एक चुप्पी जो नीति बन गई
कुछ असुविधाजनक आर्थिक सच्चाइयाँ एक ख़ास तरह की चुप्पी में दफ़न रहती हैं। यह अज्ञान की चुप्पी नहीं होती। यह एक सोची-समझी चुप्पी होती है।
दशकों से भारत ने फ़िलिस्तीनी स्वतंत्रता का समर्थन किया है। संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीनी राज्य के पक्ष में बार-बार मतदान किया है। वेस्ट बैंक और गोलान हाइट्स में इज़राइली बस्तियों को अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताया है। यह भारत का आधिकारिक रुख़ है।
पर कॉर्पोरेट ढाँचों, सरकारी अनुबंधों और श्रम समझौतों को ध्यान से देखें तो एक और कहानी सामने आती है। भारतीय संस्थाएँ, निजी और साझेदारी के ज़रिये कुछ हद तक सार्वजनिक भी, उन्हीं इलाक़ों में आर्थिक रूप से मौजूद हैं जिन्हें नई दिल्ली अपने आधिकारिक बयानों में ग़ैरक़ानूनी ठहराती है।
यह कहानी सिर्फ़ दोहरेपन की नहीं है। यह इस बारे में है कि आधुनिक राज्य विरोधाभासों को कैसे सँभालते हैं। यह इस बारे में भी है कि कारोबार क़ानूनी रूप से विवादित ज़मीन पर कैसे पनपता है। और यह किसी एक सरकार की कहानी नहीं है। यह उलझन कांग्रेस के दौर में शुरू हुई और भाजपा के दौर में गहरी होती गई।
जून १९६७ और वह नक़्शा जो बदल गया
इन इलाक़ों में किसी भी आर्थिक गतिविधि का राजनीतिक और क़ानूनी वज़न समझने के लिए जून १९६७ पर जाना ज़रूरी है।
पाँच जून से दस जून १९६७ के बीच, यानी सिर्फ़ छह दिनों में, इज़राइल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया से एक साथ युद्ध लड़ा। जब गोलीबारी थमी तो इज़राइल ने मिस्र से सिनाई प्रायद्वीप और ग़ाज़ा पट्टी, जॉर्डन से वेस्ट बैंक और पूर्वी येरुशलम और सीरिया से गोलान हाइट्स पर क़ब्ज़ा कर लिया था।
वेस्ट बैंक लगभग ५,६५५ वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा है जहाँ बहुसंख्यक अरब-फ़िलिस्तीनी आबादी रहती है। यह सन् १९४८ से जॉर्डन के प्रशासन में था। गोलान हाइट्स लगभग १,८०० वर्ग किलोमीटर का एक ऊँचाई पर स्थित पठार है जो उत्तरी इज़राइल और दक्षिणी सीरिया को देखता है। यह सीरिया की संप्रभु भूमि थी। दोनों १९६७ के बाद इज़राइली सैन्य प्रशासन के अधीन आ गए।
इज़राइल ने सन् १९८१ में गोलान हाइट्स को औपचारिक रूप से अपने साथ जोड़ लिया। इसे दुनिया के लगभग किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने मार्च २०१९ में इज़राइली संप्रभुता को मान्यता दी। वेस्ट बैंक को कभी औपचारिक रूप से इज़राइल में नहीं मिलाया गया पर वहाँ इज़राइली बस्तियाँ लगातार फैलती रही हैं। अब सात लाख से अधिक इज़राइली नागरिक वहाँ रहते हैं। भारत समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन दोनों इलाक़ों को आज भी क़ब्ज़े में माना जाता है और चौथे जिनेवा कन्वेंशन के तहत इज़राइली नागरिक बस्तियों को ग़ैरक़ानूनी मानता है।
इसी क़ानूनी रूप से विवादित भूगोल में भारतीय कॉर्पोरेट और श्रम हितों ने चुपचाप जड़ें जमा ली हैं।
टपक सिंचाई की वह कंपनी जिसने तस्वीर बदल दी
क़ब्ज़े में इज़राइली बस्तियों में भारत की सबसे स्पष्ट और सबसे दस्तावेज़ीकृत कॉर्पोरेट मौजूदगी नाँदनजेन से जुड़ी है। यह इज़राइल की सिंचाई प्रौद्योगिकी कंपनी है जो जैन इरीगेशन सिस्टम्स की पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी बन गई। जैन इरीगेशन जलगाँव, महाराष्ट्र में मुख्यालय वाली एक बड़ी भारतीय कृषि-व्यापार बहुराष्ट्रीय कंपनी है।
