कांवड़ यात्रा इस साल भी शानदार तरीके से संपन्न हुई। हरिद्वार में करीब 4.8 करोड़ कांवड़िए गंगाजल लेने पहुंचे, और यात्रा के आखिरी दो दिनों में ही करीब 2,000 मीट्रिक टन कचरा जमा हुआ। पूरी यात्रा के दौरान कुल मिलाकर लगभग 7,000 मीट्रिक टन कचरा निकला। यह आंकड़ा सुनने में जितना बड़ा लगता है, उतना ही यह हमसे एक सीधा सवाल भी पूछता है।
सवाल यह नहीं कि कांवड़ियों ने यात्रा पूरी की या नहीं। सवाल यह है कि जिस तरह यात्रा पूरी होनी चाहिए थी, क्या उस जिम्मेदारी को भी उतनी ही गंभीरता से निभाया गया? रास्तों पर बिखरी गंदगी, घाटों पर जमा कचरा यह सिर्फ एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारी आस्था पर उठता एक सवाल है।
एक पल के लिए सोचिए। अगर यही कचरा किसी और ने आपके घर के बाहर फैला दिया होता, तो आपको कैसा लगता? जाहिर है, गुस्सा आता। फिर यह देश हमारा घर क्यों नहीं है? क्या हम इस घर के सदस्य नहीं हैं?
अगर हम खुद को इस देश का, इस “घर” का सदस्य मानते हैं, तो घर की सफाई रखना भी उतनी ही हमारी जिम्मेदारी बनती है जितनी उसमें रहने का हक। सिर्फ दो दिन में 2,000 टन कचरा निकलना कोई छोटी बात नहीं है। यह हम देशवासियों के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
हम अक्सर देश की तरक्की को लेकर सरकार को कोसते हैं। सड़कों की हालत, सफाई व्यवस्था, नागरिक सुविधाएं हर बात पर उंगली उठाना हमें आसान लगता है। लेकिन शायद वक्त आ गया है कि हम अपनी तरफ भी वही उंगली उठाएं और खुद से पूछें, क्या हम यह सवाल पूछने के लायक हैं?
एक नागरिक के तौर पर जो कर्तव्य हमें निभाने चाहिए, क्या हम सच में वह निभा रहे हैं? यह सवाल किसी और से नहीं, खुद से पूछने वाला है। और शायद इसका जवाब हमें खुद ही मिल जाएगा, अगर हम ईमानदारी से इस पर सोचें।
हमारा भारत अपनी संस्कृति और परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां हर त्योहार की गूंज सिर्फ देश में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में सुनाई देती है। चाहे वह कांवड़ यात्रा हो, छठ हो, दिवाली हो, होली हो, या ईद का जुलूस हर उत्सव अपने साथ एक उत्साह, एक सामूहिकता लेकर आता है।
लेकिन जब कोई भी त्योहार खत्म हो जाता है, तो शायद हमें अगले दिन जरूर गौर करना चाहिए कि हमारे आसपास का पर्यावरण कैसा दिख रहा है। जिस दिन त्योहार के बाद भी हमें अपने आसपास साफ-सुथरा माहौल देखने को मिलेगा, समझ लीजिए कि हमने त्योहार मनाने का असली तरीका सीख लिया है।
हरिद्वार नगर निगम ने इस बार सफाई व्यवस्था में कुछ नई कोशिशें भी कीं। करीब एक हजार अतिरिक्त कर्मचारी और अस्सी से ज्यादा वाहन तैनात किए गए। पहली बार ड्रोन के जरिए सफाई पर निगरानी रखी गई, और कुछ जगहों पर सोलर सेंसर वाले डस्टबिन भी आजमाए गए। मुख्य घाटों पर सफाई स्वयंसेवक और ग्रीन चेकपॉइंट भी लगाए गए। यह तकनीक का इस्तेमाल दिखाता है कि प्रशासन अपनी तरफ से जिम्मेदारी निभाने की पूरी कोशिश कर रहा है।
लेकिन तकनीक और प्रशासनिक इंतजाम तभी तक कारगर हैं, जब तक हम खुद भी अपनी भूमिका समझें। नगर निगम आयुक्त नंदन कुमार ने खुद कहा कि यात्रा खत्म होने का मतलब यह नहीं कि सफाई का काम भी खत्म हो गया घाटों और सार्वजनिक स्थलों को पूरी तरह बहाल करने तक यह अभियान जारी रहेगा। यानी सरकारी तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। सवाल यह है कि क्या हम अपनी निभा रहे हैं।
आस्था कभी गंदगी की वजह नहीं बन सकती। आस्था वह चीज है जो हमें अनुशासन सिखाती है, संयम सिखाती है, और यह भी सिखाती है कि जिस भूमि को हम पवित्र मानते हैं, उसकी स्वच्छता बनाए रखना भी उतना ही धार्मिक कर्तव्य है जितना उस तक पहुंचना।
यह सिर्फ प्रशासन या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं हो सकती कि वह हर कांवड़िए के पीछे चलकर सफाई करवाए। असली बदलाव तभी आएगा जब हर श्रद्धालु खुद यह तय करे कि जिस रास्ते से वह गंगाजल लेकर गुजरा, वह रास्ता उसके पीछे भी उतना ही साफ रहे जितना यात्रा शुरू होने से पहले था। यह कोई मुश्किल शर्त नहीं है बस एक छोटी सी आदत है, जो हर श्रद्धालु अपने भीतर पैदा कर सकता है।
अगली बार जब कोई त्योहार आए, चाहे वह कांवड़ यात्रा हो या कोई और उत्सव, तो सिर्फ उसे मनाने भर की जिम्मेदारी न समझें। उसे जिम्मेदारी से मनाने की भी सोचें। क्योंकि असली उत्सव वह नहीं जो शोरगुल और भीड़ में खत्म हो जाए, बल्कि वह है जो अपने पीछे एक साफ-सुथरा, सम्मानजनक निशान छोड़ जाए।
यही वह जवाबदेही है जो एक जिम्मेदार नागरिक और एक सच्चे श्रद्धालु के बीच फर्क करती है। और शायद यही वह सबक है जो हर त्योहार के बाद हमें खुद से सीखना चाहिए।
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