अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने वर्तमान कार्यकाल में अमेरिका के अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंधों में कई बदलाव किये हैं। उनकी टैरिफ नीतियों ने निवर्तमान वैश्विक व्यापार-व्यवस्था को चुनौती दी है। उनकी इस नीति ने खासतौर पर भारत जैसे विकासशील देशों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। 2018 से शुरू हुआ व्यापार युद्ध, जिसमें ट्रंप ने विभिन्न देशों, खासतौर पर चीन और भारत के खिलाफ कई टैरिफ्स लगाये थे, ने वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण को लगभग पूरी तरह से बदल दिया है। ट्रंप की यह एकतरफा टैरिफ नीति न केवल इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती है, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन्स और व्यापार संतुलन को भी प्रभावित करती है।
ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले अपने चुनावी अभियान के दौरान अमेरिकी व्यापार को “समान और निष्पक्ष” बनाने का वादा किया था। और उन वादों को निभाने के क्रम में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कई देशों के साथ चल रहे व्यापारिक समझौतों की फिर से समीक्षा की तथा इनमें भारत भी शामिल है। उनकी इस नीति के तहत भारत से निर्यात की जाने वाली कई प्रमुख वस्तुओं पर अतिरिक्त टैरिफ लगाये गए हैं, जिनसे भारतीय अर्थव्यवस्था और खासकर भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान होना प्रारंभ हो गया है। इस आलेख में हम ट्रंप की यह नई टैरिफ नीति, इसके भारत पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव और वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर इसके असर की विस्तृत चर्चा करेंगे।
ट्रंप की टैरिफ नीति और उनका वैश्विक असर
भारत का आम नागरिक अभी भी इस बात से अनभिज्ञ है कि वैश्विक व्यापार की व्यवस्था में टैरिफ के मतलब क्या होते हैं? तो उनकी जानकारी-वृद्धि के लिए बता दूँ कि टैरिफ वह शुल्क है जो एक देश अपने आयातित सामानों पर दूसरे निर्यातक देशों से वसूलता है। दरअसल यह शुल्क देश के लिए आर्थिक रक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, ताकि घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धा बनी रहे और विदेशी सामान की बिक्री में कमी आए। जब अमेरिका ने ट्रंप के नेतृत्व में चीन, यूरोपीय संघ, भारत और अन्य देशों से आयातित सामानों पर टैरिफ बढ़ाये हैं, तो इसका असर न केवल अमेरिका पर पड़ा है, बल्कि इससे पूरे विश्व के सप्लाई चेन में भयानक असंतुलन पैदा हो गया है।
ट्रंप के प्रशासन ने अपने पिछले कार्यकाल में ही 2018 में चीन के खिलाफ 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। और उनके उस फैसले ने उस समय भी वैश्विक व्यापार की गति को अच्छा-खासा प्रभावित किया था। उस समय ट्रंप का तर्क था कि चीन के व्यापारिक व्यवहार और बौद्धिक संपदा की चोरी वाली प्रवृत्ति ने अमेरिका के उद्योगों को नुकसान काफी पहुँचाया है। और वर्तमान ट्रंप सरकार ने यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत सहित कई देशों के खिलाफ टैरिफ बढ़ा दिया है। खासकर भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 27% टैरिफ भारतीय उद्योगों के लिए एक बड़ा संकट बनकर उभरा है।
भारत पर ट्रंप के तुगलकी टैरिफ फरमान का प्रभाव :
