महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा में संत चोखामेळा एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने न केवल ईश्वर के प्रति अपनी अटूट भक्ति से भक्तिकाल को समृद्ध किया, बल्कि सामाजिक असमानता के खिलाफ एक सशक्त आवाज़ भी बने। 14वीं शताब्दी में जन्मे चोखामेळा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर की भक्ति जन्म से नहीं, हृदय की सच्चाई से तय होती है।
वे महार जाति में जन्मे थे, जिन्हें तत्कालीन समाज में अछूत माना जाता था। लेकिन उन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि सच्चा संत वही होता है जो अन्याय के बीच भी भक्ति के दीप जलाता है। उनके अभंग आज भी महाराष्ट्र की गलियों और वारकरी संप्रदाय की पदयात्राओं में गूंजते हैं, और आज भी वे उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सात शताब्दी पहले थे।
चोखामेळा का जन्म मंगळवेढा नामक कस्बे में हुआ था, जो पंढरपुर के समीप है। वे महार जाति से थे, एक ऐसी जाति जिसे उस समय समाज में नीचा समझा जाता था। उनके काम, रहन-सहन और यहाँ तक कि उनकी छाया तक को अशुद्ध कहा जाता था। लेकिन इस सामाजिक अपमान के बीच भी चोखामेळा के भीतर ईश्वर के प्रति प्रेम का प्रकाश कभी मंद नहीं पड़ा।
बचपन से ही वे भगवान विठोबा के नाम का जाप करते थे और अपने भावों को अभंगों के रूप में व्यक्त करने लगे थे। उनके गीतों में एक ऐसी पीड़ा थी जो केवल एक दलित हृदय ही महसूस कर सकता था।
“आम्ही ज्ञानहीन, आम्हाला पतित,
तरी विठोबा करिशी उद्धार।”
(हम अज्ञानी और पतित हैं,
फिर भी हे विठोबा, तू हमें तार।)
चोखामेळा की भक्ति उन्हें पंढरपुर खींच लाई। वे चाहते थे कि अपने आराध्य विठोबा के समीप रहें। लेकिन यहां भी समाज की संकीर्णता ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इससे निराश होने के बजाय उन्होंने मंदिर के सामने ही एक झोपड़ी बनाकर भजन करना शुरू कर दिया।
यह झोपड़ी भले ही भौतिक रूप से मंदिर से बाहर थी, पर उसमें निवास करती भक्ति किसी भी मंदिर से कम नहीं थी। चोखामेळा की आवाज़ मंदिर की दीवारों से टकराकर अंदर गूंजती रही।
भक्तविजय जैसे ग्रंथों में वर्णित एक कथा के अनुसार, एक दिन भगवान विठोबा की मूर्ति झुक गई ताकि चोखामेळा अपने झोपड़े से उन्हें देख सकें। यह घटना प्रतीक बन गई इस सत्य की कि ईश्वर के लिए जाति, कुल या वर्ण का कोई मोल नहीं होता, सिर्फ भक्ति का होता है।
एक अन्य कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण जो चोखामेळा की भक्ति पर संदेह करता था, उसने स्वप्न में विठोबा को चोखामेळा को आलिंगन करते हुए देखा। यह स्वप्न ब्राह्मण के अहंकार को तोड़ गया।
चोखामेळा के अभंगों में केवल भक्ति नहीं, अपमान की पीड़ा और सामाजिक प्रतिरोध भी है। वे भगवान से शिकायत नहीं करते, पर समाज की रूढ़ियों से सवाल जरूर पूछते हैं।
“आम्ही शूद्र, आम्ही अति,
परि विठोबाचे भक्त.”
(हम शूद्र हैं, हम तुच्छ हैं,
फिर भी हम विठोबा के भक्त हैं।)
चोखामेळा की भक्ति को सबसे पहले जिसने पहचाना वह थे संत नामदेव। उच्च जाति से होने के बावजूद नामदेव ने चोखामेळा को अपना मित्र और संत स्वीकार किया। उनका यह संबंध भक्ति आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, जाति से ऊपर उठकर आत्मा को पहचानना।
“चोखा दोरा पायी पडले,
तेथे भगवंत उठले।”
(जब चोखा भगवान के चरणों में झुके,
वहीं भगवान उन्हें उठाने को बढ़े।)
चोखामेळा की पत्नी सोयराबाई स्वयं एक संत कवयित्री थीं। उनके अभंग भी सामाजिक अन्याय के विरुद्ध एक स्त्री की सशक्त आवाज़ हैं। चोखामेळा और सोयराबाई का दांपत्य भारतीय भक्ति परंपरा में स्त्री-पुरुष समानता का प्रारंभिक उदाहरण है।
चोखामेळा का अंत भी उतना ही करुण था जितना उनका जीवन। एक निर्माण स्थल पर दीवार गिरने से उनकी मृत्यु हुई। किंवदंती है कि उनकी हड्डियों से “विठोबा-विठोबा” की ध्वनि आती रही। उनकी समाधि आज भी पंढरपुर के मंदिर के सामने स्थित है, उस मंदिर के बिल्कुल सामने, जिसने उन्हें कभी अंदर नहीं जाने दिया।
आज चोखामेळा की समाधि केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय की चेतना का प्रतीक है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने उन्हें ऐसे संत के रूप में देखा जो भक्ति के माध्यम से क्रांति लाए।
आषाढ़ी एकादशी के दिन हजारों वारकरी, विशेषकर दलित अनुयायी, उनकी समाधि पर इकट्ठा होकर उनके अभंगों का कीर्तन करते हैं।
चोखामेळा के अभंग आज भी महाराष्ट्र के गांव-गांव में गाए जाते हैं। आधुनिक नाटक, फिल्में, और दलित साहित्य उनके जीवन को बार-बार जीवंत करते हैं। उनकी वाणी, जो पीड़ा, प्रेम और प्रतिरोध की त्रयी है – आज भी वैसी ही सजीव है।
विद्वानों ने चोखामेळा के जीवन को केवल एक धार्मिक संत के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांतिकारी के रूप में देखा है। एलेनर ज़ेलियट ने लिखा कि “चोखामेळा ने महाराष्ट्र को आत्मा दी।” ऐनी फेल्डहॉस ने उनके भक्ति गीतों को “निजी करुण पुकार और सामाजिक अन्याय के खिलाफ सामूहिक आवाज़” कहा।
आज जब जातिवाद, भेदभाव और धार्मिक संकीर्णता अब भी समाज को ग्रस रहे हैं, चोखामेळा का जीवन हमें फिर से सिखाता है कि भक्ति केवल मंदिर की दीवारों तक सीमित नहीं होती। वह हर उस हृदय में बसती है, जो सच्चा और निष्कलंक है।
चोखामेळा ने कभी तलवार नहीं उठाई, उन्होंने प्रेम का सहारा लिया। और इस प्रेम की शक्ति ने उन्हें इतिहास में अमर बना दिया।
संत चोखामेळा का जीवन भले ही अपमान और पीड़ा से भरा रहा हो, लेकिन उन्होंने उसे भक्ति का मंच बना दिया। उनके शब्द आज भी संघर्षरत आत्माओं को राह दिखाते हैं। वे हमारे समय के लिए एक जीवित उदाहरण हैं कि प्रेम और भक्ति किसी सामाजिक सीमा को नहीं मानते।
उनकी समाधि आज भी एक सवाल पूछती है: क्या हम अब भी किसी को मंदिर के दरवाजे से लौटा रहे हैं? या चोखामेळा की भक्ति से कुछ सीखा है?


