1952 की एक सुबह, मद्रास शहर में एक दुबला-पतला आदमी अन्न-जल त्यागकर बैठ गया। न कोई भीड़ थी, न कोई बड़ा एलान। बस एक मांग थी  तेलुगू भाषी लोगों के लिए अलग राज्य।

58 दिन बाद, वो आदमी नहीं रहा। लेकिन उसकी मौत ने भारत का नक्शा हमेशा के लिए बदल दिया।

ये कहानी है पोट्टि श्रीरामुलु की। एक ऐसे स्वतंत्रता सैनिक की, जिसका नाम आज बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन जिसके बलिदान ने पूरे देश में राज्यों के बनने का तरीका ही बदल दिया।

श्रीरामुलु गांधीवादी विचारधारा से जुड़े थे। नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था, भारत छोड़ो आंदोलन में भी शामिल हुए, और इस दौरान कई बार जेल भी गए। आज़ादी मिलने के बाद उन्होंने एक नई लड़ाई छेड़ी तेलुगू भाषी इलाकों को तत्कालीन मद्रास प्रांत से अलग करके एक स्वतंत्र आंध्र राज्य बनाने की मांग।

ये मांग कोई नई बात नहीं थी। 1910 के दशक से ही भाषा के आधार पर राज्य बनाने की चर्चा चलती आ रही थी। लेकिन उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस विचार के सख्त खिलाफ थे। उन्हें डर था कि भाषा के आधार पर राज्य बांटने से देश की एकता कमज़ोर पड़ सकती है। मद्रास प्रांत के तत्कालीन मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी भी इसी सोच के साथ खड़े थे।

19 अक्टूबर 1952 को श्रीरामुलु ने अन्न-जल त्यागने का फैसला ले लिया। शुरुआत में सरकार ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। दिन पर दिन बीतते गए, लेकिन दिल्ली से कोई ठोस जवाब नहीं आया।

जैसे-जैसे श्रीरामुलु की सेहत बिगड़ती गई, तेलुगू भाषी इलाकों में लोगों के अंदर गुस्सा पनपने लगा। आखिरकार 12 दिसंबर को नेहरू ने राजगोपालाचारी को एक चिट्ठी लिखी। इसमें उन्होंने खुद माना कि आंध्र क्षेत्र में लोगों की निराशा अब हद पार कर रही है, और सरकार इसे और नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। नेहरू ने आखिरकार अलग राज्य की मांग मान ली।

लेकिन औपचारिक एलान में देरी हो गई। और इसी देरी की वजह से श्रीरामुलु का अनशन जारी रहा। 15 दिसंबर 1952 को, 58 दिनों तक भूखे रहने के बाद, उन्होंने दम तोड़ दिया।

ये खबर फैलते ही विशाखापट्टनम, विजयवाड़ा, गुंटूर, नेल्लोर जैसे शहरों में हालात बेकाबू हो गए। सरकारी इमारतों पर हमले हुए, रेलवे लाइनें रोक दी गईं, और पुलिस की गोलीबारी में कई लोगों की जान चली गई। मद्रास और आंध्र क्षेत्र में आम ज़िंदगी पूरी तरह ठप पड़ गई थी।

19 दिसंबर 1952 को, यानी श्रीरामुलु की मौत के महज़ चार दिन बाद, नेहरू ने आंध्र राज्य बनाने का औपचारिक एलान कर दिया। एक अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य आधिकारिक रूप से वजूद में आया, और कुर्नूल को इसकी राजधानी बनाया गया।

लेकिन श्रीरामुलु की मौत का असर सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रहा। उनके बलिदान के बाद बनी राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट ने आगे चलकर पूरे देश में भाषा के आधार पर राज्यों को दोबारा बांटने की नींव रखी। 1956 में आए राज्य पुनर्गठन अधिनियम ने भारत के उस नक्शे की बुनियाद तैयार की, जिसे हम आज देखते हैं। तेलुगू भाषी लोग आज भी श्रीरामुलु को प्यार और सम्मान से “अमरजीवी” यानी अमर आत्मा कहकर याद करते हैं।

आज, सात दशक बाद, एक और अनशन देश का ध्यान खींच रहा है। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो पहले भी लद्दाख के लिए कई बार अनशन कर चुके हैं, इस बार दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक अलग वजह से बैठे हैं। परीक्षा पेपर लीक मामले को लेकर वो शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, और युवाओं के एक आंदोलन के समर्थन में नमक-पानी पर 19 दिनों से ज़िंदा हैं।

मांग अलग है, समय अलग है, लेकिन तरीका वही है अपनी जान की बाज़ी लगाकर सरकार का ध्यान खींचना।

सवाल ये है कि क्या आज के दौर में, जहां खबरें कुछ ही घंटों में भुला दी जाती हैं, एक अनशन का वही असर हो सकता है जो 1952 में हुआ था? तब देश के पास सीमित मीडिया थी, फिर भी एक आदमी के बलिदान की खबर हर घर तक पहुंची थी और लोगों को सड़कों पर उतार दिया था।

इतिहास इतना ज़रूर बताता है कि भारत में अनशन सिर्फ विरोध जताने का एक तरीका नहीं रहा। कई बार ये बदलाव की सबसे बड़ी वजह बना है। पोट्टि श्रीरामुलु की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां एक आम आदमी के त्याग ने पूरे देश के नक्शे को नया आकार दे दिया।

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