झारखंड के पलामू ज़िले में लगा एक स्थानीय मेला, जो खुशी और आस्था का प्रतीक होना चाहिए था, अचानक चिंता का कारण बन गया। मेले में खाना खाने के बाद बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ गए। देखते ही देखते उल्टी, पेट दर्द और दस्त जैसी शिकायतें सामने आने लगीं। बच्चों और बड़ों को तत्काल नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्रों में ले जाया गया। डॉक्टरों की त्वरित मदद से स्थिति काबू में आई, लेकिन इस घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
हालांकि अधिकांश लोग इलाज के बाद स्वस्थ हो गए, फिर भी यह मामला केवल एक दुर्घटना भर नहीं है। ग्रामीण भारत में मेले और धार्मिक आयोजन सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा हैं। ये अवसर लोगों को जोड़ते हैं, रिश्तों को मजबूत करते हैं और परंपराओं को जीवित रखते हैं। लेकिन ऐसे आयोजनों में अक्सर स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित होती हैं और निगरानी व्यवस्था उतनी सख्त नहीं होती। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी सैकड़ों लोगों को प्रभावित कर सकती है।
मेलों में अस्थायी खाने-पीने की दुकानें आम बात हैं। कई बार ये दुकानें बिना पंजीकरण या उचित प्रशिक्षण के चलती हैं। खुले में रखी सामग्री, धूल और गर्मी के संपर्क में आने वाला भोजन, लंबे समय तक बिना ढके रखा पकवान और असुरक्षित पानी का इस्तेमाल, ये सब मिलकर जोखिम बढ़ा देते हैं। भीड़भाड़ वाले माहौल में तेज़ी से परोसने की होड़ में सफाई और सावधानी पीछे छूट जाती है।
इस घटना ने बच्चों की संवेदनशीलता को भी उजागर किया है। मेले में बच्चे सबसे पहले चाट, पकौड़ी या मिठाइयों की ओर आकर्षित होते हैं। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों की तुलना में कमज़ोर होती है। ऐसे में संक्रमण उन्हें जल्दी घेर लेता है। शुरुआत में हल्की उलझन या मतली जैसी शिकायत, थोड़े समय में गंभीर रूप ले सकती है।
भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर कानून मौजूद हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका पालन हर जगह समान रूप से नहीं हो पाता। स्थायी दुकानों की जांच तो होती है, पर अस्थायी स्टॉल अक्सर निगरानी से बच जाते हैं। कर्मचारियों की कमी और दूरदराज़ इलाकों तक पहुंचने की मुश्किलें भी एक बड़ी चुनौती हैं।
सिर्फ नियम बनाना काफी नहीं है, जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। उपभोक्ता अक्सर यह नहीं सोचते कि खाना कैसे तैयार हुआ या कितनी देर से रखा है। वहीं, कई विक्रेताओं को भी साफ-सफाई के बुनियादी नियमों की पूरी जानकारी नहीं होती। साफ पानी का उपयोग, भोजन को ढककर रखना, बासी सामग्री से बचना और हाथों की स्वच्छता जैसे सरल उपाय कई बड़ी समस्याओं को रोक सकते हैं।
यह घटना एक चेतावनी की तरह है। त्योहार और मेले हमारे समाज की पहचान हैं। इन्हें डर का कारण नहीं बनना चाहिए। स्थानीय प्रशासन यदि पहले से जांच, स्टॉल का पंजीकरण और आयोजन स्थल पर स्वास्थ्य निगरानी जैसी व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करे, तो जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही, जनजागरूकता अभियान भी जरूरी हैं ताकि लोग खुद सतर्क रहें।
आखिरकार, खाद्य सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। जश्न तभी सार्थक है जब उसमें शामिल हर व्यक्ति सुरक्षित और स्वस्थ रहे। परंपराएँ तभी जीवित रहती हैं जब उनके साथ सावधानी और जिम्मेदारी भी जुड़ी हो।
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