावड़ा और कोल्हापुर के भोजन में तीखापन और स्वाद का संतुलन होता है। झुनका-भाकरी, पिठलं, भाजी, चावल, दाल, स्थानीय सब्जियाँ और घर की बनी चटनियाँ जरूर आजमाएँ। भजिए, चाय, मक्का का भी आनंद लें। होमस्टे में असली गाँव का खाना चखें। रहने के विकल्प यहाँ सीमित हैं। साफ-सुथरे गेस्टहाउस, लॉज और होमस्टे ही मुख्य विकल्प हैं। कई लोग कोल्हापुर में रुककर एक दिन के लिए गगनबावड़ा घूमने जाते हैं।

मुंबई से गगनबावड़ा पहुँचना आसान है। सड़क मार्ग से दूरी लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर है। मुंबई से कोल्हापुर तक एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्ग है। कोल्हापुर से गगनबावड़ा तक की सड़क अच्छी हालत में है। राज्य परिवहन की बसें भी चलती हैं। ट्रेन से कोल्हापुर जाकर वहाँ से वाहन द्वारा गगनबावड़ा पहुँचा जा सकता है। सबसे नजदीकी हवाई अड्डा कोल्हापुर है। एयरपोर्ट से डेढ़ घंटे में गगनबावड़ा पहुँचा जा सकता है।

मानसून में गगनबावड़ा जाने वालों को रेनकोट, मजबूत ग्रिपवाले जूते और गरम कपड़े साथ रखने चाहिए। वाहन धीमी गति से चलाना जरूरी है। घाटियों के किनारे खड़े होते समय सावधानी बरतें। कुल मिलाकर, गगनबावड़ा झरने देखने नहीं, बादलों से रूबरू होने जाने की जगह है। घाटियाँ निहारने नहीं, धुंध में घुल जाने की जगह है। सह्याद्रि की इस शांत चोटी पर समय बिताने के बाद समझ आता है कि प्रकृति की सबसे खूबसूरत आवाज कभी-कभी बारिश की लगातार गिरती बूँदें ही होती हैं।

जानने योग्य

गगनबावड़ा में हर साल 5,000 से 7,000 मिलीमीटर बारिश होती है।

सह्याद्रि की मुख्य पर्वतश्रृंखला के किनारे होने की वजह से यहाँ बादल कई बार सड़क तक उतर आते हैं।

करूळ घाट का रास्ता कोंकण और दक्खन के बीच के प्राचीन व्यापार-मार्गों में से एक माना जाता है।

मानसून में गगनबावड़ा के आसपास दर्जनों मौसमी झरने जीवंत हो उठते हैं।

गगनगढ़ किले का संबंध मराठा इतिहास और अमात्य बावड़ेकर परिवार से है, जो छत्रपति शिवाजी महाराज के अष्टप्रधान में से एक थे।

बारिश के मौसम में गगनबावड़ा का तापमान 18 से 24 डिग्री के बीच रहता है।

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