जब आषाढ़ी एकादशी पास आती है और वारकरी संतों की पालखियां लेकर देहू से पंढरपुर की ओर बढ़ते हैं, महाराष्ट्र की धरती एक बार फिर संतों की पदचाप से गूंजने लगती है। ‘विठ्ठल-विठ्ठल’ के जयघोष के बीच, एक नाम हर किसी की जुबान पर होता है – संत तुकाराम।
संत तुकाराम न केवल एक महान भक्त थे, बल्कि वे एक सामाजिक चिंतक, सत्यवादी कवि और एक ऐसे संत थे जिन्होंने भक्ति को आमजन की पहुंच में ला दिया। उन्होंने अपने ‘अभंगों’ के माध्यम से ईश्वर से प्रेम, समाज से प्रश्न और जीवन से सच्चा संबंध जोड़ने का मार्ग दिखाया।
प्रारंभिक जीवन: एक व्यापारी से संत तक
संत तुकाराम का जन्म 1608 ईस्वी में पुणे के पास देहू गाँव में हुआ था। वे कुनबी-मराठा जाति के एक व्यापारी परिवार से थे। उनके पिता का नाम बोल्होबा और माता का नाम कनकाई था। बचपन में ही उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पहले माता-पिता के देहांत, फिर उनकी पहली पत्नी रखुमाबाई का निधन हुआ, आगे एक भयंकर अकाल ने जीवन को और भी कठिन बना दिया।”
इन दुखों ने उन्हें सांसारिक मोह से विरक्त कर दिया। उन्होंने धीरे-धीरे व्यापार से मुंह मोड़ा और अपना जीवन विठोबा की भक्ति में अर्पित कर दिया।
अभंग: प्रेम और प्रतिरोध की कविता
तुकाराम ने जो अभंग लिखे, वे केवल भक्ति गीत नहीं थे। वे समाज का आइना थे। उन्होंने लिखा:
• झूठी पूजा-पद्धतियों का विरोध
• लोभ और अहंकार के खिलाफ चेतावनी
• निर्धनों और दलितों की पीड़ा
• हरि नाम की मिठास और
• आत्मा और परमात्मा के बीच प्रेम का रिश्ता
तुकाराम की भाषा सीधी-सादी मराठी थी, गांवों और खेतों में बोली जाने वाली। यही कारण है कि उनका संदेश आज भी घर-घर तक पहुंचता है।
तुकाराम की दृष्टि में विठोबा
एक अभंग में तुकाराम अपने आराध्य विठ्ठल के रूप का बड़ा ही सुंदर चित्रण करते हैं:
“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी, कर कटावरी ठेवूनियां।
तुळसी हार गळां, कासे पीतांबर, आवडे निरंतर हेंचि ध्यान…”
इसमें वे विठ्ठल को ईंट पर खड़े हुए, कमर पर हाथ रखे हुए देखते हैं। तुलसी की माला उनके गले में है, कानों में मछली के आकार की कुंडलें हैं, और गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित है। तुकाराम कहते हैं, यही ध्यान, यही दर्शन, मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है।
इंद्रायणी नदी की कथा
भक्तलिलामृत के अनुसार, कुछ ब्राह्मणों ने तुकाराम के अभंगों को अर्थहीन कहकर उनकी पुस्तकों को इंद्रायणी नदी में फेंक दिया।
तुकाराम ने 13 दिन तक उपवास किया और नदी किनारे प्रार्थना की। और फिर, चमत्कारिक रूप से, उनकी रचनाएं पानी से उसी रूप में वापस निकल आईं। यह कथा इस बात का प्रतीक बन गई कि सच्चे शब्द कभी नष्ट नहीं होते।
नाथ परंपरा और अद्वैत से जुड़ाव
तुकाराम वारकरी परंपरा से जुड़े थे, लेकिन नाथ संप्रदाय के आत्मानुभव और अद्वैत वेदांत के तत्व भी उनके लेखन में झलकते हैं। उनका भक्ति का मार्ग केवल पूजा का नहीं, आत्मा की अनुभूति का भी था।
समाज के लिए खुला आध्यात्मिक द्वार
तुकाराम ने समाज की जातीय रेखाओं को तोड़ते हुए भक्ति को सबके लिए खोला। उन्होंने दलितों, महिलाओं और गरीबों को भजन मंडलियों और वारी यात्रा में स्थान दिया।
एक अभंग में वे पूछते हैं:
“काही जन्मा शूद्र उपजे, तरी भक्ति नाही त्याला लागे?”
(अगर कोई शूद्र के रूप में जन्मा है, तो क्या उसे भक्ति का अधिकार नहीं?)