यहाँ समय-रेखा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। जून २००७ में, यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौर में, जैन इरीगेशन ने तत्कालीन नाँदन कंपनी में ५०.००१ प्रतिशत हिस्सेदारी ख़रीदी। यह कोई छोटा सौदा नहीं था। उस समय इसे भारत-इज़राइल व्यावसायिक संबंधों में एक ऐतिहासिक क़दम बताया गया था। जैन ने मई २०१२ में पूरा स्वामित्व हासिल किया, यह भी यूपीए के दूसरे कार्यकाल में। शेष पचास प्रतिशत के लिए लगभग १८९ करोड़ रुपये यानी क़रीब साढ़े तीन करोड़ अमेरिकी डॉलर चुकाए गए। मिली-जुली इकाई नाँदनजेन दुनिया की अग्रणी ड्रिप सिंचाई कंपनियों में से एक बन गई। इसकी उपस्थिति १२० से अधिक देशों में थी और अपने चरम पर इसका वार्षिक राजस्व लगभग २,४९० करोड़ रुपये था।
समस्या यह है कि नाँदनजेन ने क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में ज़मीन पर क्या किया। इज़राइली शोध संस्था हू प्रॉफ़िट्स जो क़ब्ज़े की अर्थव्यवस्था में कॉर्पोरेट भागीदारी को ट्रैक करती है, के दस्तावेज़ों के अनुसार नाँदनजेन ने क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक और सीरियाई गोलान हाइट्स में सिंचाई परियोजनाएँ चलाईं। सन् २००९ में जॉर्डन घाटी की टोमर बस्ती में एक जैविक बागान में कंपनी का साइनबोर्ड दर्ज किया गया। यह यूपीए-युग के अधिग्रहण के दो साल बाद की बात है। सन् २०१८ में गोलान की एन ज़िवान बस्ती के एक अंगूर के बाग़ में भी यही देखा गया, यानी भाजपा सरकार के दौर में भी। कंपनी ने माउंट हेब्रोन इलाक़े की कार्मेल, माओन और यतीर बस्तियों को सिंचाई सेवाएँ दीं और सीरियाई गोलान तथा जॉर्डन घाटी में वितरक बनाए।
ये अमूर्त आपूर्ति श्रृंखला के संबंध नहीं हैं। यह उन समुदायों को सीधे, साइट पर कृषि बुनियादी ढाँचा देना है जिन्हें संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और भारत सरकार ख़ुद अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून का उल्लंघन मानती है। इस मौजूदगी की जड़ें एक ऐसे व्यावसायिक निर्णय में हैं जो सन् २००७ में एक कांग्रेसी प्रधानमंत्री के दौर में लिया गया था। वही प्रधानमंत्री जो हर बहुपक्षीय मंच पर फ़िलिस्तीनी राज्य के प्रति भारत की औपचारिक प्रतिबद्धता दोहराते थे।
सन् २०२२ में जैन इरीगेशन ने अपने वैश्विक परिचालन का एक हिस्सा, जिसमें नाँदनजेन से जुड़े तत्व भी शामिल थे, रिवुलिस के साथ विलय किया। रिवुलिस फ़िमी यानी फ़र्स्ट इज़राइल मेज़ानाइन इन्वेस्टर्स फ़ंड की स्वामित्व वाली कंपनी है जिसके इज़राइल के रक्षा और जेल उद्योगों से कथित संबंध बताए गए हैं। इससे कॉर्पोरेट जाल और गहरा हो गया।
पानी की कंपनी और राज्य सरकारों की भागीदारी
दूसरा धागा मेकोरोट से जुड़ा है। यह इज़राइल की राज्य-स्वामित्व वाली राष्ट्रीय जल कंपनी है जो सन् १९३७ में स्थापित हुई थी और इज़राइल की लगभग अस्सी प्रतिशत पीने योग्य जल की आपूर्ति के लिए ज़िम्मेदार है। मेकोरोट की भारत में मौजूदगी कोई हाशिये की बात नहीं है।
हरियाणा में सन् २०२२ में एक सहयोग ढाँचे पर हस्ताक्षर हुए जिसके तहत मेकोरोट को राज्य के जल वितरण नेटवर्क के पुनर्गठन में सहायता के लिए लगाया गया। यह परियोजना कई ज़िलों को थोक जल आपूर्ति से जुड़ी थी। कर्नाटक ने जल दक्षता और पाइपलाइन प्रबंधन पर इसी तरह की संस्थागत बातचीत शुरू की। ये राज्य सरकारों के अनुबंध हैं जो सार्वजनिक बजट से वित्तपोषित हैं और एक ऐसी कंपनी के साथ हैं जिसके क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में आचरण की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाँच होती रही है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दस्तावेज़ों में दर्ज किया है कि मेकोरोट गर्मियों के महीनों में फ़िलिस्तीनी वेस्ट बैंक समुदायों की जल आपूर्ति पचास प्रतिशत तक काटती है जबकि उसी जलभृत तंत्र से पानी लेने वाली क़रीबी इज़राइली बस्तियों को निर्बाध आपूर्ति जारी रहती है। वेस्ट बैंक में मेकोरोट का बुनियादी ढाँचा, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून की दृष्टि से क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर बना है, करोड़ों शेकेल मूल्य का है।
