भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार किसी व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया को मंज़ूरी दी है। उत्तर प्रदेश के हरीश राणा, जो बारह से अधिक वर्षों से पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में थे, उनका लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दे दी गई है। यह फ़ैसला भारत की क़ानूनी, चिकित्सा और नैतिक दुनिया में एक बड़ी हलचल मचा रहा है।
बारह साल की ख़ामोशी
हरीश राणा की कहानी २०१३ में शुरू होती है। उस साल वे एक इमारत से गिरे और उनके मस्तिष्क को गहरी चोट आई। तब से वे पूरी तरह चिकित्सा सहायता पर निर्भर थे। उनके आसपास की दुनिया से उनका कोई संपर्क नहीं था।
उनके पिता ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल की। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने यह अर्ज़ी सुनी। मेडिकल बोर्ड ने जांच की और पाया कि वर्षों में हरीश राणा की न्यूरोलॉजिकल स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था। उन्होंने आसपास के वातावरण के प्रति कभी कोई अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं दी।
अदालत ने कहा कि क्लिनिकली दी जाने वाली पोषण प्रक्रिया को वापस लिया जा सकता है।
एक ज़िंदगी बारह साल से थमी हुई थी। अब उसे अपने प्राकृतिक अंत तक पहुंचने दिया जाएगा।
क़ानून तो था, पर कभी काम नहीं आया
भारत में पैसिव यूथेनेशिया की क़ानूनी पहचान कोई नई बात नहीं है। लेकिन यह पहचान सालों तक काग़ज़ों तक ही सीमित रही।
इस पूरे मसले की जड़ें अरुणा शानबाग के मामले में हैं। वे मुंबई में एक नर्स थीं। १९७३ में उनके साथ हमला हुआ और वे वेजिटेटिव स्टेट में चली गईं। बयालीस साल तक वे इसी हालत में रहीं और २०१५ में निमोनिया से उनका स्वाभाविक निधन हो गया। उनके मामले ने अदालतों को एक बहुत गहरे सवाल से रूबरू किया: जब जीने की संभावना ख़त्म हो जाए, तो किसी को ज़िंदा रखते रहने का क्या अर्थ है?
२०१८ में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को औपचारिक मान्यता दी। साथ ही लिविंग विल की अवधारणा भी सामने आई। लिविंग विल एक दस्तावेज़ है जिसमें कोई व्यक्ति पहले से यह दर्ज कर सकता है कि अगर वह ख़ुद फ़ैसला लेने में असमर्थ हो जाए, तो उसे लाइफ सपोर्ट दिया जाए या नहीं।
लेकिन अदालत में लिखे क़ानून हमेशा अस्पतालों की दीवारों तक नहीं पहुंचते। सालों तक ऐसी कोई अर्ज़ी मंज़ूर नहीं हुई।
हरीश राणा का मामला इसीलिए अलग है। उन्होंने कोई लिविंग विल नहीं छोड़ी थी। ऐसे में अदालत को यह तय करना पड़ा कि उनके हित में क्या सही रहेगा।
डॉक्टर क्या कहते हैं इन मामलों में
न्यूरोलॉजिस्ट जो लंबे समय से ब्रेन इंजरी के मरीज़ों के साथ काम करते हैं, वे बताते हैं कि लंबी न्यूरोलॉजिकल निष्क्रियता के बाद ठीक होने की संभावना बहुत कम हो जाती है। जब पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट कई साल तक बनी रहे, तो सार्थक रिकवरी लगभग असंभव मानी जाती है।
ऐसे मरीज़ सांस लेते रहते हैं। बुनियादी शारीरिक क्रियाएं जारी रहती हैं। लेकिन चेतना और दुनिया से जुड़ने की क्षमता वापस नहीं आती।
