By: Ragini Chaubey

अगर आपसे पूछा जाए कि गुरु पूर्णिमा आपके लिए कितनी खास है, या आप इसे कैसे मनाते हैं, तो शायद आपका जवाब होगा हर साल गुरु पूर्णिमा को हम अपने गुरु से आशीर्वाद लेते हैं, उन्हें धन्यवाद देते हैं, मंदिर वगैरह चले जाते हैं, बस।

लेकिन अगर आपसे पूछा जाए कि हम गुरु पूर्णिमा मनाते क्यों हैं, तो शायद बहुत ही कम लोग होंगे जिन्हें इसके पीछे की सच्चाई मालूम होगी। चलिए जानते हैं कि गुरु पूर्णिमा हम क्यों और किसके लिए मनाते हैं।

असल में आज ही के दिन वेद व्यास जी का जन्म हुआ था, जिन्हें आदि गुरु कहा जाता है। उन्हें आदि गुरु यानी सबसे पहला गुरु  इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने सिर्फ ज्ञान इकट्ठा ही नहीं किया, बल्कि उसे व्यवस्थित करके अपने शिष्यों तक पहुंचाया भी।

वेदों को उन्होंने अपने शिष्यों में बांटकर उन्हें सिखाया, और यहीं से गुरु-शिष्य परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। इसी वजह से इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि यह पूरा दिन उन्हीं को समर्पित है।

अगर वेद व्यास जी को देखा जाए तो वो कोई आम ऋषि नहीं थे। उन्हें काफी महान और परिपूर्ण व्यक्ति माना जाता है, और इसके पीछे वजह है उनका ज्ञान।

जो महाभारत हम पढ़ते हैं, वो और कोई नहीं बल्कि वेद व्यास जी ने ही लिखा है, जो आज तक की सबसे लंबी काव्य रचनाओं में से एक मानी जाती है। हिंदू धर्म के अठारह पुराणों में भी उन्होंने योगदान दिया, और तो और, हमारे चारों वेद भी और किसी ने नहीं, वेद व्यास जी ने ही संकलित किए।

सोचिए, एक ही इंसान ने इतने महान काम किए जो शायद ही कोई और कर पाए। तो सबसे श्रेष्ठ गुरु कहलाने का हक भी वेद व्यास जी को ही जाता है।

एक बात यहां समझनी जरूरी है वेदों का ज्ञान उस समय तक सिर्फ मौखिक परंपरा में बिखरा हुआ था, अलग-अलग ऋषियों और परिवारों के पास टुकड़ों में मौजूद था। वेद व्यास जी ने इस पूरे ज्ञान को इकट्ठा करके, उसे चार हिस्सों  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में बांटा।

यह कोई साधारण काम नहीं था। यह मानो पूरी सभ्यता के ज्ञान को एक जगह इकट्ठा करके, उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने जैसा था। और यही वजह है कि उन्हें सिर्फ एक लेखक नहीं, बल्कि गुरु परंपरा का जनक माना जाता है।

दिलचस्प बात यह भी है कि गुरु पूर्णिमा सिर्फ हिंदू धर्म का ही त्योहार नहीं है। बौद्ध धर्म में इसी दिन को बहुत खास माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश सारनाथ में इसी दिन दिया था।

जैन धर्म में भी इस दिन का अपना महत्व है। कहा जाता है कि भगवान महावीर ने अपने पहले शिष्य गौतम स्वामी को इसी दिन स्वीकार किया था। यानी अलग-अलग धर्मों में यह दिन अपने-अपने तरीके से एक ही भावना को दर्शाता है  जिसने भी हमें ज्ञान दिया, उसके प्रति आभार जताना।

यहीं से समझ आता है कि गुरु पूर्णिमा सिर्फ किसी एक परंपरा का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप की एक साझा सोच है, जो सदियों से चली आ रही है।

अब जब हम वापस आज के दिन की बात करें, तो हर साल जब हम अपने शिक्षक या गुरु के पैर छूते हैं, उन्हें धन्यवाद कहते हैं, तो असल में हम उसी बहुत पुरानी परंपरा का एक छोटा सा हिस्सा निभा रहे होते हैं, जिसकी शुरुआत हजारों साल पहले वेद व्यास जी से हुई थी।

वेद व्यास जी की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि ज्ञान को इकट्ठा करना और उसे आगे पहुंचाना, प्राचीन समय में एक बेहद पवित्र काम माना जाता था। आज हम भले ही मंदिर जाकर या गुरु का आशीर्वाद लेकर इस दिन को छोटे रूप में मनाते हों, लेकिन इसके पीछे की भावना वही पुरानी है  जिसने हमें अंधकार से रोशनी की ओर ले जाने का काम किया, उसके प्रति सम्मान।

तो अगली बार जब कोई आपसे पूछे कि गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है, तो सिर्फ यह मत कहिएगा कि यह गुरु को धन्यवाद देने का दिन है। यह भी बताइएगा कि यह उस एक इंसान को याद करने का दिन है, जिसने अकेले ही वो ज्ञान इकट्ठा किया, लिखा और सिखाया, जिस पर आज भी पूरी भारतीय सभ्यता की नींव टिकी हुई है।

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