फ़िलिस्तीन में जल न्याय गठबंधन ने दुनिया भर की सरकारों से इस कंपनी के साथ अनुबंध समाप्त करने का आग्रह किया है। ब्राज़ील के बाहिया राज्य ने अप्रैल २०१६ में ऐसा किया। अर्जेंटीना, ग्रीस और इटली में भी नागरिक समाज अभियान चले हैं। भारतीय राज्य सरकारों को नई दिल्ली से इस तरह का कोई निर्देश नहीं मिला है और घरेलू स्तर पर कोई दबाव नहीं बना है। साझेदारियाँ जारी हैं।
भारतीय मज़दूर और बस्ती निर्माण की अर्थव्यवस्था
तीसरा पहलू कंपनियों से कम और लोगों से अधिक जुड़ा है। सात अक्टूबर २०२३ के बाद इज़राइल ने फ़िलिस्तीनी मज़दूरों के लिए काम के परमिट निलंबित कर दिए। इज़राइल के निर्माण क्षेत्र में लगभग अस्सी हज़ार फ़िलिस्तीनी काम करते थे। इससे गंभीर श्रम संकट पैदा हुआ और इज़राइल ने इसकी भरपाई के लिए भारत का रुख़ किया।
सन् २०२४ के अंत तक लगभग सोलह हज़ार भारतीय मज़दूर इज़राइल के निर्माण क्षेत्र में सक्रिय थे। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और तेलंगाना के मज़दूर इज़राइल के निर्माण स्थलों पर पहुँचे। वजह भी थी। मासिक वेतन कभी-कभी डेढ़ लाख रुपये तक पहुँचता था जो घर पर मिलने वाले वेतन से तीन गुना तक अधिक था।
यहाँ एक कठिन सवाल है। इज़राइल में कुछ निर्माण गतिविधि सीधे वेस्ट बैंक में बस्ती विस्तार की सेवा करती है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आँकड़ों से यह सत्यापित करना मुश्किल है कि कितने भारतीय मज़दूरों को विशेष रूप से बस्ती परियोजनाओं पर तैनात किया गया था। पर ढाँचागत तर्क असुविधाजनक है। भारतीय श्रम ने उस आर्थिक खाई को भरा जो फ़िलिस्तीनी मज़दूरों के बाहर होने से बनी थी। और यह बाहर होना ख़ुद उस संघर्ष का प्रत्यक्ष परिणाम था जिसकी जड़ें बस्ती उद्यम में हैं। इज़राइल की घरेलू अर्थव्यवस्था और उसकी बस्ती अर्थव्यवस्था के बीच कोई साफ़ सीमा नहीं है।
यह सिर्फ़ भाजपा की कहानी नहीं है
सन् २०१४ के बाद भाजपा सरकार ने मध्य पूर्व में एक “डी-हाइफ़नेशन” नीति अपनाई। इसका मतलब था इज़राइल और फ़िलिस्तीन के साथ स्वतंत्र संबंध रखना, दोनों को एक जुड़े पैकेज के रूप में न देखना। आलोचकों ने इसे फ़िलिस्तीनी कारण से पारंपरिक भारतीय एकजुटता से दूरी के प्रमाण के रूप में देखा। यह आलोचना जितनी दूर तक जाती है उतनी तक उचित है।
पर इस लेख में जो आर्थिक उलझन है वह सन् २०१४ से कई साल पहले की है। टीसीएस ने सन् २००५ में यूपीए के दौर में इज़राइल में परिचालन शुरू किया। भारतीय स्टेट बैंक ने सन् २००७ में, फिर यूपीए के ही दौर में, तेल अवीव में शाखा खोली। जैन इरीगेशन का पहला इज़राइली अधिग्रहण सन् २००७ में मनमोहन सिंह के दौर में हुआ। पूर्ण नाँदनजेन अधिग्रहण सन् २०१२ में भी यूपीए के दौर में पूरा हुआ।
क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में काम करने वाली इज़राइली संस्थाओं के साथ भारतीय कॉर्पोरेट जुड़ाव एक दलगत घटना रही है। यह उन सरकारों के दौर में भी चुपचाप आगे बढ़ती रही जो सार्वजनिक तौर पर फ़िलिस्तीन पर बहुत अलग-अलग बातें कहती थीं। इस कहानी का मालिकाना हक़ किसी एक पार्टी को देने का राजनीतिक प्रलोभन समझ में आता है। सच्चाई कहीं ज़्यादा असुविधाजनक है।
क़ानूनी पहलू
