भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका की भूमिका हमेशा से बहस का विषय रही है। विशेष रूप से, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का मुद्दा इस बहस के केंद्र में रहा है। पूर्व में NJAC का बिल न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए लाया गया था, लेकिन इसके चलते न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन को लेकर कई सवाल खड़े हो गए।
NJAC का प्रस्ताव और उद्देश्य
NJAC का बिल 2014 में संविधान के 99वें संशोधन के माध्यम से की संसद में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की पारंपरिक कॉलेजियम प्रणाली को बदलकर एक नया ढांचा तैयार करना था। इसमें न्यायपालिका, कार्यपालिका और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की भागीदारी सुनिश्चित की गई थी। संसद से यह बिल पास भी हो गया था। लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देता हुए निरस्त कर दिया था।
भारत में कॉलेजियम प्रणाली की शुरुआत 1993 में द्वितीय न्यायाधीश मामले के तहत हुई थी। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका सीमित होगी और नियुक्तियों की सिफारिशें केवल सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीशों के एक समूह (कॉलेजियम) द्वारा की जाएंगी।
बाद में, 1998 में तीसरे न्यायाधीश मामले में इस प्रणाली को और स्पष्ट किया गया, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम नियुक्तियों की सिफारिश करता है। तब से इसी प्रणाली के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के नए न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण की सिफारिश की जाती है। हालांकि, इस प्रणाली को लगातार पारदर्शिता की कमी और पक्षपात के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इसके बदले जिस NJAC की चर्चा पुनः की जा रही है, उसमें सरकार और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों की भागीदारी से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करने का खतरा बताकर इसका भी जोरदार विरोध किया जा रहा है। तो जरा समझते हैं कि इस NJAC के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
संविधान के अनुच्छेद 124-A के तहत NJAC की संरचना
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (अध्यक्ष)
- सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश
- विधि एवं न्याय मंत्री
- दो प्रतिष्ठित व्यक्ति (प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष द्वारा नियुक्त)
न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण पर NJAC की भूमिका
- सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की सिफारिश करना।
- किसी भी उम्मीदवार के नामांकन को अस्वीकार करने की शक्ति।
विदित हो कि 2015 में, सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने NJAC को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। इसके पीछे उनका मुख्य तर्क यह था कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है और कार्यपालिका को अनुचित शक्ति प्रदान कर सकता है। पाठकों को इस हेतु कुछ उदाहरणों पर भी गौर कर लेना चाहिए ताकि इस मुद्दे को सही तरीके से समझा जा सके।
- जस्टिस केशवनंद भारती मामला (1973) – इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को स्थापित किया था, जिसके तहत न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की बात कही गई थी। और NJAC को रद्द करने का निर्णय भी इसी सिद्धांत पर आधारित था।
- जस्टिस चेलमेश्वर की असहमति (2015) – सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जे. चेलमेश्वर ने कॉलेजियम प्रणाली की गोपनीयता और पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाये थे। इसकी बजाय उन्होंने NJAC को अधिक जवाबदेह प्रणाली माना था, लेकिन अन्य न्यायाधीशों ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताकर चार बनाम एक मत से इस बिल को निरस्त कर दिया था।
इस बिल को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ भी अलग-अलग मिल रही हैं। कांग्रेस ने NJAC को 2014 में तो समर्थन किया था लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वह लगातार इसका विरोध करती आ रही है। उसने इसे न्यायपालिका की स्वायत्तता के लिए खतरा बताया है। जबकि सत्तारूढ़ भाजपा ने इसे पारदर्शिता बढ़ाने वाला प्रयास बताया है। वहीं लेफ्ट पार्टियों का भी यही कहना है कि NJAC द्वारा सरकार न्यायपालिका में दखल बढ़ाने का कुत्सित प्रयास कर रही है। आम आदमी पार्टी ने इसे जहां सरकार का न्यायपालिका पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास बताया है, वहीं ममता बनर्जी ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के ही खिलाफ बता दिया है।
तो आइए जरा यह भी समझ लेते है कि अन्य देशों में न्यायिक नियुक्ति की कैसी प्रणाली प्रचलित है। इस संबंध में दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र यानी अमेरिका की बात करें तो वहां राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है, लेकिन उस हेतु सीनेट की मंजूरी आवश्यक होती है। जहां तक ब्रिटेन की बात है, तो वहां एक न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया गया है। वही संस्था वहां न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। इसमें सरकार की कोई सीधी भूमिका नहीं होती है। कनाडा में प्रधानमंत्री द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है, लेकिन इस हेतु एक स्वतंत्र परामर्श प्रक्रिया अपनायी जाती है।
NJAC के विवादित पहलू क्या हैं?
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर:
- यदि कार्यपालिका की भूमिका बढ़ जाए, तो यह न्यायिक निर्णयों को प्रभावित कर सकती है।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप न्याय के निष्पक्ष स्वरूप को कमजोर कर सकता है।
प्रतिष्ठित व्यक्तियों की भूमिका:
- यदि प्रतिष्ठित व्यक्तियों की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।
- NJAC के तहत प्रतिष्ठित व्यक्तियों का चयन करने वाली समिति में प्रधानमंत्री और कानून मंत्री की उपस्थिति न्यायिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
सरकार और न्यायपालिका के बीच तनाव: NJAC के रद्द हो जाने के बाद सरकार ने कॉलेजियम प्रणाली में नियुक्तियों को लेकर कई बार असहमति जताई है। कॉलेजियम प्रणाली की सिफारिशों पर देरी या अस्वीकृति के कारण न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच पिछले कुछ समय से काफी तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर NJAC अपने मूल रूप में लागू हो जाए तो उससे न्यायपालिका की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता कम या ज्यादा जरूर प्रभावित हो सकती है। यह शंका जतायी जा रही है कि कार्यपालिका द्वारा मनोनीत न्यायाधीश सरकार के खिलाफ मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने में संकोच कर सकते हैं।
अब एक बार फिर NJAC की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। लेकिन इसने भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक नियुक्तियों के पारदर्शी संचालन की आवश्यकता को अवश्य उजागर कर दिया है। हालांकि कॉलेजियम प्रणाली भी पूरी तरह से दोषरहित नहीं है, लेकिन फिर भी यह NJAC की तुलना में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अधिक सुरक्षित रखती है। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन बनाये रखना लोकतंत्र की स्थिरता के लिए आवश्यक है। लेकिन इसकी बुनियाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता के मूलभूत सिद्धांतों पर ही आधारित होनी चाहिए।


