कुंजी बिंदु
- बालाजी बाजी राव, जिन्हें नाना साहेब प्रथम के नाम से जाना जाता है, मराठा साम्राज्य के 8वें पेशवा थे, जिन्होंने 1740 से 1761 तक शासन किया।
- वे बाजी राव प्रथम के पुत्र थे और मराठा साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने पंजाब तक अपनी पहुंच बनाई।
- उनके कार्यकाल में तीसरी पानीपत की लड़ाई (1761) में मराठों की विनाशकारी पराजय हुई, जो साम्राज्य के पतन की शुरुआत थी।
- शोध सुझाव देता है कि उन्होंने प्रशासनिक सुधार और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान दिया, लेकिन पानीपत की हार उनके नेतृत्व पर सवाल उठाती है।
- उनकी विरासत मिश्रित है, जिसमें विस्तार की उपलब्धियां और पानीपत में पराजय दोनों शामिल हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को पुणे के राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रथम की प्रतिमा का अनावरण किया। श्रीमंत बाजीराव पेशवा मराठा साम्राज्य के विस्तार की नींव रखने वाले महान योद्धा थे। वे बाजीराव पेशवा प्रथम के पुत्र थेष उन्हें नानासाहेब प्रथम के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया था। सन 1740 से 1761 तक पेशवा के रूप में उन्होंने मराठा साम्राज्य के विस्तार और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके नेतृत्व में, मराठा साम्राज्य अपने चरम पर पहुंचा थे। दक्खन से पंजाब की सीमाओं तक यह साम्राज्य उस समय फैला था। हालांकि, उनका शासन तीसरी पानीपत की लड़ाई में मराठों की बड़ी पराजय का साक्षी रहा था। बालाजी बाजीराव के जीवन, उनकी उपलब्धियों और चुनौतियों पर एक नज़र ड़ालते है।
बालाजी बाजी राव का जन्म 8 दिसंबर, 1720 को पुणे में हुआ था। वे प्रसिद्ध पेशवा बाजीराव प्रथम और काशीबाई के पुत्र थे। बचपन से ही वे सैन्य रणनीति और राज्यकला में प्रशिक्षित हुए। उन्होंने अपने पिता के साथ शासकीय अभियानों में भाग लिया। सन 1740 में पिता की मृत्यु के बाद 19 वर्ष की उम्र में छत्रपति शाहू महाराज ने उन्हें पेशवा नियुक्त किया। वह चितपावन ब्राह्मण कुल के तीसरे पेशवा थे। हालांकि रघुजी भोंसले जैसे कुछ मराठा सरदारों ने उनके युवा होने पर आपत्ति जताई। लेकिन बाजीराव पेशवा ने जल्दी ही अपनी शक्ति मजबूत की और विस्तारवादी नीतियों को जारी रखा।
बालाजी बाजी राव के कार्यकाल में मराठा साम्राज्य अपने सबसे बड़े विस्तार तक पहुंचा। सन 1758 में रघुनाथ राव के नेतृत्व में मराठा सेनाओं ने पंजाब पर कब्जा किया। फिर सेना लाहौर और अटक तक पहुंची जहां उन्होंने मराठा ध्वज फहराया। दक्षिण में सदाशिव राव भाऊ ने सन 1758 में उदगीर की लड़ाई में निजाम की सेनाओं को पराजित किया। इससे दक्खन में भी मराठाओं का प्रभुत्व मजबूत हुआ। इस तरह, मराठा साम्राज्य उत्तर से दक्षिण तक फैल गया, जो बाजीराव पेशवा की सैन्य रणनीति की सफलता को दर्शाता है।
प्रशासनिक क्षेत्र में बालाजी बाजी राव ने अपने चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ के साथ मिलकर नए विधायी और वित्तीय प्रणालियों को लागू किया। उन्होंने पुणे और अन्य क्षेत्रों में नहरें, पुल और मंदिर बनवाए, जो राज्य की आर्थिक समृद्धि में योगदान देते थे। यह प्रतीत होता है कि इन सुधारों ने साम्राज्य के विस्तार को प्रबंधित करने में मदद की, हालांकि विस्तृत जानकारी सीमित है।