यह उस युग के लिए क्रांतिकारी विचार था।
सादा जीवन, गहरी साधना
संत तुकाराम का जीवन सांसारिक मोह से बहुत दूर, सादगी और सेवा से जुड़ा हुआ था। वे स्वयं खेतों में हल चलाते, अनाज उगाते और वही भोजन भूखों को बांटते थे। कभी भी उन्होंने अपने संतत्व का प्रदर्शन नहीं किया, न ही शिष्यों की भीड़ या दान-दक्षिणा के मोह में पड़े। वे मानते थे कि सच्ची भक्ति तब तक अधूरी है जब तक उसमें सेवा का भाव न हो।
उनकी पत्नी जिजाई एक व्यवहारिक महिला थीं। वे चाहती थीं कि तुकाराम परिवार की जिम्मेदारियों में भी हाथ बंटाएं। लेकिन तुकाराम का मन तो ईश्वर में रमा रहता था। यह द्वंद्व उनके कई अभंगों में दिखाई देता है, जहां वे पत्नी की नाराज़गी को स्वीकार करते हैं, और फिर अपने ईश्वर-प्रेम की विवशता भी प्रकट करते हैं। यह संत और गृहस्थ के बीच का संघर्ष उनके जीवन को एक मानवीय आयाम देता है, जिससे लोग उनसे और अधिक जुड़ते हैं।
वारी परंपरा में योगदान
संत तुकाराम ने वारकरी आंदोलन को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि उसमें नई ऊर्जा और लोकसंपृक्तता का संचार किया। उन्होंने यह परंपरा केवल संतों या विद्वानों की नहीं, बल्कि आमजन की भक्ति यात्रा बना दी। उनकी पालखी, जो देहू से पंढरपुर तक हर वर्ष निकलती है, लाखों वारकरियों की आस्था का केंद्र होती है।
हर साल आषाढ़ी एकादशी से पहले शुरू होने वाली यह पदयात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, श्रद्धा और सामूहिक आत्मनिष्ठा की मिसाल बन गई है। ढोल-ताशों की गूंज, अभंगों की धुन और “माऊली माऊली” के जयघोष के बीच चलती यह यात्रा, संत तुकाराम के अद्वितीय योगदान का जीवंत प्रतीक है।
सजीव समाधि और विदाई
1649 ईस्वी में, तुकाराम ने भंडारा पहाड़ी पर जीवित समाधि ली। वारकरी मानते हैं कि वे अपने शरीर सहित वैकुंठ चले गए। देहू में स्थित उनकी समाधि आज भी लाखों भक्तों के लिए तीर्थ स्थल है। यहां न केवल उनकी स्मृति जीवित है, बल्कि वह भक्ति की ज्वाला भी, जिसे तुकाराम ने अपने जीवन और शब्दों से प्रज्वलित किया था।
सांस्कृतिक प्रभाव और स्मृति
तुकाराम का प्रभाव मराठी संस्कृति में गहराई से समाया हुआ है।
• उनके अभंग आज भी घरों और मंदिरों में गूंजते हैं
• 1936 की मराठी फिल्म संत तुकाराम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हुई
• समाज सुधारक फुले ने जातिवाद के विरुद्ध अपने विचारों में तुकाराम का उल्लेख किया
आज के युग में संत तुकाराम का संदेश
संत तुकाराम का जीवन आज भी हमें सिखाता है:
• अहंकार दुख देता है, नम्रता सुख
• ईश्वर से प्रेम का मतलब है सब जीवों से प्रेम
• सच्ची भक्ति किसी भी जाति, वर्ग या रिवाज से बंधी नहीं
वे हमें याद दिलाते हैं कि भक्ति केवल पूजा या ग्रंथों में नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई में होती है।
संत तुकाराम का जीवन केवल भक्ति का उदाहरण नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक दिशा है। सादगी से, सच्चाई से और सबके लिए करुणा से जीना ही उनका संदेश था। उन्होंने दिखाया कि ईश्वर की खोज किसी तीर्थ या ग्रंथ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तो हर जीव में, हर धड़कन में बसता है। आज जब समाज फिर से भेदभाव, लोभ और अहंकार के जाल में उलझ रहा है, तुकाराम की वाणी हमें यह स्मरण कराती है कि हरि नाम में ही शांति है, सेवा में ही भक्ति है और प्रेम में ही परमात्मा है। उनके अभंग न केवल गाए जाते हैं, बल्कि आत्मा में उतरते हैं। यही कारण है कि तुकाराम केवल इतिहास के संत नहीं हैं, बल्कि आज के युग की भी ज़रूरत हैं।