अमेरिका ने भारतीय आयातों पर 27% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है। इस निर्णय के कारण भारत के लिए अमेरिका में निर्यात करना और महंगा हो गया है। उसका यह कदम भारत के फार्मास्युटिकल्स, स्टील, टेक्सटाइल और कृषि उत्पादों जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव डालता है। यह टैरिफ नीति भारत की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर डाल सकती है। इससे भारतीय निर्यातकों को महंगे शुल्क का सामना करना पड़ेगा। और इसके कारण अमेरिकी बाजारों में भारतीय उत्पादों की कीमतें बेतहाशा बढ़ सकती हैं। इससे भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो सकता है। भारत के फार्मास्युटिकल्स उद्योग को इस नीति से बड़ा भारी झटका लगा है क्योंकि भारतीय दवाएं अमेरिका में सस्ती हैं। लेकिन अब अतिरिक्त टैरिफ के कारण कीमतें बढ़ सकती हैं। भारतीय स्टील उद्योग भी अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी खो सकता है, और टेक्सटाइल उद्योग को भी नुकसान हो सकता है।
उद्योगवार विश्लेषण
फार्मास्युटिकल्स: भारत फार्मास्युटिकल्स के क्षेत्र में विश्व बाजार में एक प्रमुख निर्यातक का दर्जा रखता है। अमेरिकी बाजार में भी भारतीय दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी है। लेकिन ट्रंप के द्वारा लगाये गए टैरिफ ने इन दवाओं की कीमतों को बुरी तरीके से प्रभावित किया है। भारत के प्रमुख फार्मा उत्पादकों जैसे कि सन फार्मा, अरबिंदो फार्मा, ल्यूपिन, और इप्का ने पहले ही इन टैरिफ्स के प्रभावों को महसूस किया है। इन कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई है। इप्का और सन फार्मा जैसे प्रमुख फार्मा कंपनियों के शेयरों में 6% से अधिक की गिरावट आयी है। इससे भारतीय फार्मा सेक्टर में खासा चिंता का माहौल पैदा हो गया है।
स्टील और धातु उद्योग: भारत स्टील और धातु उत्पादों का प्रमुख निर्यातक है, और ट्रंप ने इन पर भी अतिरिक्त शुल्क लगा दिया है। अमेरिका में भारतीय स्टील की बड़ी खपत थी, लेकिन अब इस पर 25% शुल्क लगाया गया है। इससे भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजार में अपनी उपस्थिति बनाये रखने में कठिनाई महसूस कर रही हैं। एस्सार स्टील, जेएसडब्ल्यू स्टील जैसे प्रमुख भारतीय स्टील उत्पादकों को नुकसान होना शुरू हो गया है। एस्सार स्टील के प्रबंध निदेशक ने कहा भी है, “अमेरिकी बाजार में भारत के स्टील उत्पादों पर शुल्क लगने से हमारे निर्यात में 10-15% की कमी आ सकती है।”
टेक्सटाइल उद्योग: भारतीय टेक्सटाइल उद्योग भी इस नई नीति से काफी प्रभावित हुआ है, क्योंकि इस क्षेर्त्र के लिए भी अमेरिका भारत का एक प्रमुख निर्यातक बाजार है। भारत का वस्त्र उद्योग अमेरिका को सूती और ऊनी वस्त्रों का निर्यात करता है। अब इन पर भी अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है। उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को 7-10% तक का नुकसान हो सकता है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के अध्यक्ष ने कहा, “यह कदम भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए एक बड़ा झटका है, और हमें अब अन्य वैकल्पिक बाजारों की ओर देखना होगा।”
कृषि और अन्य निर्यात: भारत कृषि उत्पादों का भी प्रमुख निर्यातक है और अमेरिका को चावल, मसाले तथा फल जैसे उत्पाद भेजे जाते हैं। ट्रंप ने इन उत्पादों पर भी अतिरिक्त शुल्क लगा दिया है और इससे भारतीय किसानों को कठिनाई हो सकती है। भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह इस मामले को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय स्तर पर उठाएगी।
भारत की राजनीतिक और आर्थिक प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने हालिया अमेरिकी फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भारत के वाणिज्य मंत्री, पीयूष गोयल ने कहा, “यह निर्णय भारतीय व्यापारियों और उद्योगों के लिए नुकसानदेह है, और हम इस मुद्दे को अमेरिका के साथ बातचीत के जरिए हल करने की कोशिश करेंगे।” सरकार ने टैरिफ बढ़ाने को भारत के लिए एक अप्रत्याशित कदम बताया और इसे एकतरफा और व्यापारिक असंतुलन का कारण बताया।