परिवारों के लिए यह स्थिति असाधारण रूप से पीड़ादायक होती है। जिस इंसान से वे प्यार करते हैं वह शारीरिक रूप से उनके सामने होता है, लेकिन जिस शख़्सियत और जागरूकता ने उसे वह इंसान बनाया था, उसकी कोई झलक नहीं मिलती। परिवार उसकी देखभाल करता रहता है, उससे जुड़ा रहता है, और साथ ही उस शांत सच्चाई से भी जूझता रहता है कि जिस ज़िंदगी को वे जानते थे वह कब की जा चुकी है। चिकित्सक इन मामलों को अपने करियर के सबसे कठिन अनुभवों में गिनते हैं। यह सब थोड़ा समझने में वक़्त लगता है।
दुनिया भर में यह मसला कहां तक पहुंचा
तो बाक़ी दुनिया कहां खड़ी है। नीदरलैंड्स ने २००१ में यूथेनेशिया को क़ानूनी मान्यता दी थी। यह दुनिया में पहली बार था। वहां एक्टिव और पैसिव दोनों रूपों की अनुमति है, बशर्ते मरीज़ असहनीय पीड़ा में हो और ठीक होने की कोई उचित संभावना न हो।
बेल्जियम ने एक साल बाद यही राह अपनाई। २०१४ में उसने इस क़ानून को नाबालिग़ों पर भी लागू किया, माता-पिता की सहमति की शर्त के साथ।
कनाडा में २०१५ में सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद असिस्टेड डाइंग का रास्ता खुला। कोलंबिया ने तो १९९७ में ही अपने संवैधानिक न्यायालय के ज़रिए यह अधिकार दे दिया था। स्पेन ने २०२१ में यूथेनेशिया और मेडिकली असिस्टेड सुसाइड दोनों को मान्यता दी।
न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कई राज्यों ने भी इस दिशा में अलग-अलग क़ानून बनाए हैं। इन देशों ने विस्तृत सुरक्षा उपायों के साथ असिस्टेड डाइंग को एक विनियमित चिकित्सा प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया है।
अक्तूबर २०२५ में उरुग्वे इस सूची में नया नाम जुड़ा। ब्रिटेन की संसद ने हाल ही में एक विधेयक पास किया जो टर्मिनल बीमारी से पीड़ित वयस्कों को असिस्टेड डाइंग की इजाज़त देता है। फ्रांस में भी ऐसा ही प्रस्ताव ज़ेरे बहस है।
जो विचार कभी बहुत कट्टरपंथी लगता था, वह अब दुनिया के कई देशों में मुख्यधारा की नीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
भारत ने जो रेखा नहीं लांघी
यह सब जानना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि भारत का रुख़ अभी भी स्पष्ट रूप से सीमित है।
एक्टिव यूथेनेशिया यहां अभी भी ग़ैर-क़ानूनी है। कोई डॉक्टर मौत लाने के इरादे से कोई दवा नहीं दे सकता।
हरीश राणा के मामले में जो अनुमति मिली वह इलाज वापस लेने की है, न कि मौत की दवा देने की। यह फ़र्क़ क़ानून में बहुत महत्वपूर्ण है।
इस संदर्भ में स्विट्ज़रलैंड का उदाहरण समझना ज़रूरी है। स्विट्ज़रलैंड को दुनिया के सबसे उदार देशों में गिना जाता है, लेकिन वहां भी एक स्पष्ट सीमा है। डॉक्टर दवा लिख सकते हैं, लेकिन उसे मरीज़ को देना उनके लिए क़ानूनन मना है। दवा मरीज़ को ख़ुद लेनी होती है। यानी मरीज़ की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है और चिकित्सक की भूमिका वहीं ख़त्म हो जाती है जहां दवा लिखी जाती है। भारत की क़ानूनी सीमा इससे भी कहीं ज़्यादा संकरी है। इस वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हरीश राणा के मामले में दी गई अनुमति भारतीय क़ानून के भीतर अत्यंत सावधानी से उठाया गया एक छोटा क़दम है।
