21 जुलाई 2025 की रात को भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। 74 वर्षीय धनखड़, जो अगस्त 2022 से उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्यरत थे, ने अपने इस्तीफे में स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया। लेकिन क्या यह इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों से था, या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक कहानी है? आइए, इस अप्रत्याशित निर्णय के पीछे की कहानी को समझते हैं।

एक सामान्य परिवार से उपराष्ट्रपति तक का सफर
जगदीप धनखड़ का जन्म राजस्थान के एक छोटे से गाँव, किठाना में एक किसान परिवार में हुआ था। उनकी कहानी मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़ और राजस्थान विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद, धनखड़ ने राजस्थान हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की। 1990 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा मिला। राजनीति में प्रवेश करने से पहले वे चौधरी देवी लाल के करीबी सहयोगी रहे और 1990 में चंद्रशेखर सरकार में मंत्री भी बने। बाद में वे कांग्रेस से जुड़े, लेकिन अशोक गहलोत के उदय के बाद उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। 2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल नियुक्त होने के बाद, उन्होंने ममता बनर्जी सरकार के साथ कई मुद्दों पर तीखी बहस की। 2022 में, एनडीए के उम्मीदवार के रूप में, उन्होंने विपक्ष की मार्गरेट अल्वा को हराकर उपराष्ट्रपति का पद हासिल किया।
इस्तीफे की पृष्ठभूमि: स्वास्थ्य या राजनीतिक दबाव?
धनखड़ ने अपने इस्तीफे में लिखा, “स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और चिकित्सकीय सलाह का पालन करने के लिए, मैं तत्काल प्रभाव से भारत के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देता हूँ।” उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सांसदों का उनके समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया। लेकिन सूत्रों के अनुसार, यह इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों तक सीमित नहीं था।
21 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन, धनखड़ ने राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन किया और जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए एक प्रस्ताव को स्वीकार किया, जिसमें जज के घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद उनकी बर्खास्तगी की माँग की गई थी। इस प्रस्ताव पर 50 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर थे। धनखड़ ने इसे गंभीरता से लेते हुए सचिव को लोकसभा में समान प्रस्ताव की जाँच करने का निर्देश दिया। लेकिन इस कदम ने सत्तारूढ़ दल को असहज कर दिया।
सूत्रों का कहना है कि इसके बाद केंद्र सरकार के एक फोन कॉल ने स्थिति को और जटिल कर दिया। इस कॉल के बाद धनखड़ और सरकार के बीच तनाव बढ़ गया। खबरें हैं कि सरकार की ओर से उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी थी, जिसकी भनक धनखड़ को लग गई। एक अनुभवी राजनेता के रूप में, उन्होंने अपमान का सामना करने के बजाय इस्तीफा देना चुना।
विपक्ष और सत्तापक्ष की प्रतिक्रियाएँ
विपक्ष ने धनखड़ के इस्तीफे को “अप्रत्याशित” करार दिया। कांग्रेस ने कहा कि इस निर्णय के पीछे “कुछ और” है। विपक्षी नेताओं ने यह भी उजागर किया कि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और किरेन रिजिजू ने उस दिन दोपहर 4:30 बजे की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में शिरकत नहीं की, जिससे धनखड़ नाराज थे। नड्डा की टिप्पणी, “केवल वही रिकॉर्ड पर जाएगा जो मैं कहूँगा,” को विपक्ष ने सभापति की गरिमा पर हमला बताया। हालाँकि, नड्डा ने सफाई दी कि उनकी टिप्पणी विपक्षी सांसदों के लिए थी, न कि सभापति के लिए।
धनखड़ का कार्यकाल: विवादों से भरा
धनखड़ का कार्यकाल विवादों से भरा रहा। राज्यसभा में विपक्ष के साथ उनकी तीखी नोकझोंक और न्यायपालिका पर उनकी टिप्पणियाँ चर्चा में रहीं। उन्होंने न्यायपालिका की कार्यकारी भूमिका पर सवाल उठाए और संसद की सर्वोच्चता पर जोर दिया। मार्च 2025 में, सीने में दर्द के बाद उन्हें एम्स, दिल्ली में भर्ती किया गया था, और जून में नैनीताल में एक कार्यक्रम के दौरान वे बेहोश हो गए थे। इन स्वास्थ्य समस्याओं ने उनके इस्तीफे को विश्वसनीयता दी, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह केवल एक बहाना था।
आगे क्या?
धनखड़ का इस्तीफा भारत के तीसरे उपराष्ट्रपति के रूप में दर्ज हुआ, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया। अब अगले छह महीनों में नए उपराष्ट्रपति का चुनाव होगा। एनडीए, जो लोकसभा और राज्यसभा में बहुमत रखता है, संभावित उम्मीदवारों पर विचार कर रहा है। राज्या सभा के उपसभापति हरिवंश का नाम इस दौड़ में सबसे आगे है।
जगदीप धनखड़ का इस्तीफा न केवल एक व्यक्तिगत निर्णय है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में शक्ति संतुलन और संवैधानिक पदों की गरिमा पर सवाल उठाता है। क्या यह स्वास्थ्य कारणों से लिया गया एक निजी फैसला था, या सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच बढ़ते तनाव का परिणाम? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है।


