पाकिस्तान में लोकतंत्र का ढांचा लगातार सेना के हस्तक्षेप की वजह से सवालों के घेरे में है। भले ही देश में आम चुनावों के जरिये सरकारें बनती हैं, लेकिन सत्ता की असली चाबी अक्सर रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय (GHQ) के पास रहती है। पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तानी सेना का राजनीतिक, आर्थिक और न्यायिक तंत्रों में प्रभाव लगातार बढ़ा है, जिससे लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह गया है।
सेना का इतिहास में दखल
पाकिस्तान के इतिहास में अब तक तीन बार सेना ने खुलेआम तख्तापलट कर लोकतांत्रिक सरकारों को हटाया है — 1958 में अयूब खान, 1977 में ज़िया-उल-हक और 1999 में परवेज़ मुशर्रफ के शासन को लोग आज भी याद करते हैं। इसके अलावा कई बार सेना ने पर्दे के पीछे से सरकारों को गिराने, बनाने और नियंत्रित करने का काम किया है।
‘हाइब्रिड शासन’ की सच्चाई
वर्तमान में पाकिस्तान को एक ‘हाइब्रिड शासन’ वाला देश माना जाता है, जिसमें सरकार तो जनता के वोटों से बनती है, लेकिन नीति निर्माण, विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा जैसे प्रमुख फैसलों में सेना का वर्चस्व होता है। साल 2018 में इमरान खान की सरकार को सेना के समर्थन से सत्ता में लाया गया था, लेकिन 2022 में जब उनके संबंध सेना से बिगड़े, तो उन्हें संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया गया।
न्यायपालिका और मीडिया पर सेना का प्रभाव
कई स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान की न्यायपालिका पर भी सेना का प्रभाव बना रहता है। वर्ष 2023 में पाकिस्तान बार काउंसिल ने इस बात पर चिंता जताई थी कि कई जजों को फैसलों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से दबाव में लाया जाता है। मीडिया हाउस और पत्रकार भी सेना की आलोचना से बचते हैं, क्योंकि कई पत्रकारों को गिरफ्तार, गायब या निर्वासित कर दिया गया है।
उदाहरणस्वरूप, पत्रकार सैयद इमरान रियाज खान की गिरफ्तारी और लापता होने की खबरों ने देश-विदेश में मानवाधिकार संगठनों को चौकन्ना कर दिया था। इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स जैसी संस्थाओं ने पाकिस्तान में मीडिया स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
सेना का आर्थिक साम्राज्य
पाकिस्तानी सेना केवल सुरक्षा और रक्षा तक सीमित नहीं है। वह देश के बड़े आर्थिक संस्थानों पर भी नियंत्रण रखती है। Fauji Foundation, Army Welfare Trust (AWT), Defence Housing Authority (DHA) जैसे संगठन सेना के अधीन हैं, जो रियल एस्टेट, बैंकिंग, फर्टिलाइज़र, स्कूल और अस्पताल जैसे क्षेत्रों में अरबों डॉलर की संपत्ति पर नियंत्रण रखते हैं।
लोकतंत्र की गिरती साख
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और लोकतंत्र सूचकांकों में पाकिस्तान की स्थिति लगातार खराब हुई है। Economist Intelligence Unit के अनुसार 2024 में पाकिस्तान “हाइब्रिड शासन” (Hybrid Regime) की श्रेणी में रहा, जो पूर्ण लोकतंत्र या यहां तक कि दोषपूर्ण लोकतंत्र से भी नीचे की स्थिति है।
अंतरराष्ट्रीय चिंता और नतीजे
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय यूनियन, अमेरिका और IMF जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की गिरती स्थिति और सैन्य दखल को लेकर लगातार चिंता जता चुके हैं। IMF ने अपनी 2024 की रिपोर्ट में यह भी कहा था कि पाकिस्तान में नीतिगत अस्थिरता और सैन्य हस्तक्षेप विदेशी निवेश के लिए खतरा है।
पाकिस्तान में सेना का प्रभाव केवल रक्षा या आपात स्थितियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सरकारों के गठन, नीतियों के निर्माण, न्यायपालिका के निर्णय और मीडिया की स्वतंत्रता तक को प्रभावित करती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या पाकिस्तान में सचमुच लोकतंत्र है, या यह केवल एक लोकतांत्रिक मुखौटा है, जिसके पीछे सेना की कठपुतली सरकारें चलती हैं?


