जहां तक पारिवारिक जीवन की बात है, तो तहव्वुर राणा की पत्नी, समराज अख्तर राणा भी एक चिकित्सक ही है और वह भी कनाडा की नागरिक है। उनके तीन बच्चे हैं: एक बेटा और दो बेटियाँ। राणा के पिता, राणा वली मुहम्मद, एक व्यवसायी थे। वहीं उसका छोटा भाई, अब्बास राणा, ‘द हिल टाइम्स’ का पत्रकार है। उसके दो अन्य भाई पाकिस्तानी सेना में अधिकारी के रूप में सेवा कर रहे हैं।
तहव्वुर राणा का नाम 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों में उसकी भूमिका के कारण चर्चा में आया। उसके करीबी सहयोगी डेविड कोलमैन हेडली, जो पाकिस्तानी-अमेरिकी नागरिक था, ने मुंबई हमलों की साजिश रचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। हेडली ने मुंबई में लक्ष्यों की रेकी की थी और इस जानकारी को लश्कर-ए-तैयबा को प्रदान किया था। और राणा पर आरोप है कि उसने हेडली को अपनी इमिग्रेशन सेवा कंपनी के माध्यम से कवर प्रदान किया था। आरोप है कि राणा से कवर मिलने के कारण ही हेडली भारत में स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सका और हमलों को दिया।
इसके अलावा, राणा पर डेनमार्क के अखबार ‘जिलैंड्स-पोस्टन’ के खिलाफ हमले की साजिश में भी शामिल होने का आरोप है। इस अखबार ने पैगंबर मोहम्मद के कार्टून प्रकाशित किये थे। इस साजिश का उद्देश्य अखबार के कर्मचारियों पर हमला करना था।
मुम्बई हमले के बाद अक्टूबर 2009 में, अमेरिकी अधिकारियों ने राणा को गिरफ्तार किया और उसपर आतंकवादी संगठनों को सहायता प्रदान करने के आरोप लगाये। 2011 में, शिकागो की एक संघीय अदालत ने राणा को डेनमार्क हमले की साजिश में उसकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया। लेकिन उस अदालत ने मुंबई हमलों में संलिप्तता के आरोप से उसे बरी कर दिया। उसे 14 साल की सजा सुनायी गई थी, जिसे उसने अमेरिकी जेल में पूरा किया और 2023 में रिहा होकर बाहर आ गया। तहव्वुर हुसैन राणा का जीवन कई महत्त्वपूर्ण घटनाओं और विवादों से भरा हुआ है। उसका जन्म 12 जनवरी 1961 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चिचावतनी में हुआ था। उसने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कैडेट कॉलेज हसन अब्दाल से प्राप्त की थी। वहीं उसकी मुलाकात पहली बार डेविड कोलमैन हेडली से हुई थी, जो बाद में उसका सहयोगी बना। राणा ने चिकित्सा के क्षेत्र में स्नातक किया और पाकिस्तान सेना चिकित्सा कोर में कैप्टन के रूप में सेवा की। सेना में सेवा के दौरान, उसने सऊदी अरब में खाड़ी युद्ध के दौरान चिकित्सक के रूप में कार्य किया और वहाँ घायल हो गया। उसके बाद उसका इलाज जर्मनी में हुआ। बाद में, उसे पाकिस्तान के ग्लेशियर क्षेत्र में तैनात किया गया। लेकिन वहाँ सेवा करने से इनकार करने के कारण उसे सेना से भगोड़ा घोषित कर दिया गया था।
सेना छोड़ने के बाद, राणा ने 1997 में अपनी पत्नी समराज अख्तर राणा के साथ कनाडा प्रवास किया और 2001 में कनाडा की नागरिकता प्राप्त की। कनाडा में बसने के बाद, उसने चिकित्सा क्षेत्र में अपने करियर को जारी रखा। लेकिन थोड़े ही दिन बाद वह अपने परिवार के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका में बस गया। शिकागो में, उसने ‘फर्स्ट वर्ल्ड इमिग्रेशन सर्विसेज़’ नामक एक इमिग्रेशन सेवा कंपनी स्थापित की। वहां उसका यह व्यवसाय खूब चल रहा था, लेकिन उसके गुप्त संबंध और गतिविधियाँ उसकी सार्वजनिक छवि से भिन्न थीं।
इधर भारत सरकार ने राणा के प्रत्यर्पण के लिए प्रयास जारी रखे, ताकि उसे मुंबई हमलों में उसकी भूमिका के लिए भारतीय न्यायालय में पेश किया जा सके। खैर, अप्रैल 2025 में, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राणा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने भारत प्रत्यर्पण पर रोक लगाने की मांग की थी। इस निर्णय के बाद, राणा का भारत में प्रत्यर्पण का मार्ग प्रशस्त हुआ। राणा ने अपनी याचिका में दावा किया था कि यदि उसे भारत प्रत्यर्पित किया गया, तो उसके पाकिस्तानी मूल और मुस्लिम होने के कारण उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जा सकता है। हालांकि, अमेरिकी न्यायालय ने इन दावों को अस्वीकार कर दिया और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दी।
इस तरह तहव्वुर हुसैन राणा का जीवन एक चिकित्सक से व्यवसायी और फिर आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त व्यक्ति के रूप में परिवर्तित हुआ। उसकी गतिविधियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान आकर्षित किया और उसे न्याय के कटघरे में लाया गया। उसका प्रत्यर्पण भारत में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे 2008 के मुंबई हमलों के पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद है।


