नेत्रावली। बारिश आ रही है। जून के उत्तरार्ध में ऐसा लिखना थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन… मन उछल रहा है बारिश में घूमने के लिए। और इसके लिए याद आता है गोवा का नेत्रावली। दक्षिण गोवा में बसे इस छोटे से गांव को प्रकृति ने खास सौगातें दी हैं। हरियाली, झरने, नदियां सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के इस आशीर्वाद से नेत्रावली एक संपूर्ण पर्यटन अनुभव साबित होता है।

नेत्रावली अभी कम जाना-पहचाना है, तो सबसे पहले जान लेते हैं कि वहां पहुंचें कैसे। मुंबई से वहां जाने के लिए सबसे सुविधाजनक विकल्प है रेलवे और सड़क मार्ग। ट्रेन से जाना हो तो पहुंचना होगा मडगांव। वहां से नेत्रावली लगभग 75 किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी तय करने के लिए टैक्सी लेनी पड़ेगी। फ्लाइट से जाना हो तो दाबोलिम एयरपोर्ट ज़्यादा सुविधाजनक रहेगा। वहां से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी तय करके नेत्रावली पहुंचा जा सकता है। मोपा से दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से हमारे शहर से यह गांव 600 किलोमीटर दूर है। जिन्हें लंबी रोड जर्नी पसंद है और सूट करती है, वे यह विकल्प भी अपना सकते हैं। ध्यान रहे कि नेत्रावली में इधर-उधर घूमने के लिए वाहन आसानी से नहीं मिलते। इसलिए स्थानीय स्तर पर भी टैक्सी किराए पर लेनी पड़ सकती है। अब बात करते हैं वहां घूमने लायक जगहों की।

मैनापी झरना और नेत्रावली अभयारण्य: वैसे तो वहां कई झरने हैं, लेकिन उनमें से किसी एक का ज़िक्र अनिवार्य रूप से करना हो तो वह है मैनापी। जंगल के भीतर स्थित इस झरने तक पहुंचेंगे तो पहला सुखद आश्चर्य यह होगा कि भीड़ नाम की चीज़ नहीं है। बारिश के मौसम में जब झरना अपने पूरे रंग में खिला होता है, तब आसपास भरपूर हरियाली भी होती है।

साथ में अभयारण्य भी ज़रूर देखें। पश्चिमी घाट के सर्वश्रेष्ठ जैव विविधता क्षेत्रों में इसकी गिनती होती है। पक्षी, तितलियां, सरीसृप और दुर्लभ वनस्पतियों की यहां भरमार है। प्रकृति निरीक्षण, पक्षी दर्शन और जंगल भ्रमण के शौकीनों के लिए यह समृद्ध और संतोष देने वाली जगह है। 211 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य से ज़ुआरी नदी की एक उपनदी निकलती है। वेरलेम में स्थित यह अभयारण्य दांडेली-अंशी टाइगर रिज़र्व, कोटिगाओ अभयारण्य, भगवान महावीर अभयारण्य और मोलेम नेशनल पार्क से सटा हुआ है। इससे समझा जा सकता है कि अभयारण्य और आसपास का पूरा इलाका कितना प्राकृतिक है। जीप सफारी का आनंद लेने वालों को मैनापी या सावरी झरना पैकेज में देखने को मिलता है। ऑनलाइन बुकिंग गोवा सरकार की वेबसाइट पर की जा सकती है।

सावरी झरना: अभयारण्य की हरियाली के बीच बसा यह झरना मानसून में घूमने की शानदार जगह है। झरने तक पहुंचने के लिए थोड़ा पैदल चलना पड़ता है। रास्ते में जंगल, वनस्पति और पक्षी देखने को मिलते हैं, इसलिए यह पैदल सफर भी सुहाना बन जाता है। ध्यान रहे कि झरने के बिल्कुल पास जाने से बचना चाहिए।

बबल लेक: स्थानीय लोग इसे “बुडबुड्यांची तळी” कहकर पुकारते हैं। यह नेत्रावली का सबसे अनोखा आकर्षण है। जंगल के बीचोंबीच स्थित यह एक छोटी सी झील है। इसका पानी समय-समय पर बुलबुले छोड़ता है। झील के पास खड़े होकर ताली बजाइए तो पानी में बुलबुलों की संख्या बढ़ जाती है। इस घटना को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं कोई इसे दैवीय चमत्कार मानता है तो कोई भूगर्भीय प्रक्रिया से जोड़ता है। आसपास का माहौल शांत है। हरियाली, पक्षियों की चहचहाहट और जंगल की खामोशी दिल में बस जाती है।

अब बात करते हैं ठहरने की। गोवा में अन्य जगहों पर मिलने वाले बड़े होटल या रिज़ॉर्ट्स नेत्रावली में नहीं हैं। यही इसकी खासियत भी है। गांव और आसपास के इलाके में होमस्टे, इको रिज़ॉर्ट, फॉरेस्ट कॉटेज और छोटे गेस्टहाउस मौजूद हैं। ज़्यादातर रहने की व्यवस्था स्थानीय परिवार ही संचालित करते हैं। धीरे-धीरे बढ़ती लोकप्रियता की वजह से अब आधुनिक सुविधाओं वाली इको-फ्रेंडली प्रॉपर्टीज़ भी वहां बनने लगी हैं। बेहतर विकल्प के लिए कई लोग मडगांव, क्वेपेम या कानाकोणा में रुकते हैं और दिन में नेत्रावली घूमकर वापस अपने ठिकाने लौट जाते हैं। बेहतर यही रहेगा कि एक दिन नेत्रावली में ही रुककर वहां का आनंद लिया जाए। सबसे ज़रूरी बात जाने से पहले ठहरने की जगह पक्की कर लें। एक से ज़्यादा दिन रुकना चाहें तो भी कम से कम एक दिन की बुकिंग करके ही जाएं।

खाने-पीने का क्या? जहां ज़्यादा अपडेटेड होटल न हों, वहां खाने के विकल्प भी सीमित होते हैं, है ना? लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खाने की कोई दिक्कत है। सादा, ताज़ा और घर जैसा खाना वहां आसानी से मिल जाता है। होमस्टे और गेस्टहाउस में अच्छी सुविधा मिल सकती है। नारियल की ग्रेवी वाली सब्ज़ियां और गोवा के असली पकवान ज़रूर चखने चाहिए।

आखिर में एक बात। नेत्रावली में मटोली बाज़ार लगता है। राज्य में गणेश चतुर्थी को चोवथ कहकर मनाया जाता है। इस पर्व की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है मटोली। गणपति बप्पा की मूर्ति के ऊपर लकड़ी और बांस से बनाई जाने वाली छतरी को यहां मटोली कहते हैं। इसे जंगल में मिलने वाले फल, फूल, औषधीय पौधे, सब्ज़ियां, जड़ें, कंद, पत्ते और वनोपज से सजाया जाता है। यह पश्चिमी घाट की जैव विविधता का जीवंत प्रदर्शन है। यह परंपरा गोवा की अपनी खास पहचान है। गणेश चतुर्थी से पहले नेत्रावली और आसपास के आदिवासी इलाकों में मटोली के लिए ज़रूरी सामान इकट्ठा करने की हलचल शुरू हो जाती है। जंगल से मिलने वाले फल, बेलें, औषधीय पौधे, बीज, जंगली फूल और दुर्लभ वनोपज बाज़ार में बिक्री के लिए लाए जाते हैं। साथ ही स्थानीय मिठाइयां भी बिकती हैं। गणेशोत्सव के दौरान जाना हो तो इस बाज़ार का एक चक्कर ज़रूर लगाइएगा।

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