आजकल फैशन में हर तरफ जींस ही जींस दिखती है। लड़का हो या लड़की, हर कोई जींस पहनना पसंद करता है, और अब ये सिर्फ ट्रेंड नहीं बल्कि रोज़ की ज़रूरत बन चुका है।

लेकिन अगर आप ध्यान से देखें, तो लड़कियों की जींस की जेब अक्सर लड़कों के मुक़ाबले काफी छोटी होती है। फोन जेब में डालो तो आधा बाहर लटकता है, बैठो तो चुभने लगता है।

बहुत से लोग मानते हैं कि ये जान-बूझकर किया गया है, ताकि लड़कियां कोई कीमती चीज़ या पैसा छुपा न सकें। अगर आप भी अब तक यही सोच रहे थे, तो पूरी सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प है।

अगर हम पुराने ज़माने की महिलाओं की बात करें, तो तब उनके पास बड़े-बड़े जेब जैसे थैले होते थे, जो वो अपनी कमर में बांधती थीं। ये कपड़ों में सिले नहीं होते थे, बल्कि पेटीकोट और स्कर्ट के बीच अलग से पहने जाते थे।

इसमें आसानी से चाबी का गुच्छा, सिक्के, गहने, चिट्ठियां, यहां तक कि सिलाई का सामान भी आ जाता था। ये पूरी तरह छुपी हुई भी रहती थी, यानी एक तरह की प्राइवेसी भी मिलती थी।

फिर 1800 के दशक में फैशन बदलने लगा। पतले, ग्रीक स्टाइल से प्रेरित रीजेंसी गाउन ट्रेंड में आए, जो हल्के और आज़ाद महसूस कराने वाले थे, पर इनमें बड़ी, छुपी हुई जेबों के लिए जगह ही नहीं बची।

तो जेबें छोटी होती गईं, और फिर कपड़ों से बाहर आ गईं, छोटे हैंडबैग यानी रेटिक्यूल की शक्ल में। विक्टोरियन दौर में स्कर्ट और भी पतली और कमर और भी टाइट होती गई, तो जेबें और सिकुड़ गईं। लेकिन कुछ महिलाओं ने इसका विरोध भी किया, और रैशनल ड्रेस सोसाइटी जैसे समूहों ने प्रैक्टिकल कपड़ों की मांग उठानी शुरू की।

1910 तक ये मांग और साफ हो गई। सफ्रेजेट सूट सामने आया, जिसमें कई फंक्शनल जेबें थीं। कपड़े अब सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि एक मक़सद के लिए भी बनने लगे थे।

यहीं पर वो मशहूर थ्योरी आती है। कहा जाता है कि सफ्रेजेट यानी महिलाओं के वोट के अधिकार के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ताओं को जान-बूझकर जेबें नहीं दी गईं, ताकि वो पर्चे या संगठन से जुड़ा सामान न छुपा सकें और उनका आंदोलन कमज़ोर पड़ जाए।

सुनने में ये थ्योरी बहुत ठोस लगती है, लेकिन इतिहासकारों को इसका कोई सबूत नहीं मिला। जिन समूहों पर रिसर्च हुई, जैसे वीमेंस सोशल एंड पॉलिटिकल यूनियन, उनमें कपड़ों और दमन का ऐसा कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया। उस दौर में महिलाओं के सामने वैसे भी इतनी असली पाबंदियां थीं कि नई कहानी गढ़ने की ज़रूरत ही नहीं थी।

फिर आया पहला विश्व युद्ध का दौर। जंग के बाद जब महिलाएं बड़ी संख्या में काम-काज और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुईं, तो उनके कपड़े भी ढीले और मर्दाना स्टाइल से प्रेरित होने लगे, और इसके साथ जेबें भी वापस आ गईं। ये बदलाव पूरी तरह पुराने ट्रेंड को नहीं पलट पाया, लेकिन इसने ये ज़रूर दिखा दिया कि जब कपड़ों का ढांचा इजाज़त देता है, तो प्रैक्टिकैलिटी वापस आ सकती है।

आज की बात करें तो कहानी फिर वहीं लौट आई है। लड़कियों की जींस उठाकर लड़कों की जींस से मिलाकर देखिए, फर्क साफ नज़र आता है। जेबें छोटी हैं, गहराई कम है, कई बार तो सिर्फ जेब जैसी सिलाई होती है, असली जेब होती ही नहीं।

इसकी वजहें उतनी नाटकीय नहीं जितनी लगती हैं, पर जुड़कर बड़ी बन जाती हैं। फिटेड डिज़ाइन साफ लाइनें चाहता है, और बड़ी जेबें कपड़े का शेप बिगाड़ सकती हैं। गहरी, मज़बूत जेब बनाने में ज़्यादा कपड़ा और मेहनत भी लगती है, और फास्ट फैशन में जहां मुनाफा कम होता है, ऐसी डिटेल्स सबसे पहले काटी जाती हैं।

लेकिन इसके पीछे एक गहरी सोच भी काम करती है। महिलाओं का शरीर हमेशा पतला, चिकना और वज़न-रहित दिखना चाहिए, ऐसी उम्मीद क्यों बनी? ये सोच पुराने पितृसत्तात्मक विचारों से आती है, जिन्होंने तय किया कि महिलाओं पर उभार या बल्क अच्छा नहीं लगता।

1954 में डिज़ाइनर क्रिश्चियन डायर ने एक मशहूर बात कही थी, मर्दों के पास जेबें चीज़ें रखने के लिए होती हैं, महिलाओं के कपड़े ज़्यादातर सजावट के लिए। ये लाइन आज तक याद है, क्योंकि इसमें एक कड़वी सच्चाई छुपी है।

इसके अलावा एक आदत भी बन गई है। दशकों से महिलाओं के कपड़े इस उम्मीद के साथ डिज़ाइन किए गए कि सामान उठाने का काम एक बैग करेगा, कपड़े नहीं। इसका असर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखता है, सफर करना हो या बस थोड़ी देर के लिए बाहर निकलना हो, फोन-चाबी-पर्स जैसी चीज़ें, जो असल में जेब में आ सकती थीं, अक्सर हाथ में या कंधे पर उठानी पड़ती हैं।

एक जेब छोटी सी चीज़ लगती है, जब तक वो आपके पास न हो। कपड़े सिर्फ शरीर ढकने के लिए नहीं होते, वो ये भी तय करते हैं कि आप क्या साथ ले जा सकते हैं और कितनी आज़ादी से घूम सकते हैं।

महिलाओं ने कभी अपनी जेबें कमर में बांधी थीं, भरी-पूरी पर छुपी हुई। फिर फैशन ने उन्हें छीना, कभी वापस दिया, फिर से बदल दिया। आज सवाल ये नहीं कि क्या हुआ, बल्कि ये है कि इतने सालों बाद भी इतनी छोटी सी चीज़ अब तक क्यों नहीं मिल पाई।

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