फिर बात आती है तीसरी पाीपन की लड़ाई की। सन 1761 में अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व में अफगान सेनाओं के साथ तीसरी पानीपत की लड़ाई हुई। उसमें मराठा सेना को सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में भारी हार का सामना प़ड़ा, जिसमें लगभग 1,00,000 सैनिक और नागरिक मारे गए। इस लड़ाई में बालाजी के पुत्र विश्वासराव और चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ की भी मृत्यु हो गई। यह पराजय मराठा साम्राज्य के लिए एक ऐसा मोड़ था, जिसने उत्तर भारत में उनकी पकड़ को कमजोर किया और ब्रिटिश शक्ति के उदय के लिए रास्ता बनाया। बालाजी, जो प्रबलन बल का नेतृत्व कर रहे थे, इस खबर से अवसाद में चले गए और 23 जून, 1761 को उनकी मृत्यु हो गई।
बालाजी बाजीराव की विरासत मिश्रित है। एक ओर उन्होंने मराठा साम्राज्य को अपने सबसे बड़े विस्तार तक पहुंचाया और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया। दूसरी ओर पानीपत के पराजय और उसके बाद साम्राज्य के पतन को उनके नेतृत्व से जोड़ा जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि वे सैन्य नेता के रूप में अपने पिता से कम थे, लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है। उनकी जीवन गाथा मराठा इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो हमें प्रेरणा और सबक दोनों देती है।
बालाजी बाजीराव के प्रमुख योगदान और चुनौतियां
| योगदान/चुनौती | विवरण |
| जन्म और नियुक्ति | 8 दिसंबर, 1720 को पुणे में जन्म, 1740 में 19 वर्ष की उम्र में पेशवा नियुक्त। |
| सैन्य विस्तार | पंजाब तक विस्तार, लाहौर और अटक पर कब्जा, दक्कन में निजाम पर विजय। |
| प्रशासनिक सुधार | विधायी और वित्तीय प्रणालियों का परिचय, बुनियादी ढांचे का विकास। |
| तीसरी पानीपत की लड़ाई | 1761 में मराठों की विनाशकारी पराजय, विश्वासराव और सदाशिव राव भाऊ की मृत्यु। |
| विरासत | विस्तार की उपलब्धियां, लेकिन पानीपत की हार से नेतृत्व पर सवाल। |
पेशवा के बारे में
पेशवा मराठा साम्राज्य में छत्रपति (राजा) के बाद दूसरा सर्वोच्च पद था। कहिए के वो मराठा साम्राज्य में प्रधान मंत्री का पद था। पहले पेशवा मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले थे, जिन्हें शिवाजी महाराज ने अष्टप्रधान (आठ मंत्रियों) की परिषद का प्रमुख नियुक्त किया था। शाहू ने सन 1713 में बालाजी विश्वनाथ भट को पेशवा नियुक्त किया तथा सन 1719 में उनके पुत्र बाजीराव प्रथम को भी नियुक्त करके पद को वंशानुगत बना दिया। इसीलिए मराठा शासन में इस पद को मुख्य प्रधान भी कहा जाता था।
सन 1713 में शाहू महाराज ने बालाजी विश्वनाथ भट को पेशवा नियुक्त किया। सन 1720–1740 के दौरान बाजीराव प्रथम के शासनकाल में पेशवा पद सर्वाधिक प्रभावी रहा। इसी समय मराठा साम्राज्य का विस्तार उत्तर तक हुआ। सन 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों को अहमद शाह दुर्रानी से बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। सन 1772 में युवा पेशवा माधवराव प्रथम की मृत्यु के बाद मराठा राज्य पाँच प्रमुख सेनापतियों के परिसंघ में बदल गया, जिसमें पेशवा केवल नाममात्र का प्रमुख रह गया। सन 1802 में होलकर वंश से पराजय के बाद बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों से सहायता हेतु बसीन की संधि की। सन 1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों से हारने के बाद पेशवा पद समाप्त हो गया।