भारतीय व्यापारिक समुदाय में भी इस फैसले के खिलाफ व्यापक असंतोष उभरकर सामने आया है। इसी क्रम में भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अध्यक्ष ने कहा, “यह कदम भारतीय उद्योग के लिए कड़ी चुनौती है, और हमें इस नए व्यापारिक माहौल में टिकने के लिए अपनी रणनीतियों पर पुनः विचार करना होगा।”
चूंकि यह सीधे-सीधे देश के आर्थिक स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है तथा इससे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से देश का हर नागरिक प्रभावित हो सकता है, इसलिए भारतीय मीडिया और जनता भी इस फैसले पर काफी चर्चा कर रही है। सिविल सोसायटी के कुछ गणमान्य लोगों की राय में अमेरिका के इस कदम से भारतीय अर्थव्यवस्था और व्यापार नकारात्मक रूप से प्रभावित होगा। यह देश में मौजूद ऐतिहासिक बेरोज़गारी में और ज्यादा इज़ाफा कर सकता है। मीडिया ने इसे “भारतीय निर्यातकों के लिए एक ब्लैक स्वान इवेंट” के रूप में पेश किया है।
वैश्विक प्रतिक्रिया और आर्थिक परिणाम
ट्रंप की इस नई टैरिफ नीति ने ग्लोबल सप्लाई चेन में भयानक असंतुलन उत्पन्न कर दिया है। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के अनुसार, “टैरिफ बढ़ाने के कारण वैश्विक व्यापार में 1.2% तक की गिरावट हो सकती है, जो विकासशील देशों के लिए एक गंभीर चुनौती है।”
यह आलेख लिखे जाने के दिन वैश्विक शेयर बाजारों में ट्रंप के फैसले के कारण हलचल मची हुई है। भारतीय सेंसेक्स में 550 अंकों से ज्यादा की गिरावट आयी है और निफ्टी भी 23,100 के नीचे आ गया है। ये गिरावट निवेशकों के लिए बहुत चिंताजनक हो गया है और बाजार में बड़ी अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने चेतावनी दी है, “अगर यह टैरिफ-युद्ध बढ़ता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है।”
चीन-अमेरिका का व्यापार युद्ध और भारत पर इसका प्रभाव
चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध के कारण चीन को भारी नुकसान हो रहा है। इसने भारत को एक मौका दिया है। कारण कि कई अमेरिकी कंपनियाँ अब चीन से उत्पादन हटाकर भारत में स्थानांतरित करने का मन बना रही हैं। इस बदलाव से भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में लाभ मिलने की संभावना है। लेकिन भारत को इस अवसर का फायदा उठाने के लिए अपनी व्यापार नीतियों में कुछ मौलिक सुधार करने की जरूरत है। हालांकि भारत की सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाये भी हैं, और इस उद्देश्य के साथ अन्य देशों के साथ व्यापार समझौते करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों का भविष्य
इतना कुछ होने के बावजूद अभी भी भारत और अमेरिका के बीच सकारात्मक व्यापार समझौते की संभावना बनी हुई है। वैसे तो ट्रंप प्रशासन के रहते यह काम थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन भविष्य में भारत और अमेरिका दोनों अपने व्यापारिक संबंधों को सुधारने की दिशा में कदम अवश्य उठा सकते हैं। भारत को अब अपनी आर्थिक व वाणिज्यिक रणनीतियों को नए सिरे से विकसित करना होगा, ताकि ऐसी कोई परिस्थिति दुबारा उत्पन्न होने पर व्यापारिक संकट कम हो सके और नए व्यापारिक अवसर मिल सकें। इस हेतु भारत को अपने घरेलू उद्योगों को सुदृढ़ करने, ग्लोबल सप्लाई चेन्स में अपनी भूमिका को मजबूत करने तथा नवीनीकरण की दिशा में काम करने की आवश्यकता है।
सो कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ट्रंप की इस नई टैरिफ नीति ने भारत को एक नई चुनौती दी है। भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योगों को जाहिरी तौर पर इससे बड़ा नुकसान हो सकता है, लेकिन साथ ही यह एक अवसर भी साबित हो सकता है। लेकिन इस हेतु भारत सरकार को अपनी व्यापारिक रणनीतियों को सही तरीके से लागू करना होगा। भारत को इस समस्या से निपटने के लिए मजबूत और दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता है, ताकि वह वैश्विक व्यापार के इस बदलाव में सफलता प्राप्त कर सके।