चौथा जिनेवा कन्वेंशन, जिसे भारत ने अनुमोदित किया है, किसी क़ब्ज़ा करने वाली शक्ति को अपनी नागरिक आबादी को क़ब्ज़े वाले क्षेत्र में स्थानांतरित करने से रोकता है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने जुलाई २०२४ में अपनी ऐतिहासिक सलाहकार राय में पाया कि इज़राइल का क़ब्ज़ा ग़ैरक़ानूनी है और कहा कि इस ग़ैरक़ानूनी उपस्थिति को जल्द से जल्द समाप्त किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि बस्ती विस्तार हेग विनियमों के उल्लंघन में ज़मीन की ज़ब्ती पर आधारित था।
इस ढाँचे के अनुसार वेस्ट बैंक की बस्तियों को ड्रिप सिंचाई प्रणाली देना महज़ एक व्यावसायिक लेनदेन नहीं है। यह तर्कसंगत रूप से एक ऐसी गतिविधि को भौतिक समर्थन है जिसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून ग़ैरक़ानूनी मानता है। इस क्षेत्र में काम करने वाली भारतीय कंपनियों के लिए क़ानूनी जोखिम वास्तविक है, भले ही अभी तक कोई मुकदमा नहीं चला है। यूरोपीय संघ ने सन् २०१३ से ही यह अनिवार्य कर दिया है कि इज़राइल के साथ सभी समझौतों में क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों की संस्थाओं और गतिविधियों को स्पष्ट रूप से बाहर रखा जाए। भारत के पास ऐसी कोई तुलनीय घरेलू नीति नहीं है।
जो कहा नहीं गया
किसी भी भारतीय सरकार ने, कांग्रेस या भाजपा, बस्ती अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय कॉर्पोरेट मौजूदगी को हतोत्साहित करने के लिए कोई नीति नहीं बनाई। किसी ने भी ख़रीद दिशानिर्देश अद्यतन नहीं किए। किसी ने भी बस्ती-संपर्क वाली इज़राइली संस्थाओं को बाहर नहीं किया।
सितंबर २०२५ में सेंटर फ़ॉर फ़ाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की रिपोर्ट, जिसका शीर्षक था “प्रॉफ़िट एंड जेनोसाइड”, ने इज़राइल के युद्ध और क़ब्ज़े की अर्थव्यवस्था से भारतीय कॉर्पोरेट संबंधों के विश्लेषण में जैन इरीगेशन के साथ अडाणी, टीसीएस, इन्फ़ोसिस और रिलायंस जियो का नाम लिया। भारत सरकार ने रिपोर्ट के निष्कर्षों पर औपचारिक रूप से कोई जवाब नहीं दिया। नाम लिए गई ज़्यादातर कंपनियों ने भी नहीं दिया।
यह चुप्पी ख़ुद एक नीतिगत विकल्प है। और जो चुप्पी काफ़ी देर तक बनी रहे वह ख़ुद नीति बन जाती है।
विरोधाभास जो अनसुलझा है
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट चाहता है। वह ख़ुद को वैश्विक दक्षिण की अग्रणी आवाज़ बताता है। वह वास्तविक नियंत्रण रेखा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने क्षेत्रीय विवादों में अंतरराष्ट्रीय क़ानून का हवाला देता है।
साथ ही उसकी कंपनियाँ, उसकी राज्य सरकारें और उसकी श्रम-निर्यात नीतियाँ एक ऐसी क्षेत्रीय व्यवस्था के साथ सक्रिय आर्थिक संबंध बनाए हुए हैं जिसे वही अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी ढाँचा ग़ैरक़ानूनी मानता है।
इज़राइल के साथ जुड़ाव का कारोबारी तर्क वास्तविक है। रणनीतिक तर्क समझ में आता है। पर क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में आर्थिक पदचिह्न दर्ज है, यह दोनों पार्टियों की देन है, और बयान और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच का अंतर आमतौर पर उस पल सिकुड़ता है जो किसी सरकार की मर्ज़ी से नहीं आता।
यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है जिनमें हू प्रॉफ़िट्स के कॉर्पोरेट दस्तावेज़ीकरण, एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टें, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की जुलाई २०२४ की सलाहकार राय, चौथा जिनेवा कन्वेंशन, सेंटर फ़ॉर फ़ाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की सितंबर २०२५ की रिपोर्ट, जैन इरीगेशन के कॉर्पोरेट फ़ाइलिंग और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी अनुबंध रिकॉर्ड शामिल हैं।
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