By: Ragini Chaubey

60,000 से ज़्यादा लोग आज भी रिलीफ कैंप में हैं। सवाल यह नहीं कि मणिपुर कब ठीक होगा  सवाल यह है कि क्या हम तब तक चुप रहेंगे?

अगर आप अपने साथ एक घटना होते हुए देखें  जहाँ आप अपने ही घर को जलते हुए देख रहे हो, और आप उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे  तो आपको कैसा लगेगा?

बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगेगा, हैं ना?

तो सोचिए  हमारे मणिपुर के भाइयों और बहनों को कैसा लगता होगा, जहाँ उन्हें अपना घर छोड़े हुए 3 साल से भी ज़्यादा हो चुके हैं।

मणिपुर  जो हमारे भारत का एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत राज्य है  वहाँ की स्थिति कुछ ऐसी है कि जहाँ दो समाज पहले बहुत खुशहाली से रहते थे, आज उनके बीच कुछ भी ठीक नहीं है।

पहले जानते हैं  यह पूरा मामला क्या है

मणिपुर में दो प्रमुख समुदाय रहते हैं  कुकी और मेइती। जो कुकी के लोग हैं वो पहाड़ों में रहते हैं, और जो मेइती हैं वो मैदानों में। आप भी सोचते होंगे  जो समुदाय हमेशा साथ रहते थे, उनके बीच दरार आने का आखिर क्या कारण था?

बात कुछ यह है कि 27 मार्च 2023 को मणिपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को मेइती समाज की अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग पर विचार करने की सिफारिश की। इसके बाद कुकी संगठनों और समुदाय के कई लोगों ने आशंका जताई कि यदि मेइती समाज को ST दर्जा मिलता है तो पहाड़ी क्षेत्रों में उनके भूमि अधिकार और संवैधानिक संरक्षण प्रभावित हो सकते हैं।

और फिर 3 मई 2023 को  वो दिन जो सब बदल गया  दोनों समुदायों के बीच तनाव हिंसा में बदल गया। इसके बाद घर जलाए गए, जानें गईं और हजारों लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

258 लोग मारे गए

60,000+ लोगों को घर छोड़ना पड़ा

4,786 घर जलाए गए

386 धार्मिक स्थल तोड़े गए मंदिर और चर्च दोनों

कितने लोगों ने अपना घर अपनी आँखों के सामने जलते हुए देखा  सोचिए ज़रा, उन पर क्या बीती होगी।

यह लोग अब कहाँ हैं?

और इसी के कारण लोगों को अपना घर छोड़कर रिलीफ कैंप्स में रहना पड़ रहा है  जहाँ न बराबर बिजली है, न नेटवर्क है, और न ही ज़रूरी साधन। एक ही कैंप में कई लोग रह रहे हैं, कपड़े की दीवारें बनाकर। कोई प्राइवेसी नहीं, कोई घर जैसी फीलिंग नहीं।

731 लोग रिलीफ कैंप में ही मर गए

281 रिलीफ कैंप अभी भी चल रहे हैं

हज़ारों बच्चों में trauma और PTSD के लक्षण

97% पूरे दक्षिण एशिया के विस्थापन में मणिपुर की हिस्सेदारी

एक प्लंबर, इंफाल से

“मेरे तीन बच्चे रोज़ रात को पूछते हैं  पापा, कब घर जाएंगे? एक बाप का दिल तो दुखता है। दूसरों का घर बनाते बनाते मैंने कभी अपने लिए बनाया हुआ घर दूसरों के घर में रहते नहीं देखा था। अब क्या करें।”

एक टीचर, थोबाल से

“मेरे जो स्टूडेंट्स थे  उन्हें मैंने पढ़ाया था, उनका ख्याल रखा था आज वो सोशल मीडिया पर गन लेकर पेट्रोल करते दिख रहे हैं। उन्हें समझाया भी, कुछ माने, कुछ नहीं माने। यह दर्द अलग ही तरह का है।”

“सवाल यह है कि अगर नॉर्मलसी आ गई है, तो हमें घर क्यों नहीं जाने देते?” एक विस्थापित महिला, नवंबर 2025 में सिक्योरिटी फोर्सेस से टकराते हुए

आखिर सरकार क्या कर रही है?

हिंसा के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई, राहत शिविर स्थापित किए और शांति बहाली के प्रयास शुरू किए। फरवरी 2025 में राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगाया गया। इसके बावजूद बड़ी संख्या में विस्थापित लोग अब भी अपने घरों में वापस नहीं लौट सके हैं।

प्रभावित परिवारों और कई नागरिक संगठनों का कहना है कि पुनर्वास और स्थायी समाधान की प्रक्रिया अपेक्षा से धीमी रही है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने भी स्थिति का जायजा लिया, लेकिन प्रभावित लोगों का कहना है कि उनके जीवन में अभी तक अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।

2023 से लेकर अब तक मणिपुर में 47 बार इंटरनेट बंद किया जा चुका है कुल 5,000 घंटे से ज़्यादा का ब्लैकआउट। जम्मू-कश्मीर के बाद भारत में सबसे ज़्यादा।

आज भी वहाँ के लोग सपना देख रहे हैं कि वो अपने परिवारों से कब मिलेंगे। कितने लोगों को अपने बच्चों से मिले काफी वक्त हो गया। कितने लोगों को अपनी पत्नी, अपने बच्चों और अपने परिवार से मिले हुए महीनों या वर्षों बीत चुके हैं  सिर्फ इसलिए कि वे अलग-अलग समुदायों से आते हैं।

हम 21वीं सदी के भारत में हैं, फिर भी पहचान, समुदाय और सामाजिक विभाजनों को लेकर संघर्ष खत्म नहीं हुए हैं। तो सोचिए  इसका असर उन लोगों पर कितना गहरा पड़ता होगा, जिनकी पूरी ज़िंदगी ही इस संघर्ष की वजह से बदल गई।

हमारे देश में इस मसले का हल कब तक आएगा, पता नहीं। यह घटना बेहद ज़रूरी है कि हम सब इस पर ध्यान दें, बात करें, और समझने की कोशिश करें  क्योंकि जो लोग रिलीफ कैंप्स में हैं, वो आज भी इंतज़ार कर रहे हैं। सिर्फ एक चीज़ का  घर वापस जाने का।

सवाल यह नहीं कि मणिपुर कब ठीक होगा।

सवाल यह है  क्या हम तब तक चुप रहेंगे?

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