लिविंग विल: एक विकल्प जिसे कोई नहीं जानता
हरीश राणा का केस एक और बात सिखाता है। अगर उन्होंने लिविंग विल लिखी होती, तो उनके परिवार को सालों की क़ानूनी जद्दोजहद से न गुज़रना पड़ता।
लेकिन भारत में लिविंग विल के बारे में जागरूकता बहुत कम है। ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं कि ऐसा कोई विकल्प मौजूद है। अस्पताल इसके बारे में मरीज़ों को आमतौर पर नहीं बताते। और यही सबसे बड़ी समस्या है, वैसे इस पर बहुत कुछ और भी कहा जा सकता है।
नतीजा यह होता है कि जब संकट आता है तो परिवार भावनात्मक रूप से टूटा होता है। उसके पास न कोई दस्तावेज़ होता है, न कोई स्पष्ट मार्गदर्शन।
क़ानून बना है, लेकिन उस तक आम लोगों की पहुंच अभी बहुत कम है।
नैतिकता का सवाल जो हल नहीं होता
यह फ़ैसला उन गहरे नैतिक सवालों का जवाब नहीं देता जो यूथेनेशिया के इर्द-गिर्द हमेशा से रहे हैं।
कई धार्मिक और दार्शनिक परंपराएं मानती हैं कि जीवन हर हाल में बनाए रखा जाना चाहिए। उनकी चिंता है कि असिस्टेड डेथ को क़ानूनी मान्यता देने से समाज में जीवन के प्रति सम्मान कमज़ोर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ़ यह भी कहा जाता है कि गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता अलग नहीं की जा सकतीं। अगर ठीक होना असंभव हो तो लंबे इलाज को अस्वीकार करने का अधिकार होना चाहिए।
पैलिएटिव केयर विशेषज्ञों का नज़रिया कुछ अलग है। वे कहते हैं कि पीड़ा का समाधान हमेशा मौत नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय देशों को दर्द प्रबंधन, हॉस्पिस केयर और भावनात्मक सहयोग में कहीं ज़्यादा निवेश करना चाहिए। जहां पैलिएटिव केयर मज़बूत होती है, वहां यूथेनेशिया की मांग अक्सर कम होती है।
भारत की स्थिति और जटिल है। यहां जीवन के अंतिम चरण में देखभाल की सुविधा असमान है। परिवारों को लंबी बीमारी का बोझ बड़े पैमाने पर अकेले उठाना पड़ता है। इसलिए “मरने के अधिकार” का सवाल एक दूसरे सवाल से भी जुड़ा है: क्या भारत में “बिना असहनीय पीड़ा के जीने का अधिकार” भी उतना ही सुरक्षित है?
एक शांत फ़ैसले की गूंज
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में जो किया वह कोई बड़ा सुधार नहीं है। यह एक छोटा लेकिन गहरा क़दम है।
अदालत ने उस सच्चाई को स्वीकार किया जिसे भारत के बहुत से परिवार सालों से चुपचाप झेल रहे हैं। कई घरों में कोई न कोई चिकित्सकीय रूप से निलंबित अवस्था में है। ये कहानियां अस्पताल के बिस्तरों के पास पलती हैं, छोटे कमरों में जो देखभाल के वार्डों में बदल जाते हैं, और उन परिवारों की आंखों में जो प्यार, उम्मीद और बेबसी के बीच धीरे-धीरे थकते जाते हैं। इनमें से अधिकतर कहानियां कभी किसी अदालत तक नहीं पहुंचतीं।
यह फ़ैसला हर सवाल का जवाब नहीं है। लेकिन यह बताता है कि क़ानून अब उस तरफ़ देखने को तैयार है।
और कभी-कभी, जब जीने की संभावना छिन जाती है, तो शायद करुणा का असली अर्थ यही होता है कि मौत को इज़्ज़त के साथ आने दिया जाए।
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