एक राजनीतिक पार्टी के उठान और पतन की पूरी दास्तान |
अप्रैल 2011 की एक सुबह, दिल्ली के जंतर मंतर पर कुछ असाधारण हो रहा था।
एक 74 साल का बुज़ुर्ग, सफेद गाँधी टोपी पहने, खुले आसमान के नीचे बैठा था। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। उसकी माँग सिर्फ एक थी सरकार एक ऐसा कानून बनाए जो भ्रष्टाचार की कमर तोड़ दे। उस बुज़ुर्ग का नाम था अन्ना हजारे ।
देश भर से लोग उमड़ पड़े। छात्र, नौकरीपेशा, गृहिणियाँ, रिटायर्ड अफसर सब एक साथ। मुंबई में, बेंगलुरू में, अहमदाबाद में हर जगह एक ही नारा गूँज रहा था: “मैं अन्ना हूँ।”
उस भीड़ में एक चेहरा था | दुबला-पतला, तेज़ आँखों वाला, IRS से इस्तीफा दे चुका एक सरकारी अफसर। नाम था अरविंद केजरीवाल।
उस दिन किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह आंदोलन एक ऐसी पार्टी की नींव रखेगा जो एक दिन 70 में से 67 सीटें जीतेगी, एक पूरे राज्य पर राज करेगी और फिर एक दिन ऐसा आएगा जब उसी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़कर BJP में चले जाएँगे।
यह उसी पार्टी की कहानी है।
जब एक आंदोलन ने पार्टी बनने की ठानी
5 अप्रैल 2011 को अन्ना हजारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया। माँग थी जन लोकपाल बिल। एक ऐसा कानून जो प्रधानमंत्री से लेकर छोटे अफसर तक, सबको जवाबदेह बना सके।
सरकार झुकी। संयुक्त समिति बनाने का वादा हुआ। लेकिन बिल नहीं बना।
अन्ना ने अगस्त 2011 में फिर अनशन किया इस बार दिल्ली के रामलीला मैदान में। लाखों लोग जुटे। देश उबल रहा था। 2G घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला इन सबसे आम आदमी का खून खौल रहा था।
लेकिन जन लोकपाल बिल फिर भी नहीं पास हुआ।
तब टीम अन्ना में दरार पड़ी। अन्ना हजारे का मानना था कि राजनीति में नहीं उतरना चाहिए आंदोलन को आंदोलन ही रहने देना चाहिए। लेकिन केजरीवाल की सोच अलग थी। उनका कहना था: “सिस्टम को बदलना है तो सिस्टम के अंदर जाना होगा।”
26 नवंबर 2012 को भारत के संविधान की वर्षगाँठ के दिन केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की स्थापना की। जंतर मंतर पर ही। जहाँ यह सब शुरू हुआ था।
पार्टी का चुनाव चिह्न था झाड़ू। भ्रष्टाचार को बुहार देने का प्रतीक।
पहली परीक्षा: 2013 जब दिल्ली चौंक गई
दिसंबर 2013। AAP का पहला चुनाव।
किसी को उम्मीद नहीं थी। पार्टी एक साल पुरानी थी। नेता अनजाने चेहरे थे। पैसा नहीं था। दफ्तर नहीं था। संगठन नहीं था।
लेकिन जब नतीजे आए तो पूरा देश हैरान था।
70 में से 28 सीटें। BJP को 31, Congress को 8। किसी को बहुमत नहीं। लेकिन AAP दूसरे नंबर पर।
कांग्रेस के बाहरी समर्थन से केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। देश के सबसे कम उम्र के CM। बस 49 दिन चली सरकार जब जन लोकपाल बिल विधानसभा में नहीं पास हो सका, तो केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया।
लोगों ने इसे आदर्शवाद कहा। आलोचकों ने इसे भगोड़ापन कहा।
शिखर: 2015 इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश
फरवरी 2015। दिल्ली ने फिर मतदान किया।
और इस बार जो हुआ, वो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज हो गया।
70 में से 67 सीटें।
BJP को सिर्फ 3। Congress का खाता तक नहीं खुला।
यह महज एक चुनाव नहीं था। यह एक करोड़ दिल्लीवासियों का उस विचार में भरोसे का इज़हार था कि भ्रष्टाचार-मुक्त, ईमानदार राजनीति संभव है।
केजरीवाल ने मुफ्त बिजली दी। मोहल्ला क्लीनिक खुले। सरकारी स्कूलों का कायाकल्प हुआ। देश भर से पत्रकार, नीति-निर्माता, विद्वान दिल्ली आने लगे “AAP मॉडल” को समझने।
यह AAP का स्वर्ण काल था।
विस्तार: 2022 पंजाब एक और इतिहास
मार्च 2022।
AAP ने पंजाब में पहली बार चुनाव लड़ा और एक ऐसा नतीजा आया जिसने सबके मुँह खुले रखे।
117 में से 92 सीटें।
कांग्रेस, अकाली दल, BJP सब धराशायी। भगवंत मान पंजाब के मुख्यमंत्री बने। इसी चुनाव में एक युवा नेता ने अहम भूमिका निभाई थी राघव चड्ढा। उसी साल 33 साल की उम्र में वो राज्यसभा के सबसे युवा सांसद बने।
AAP अब सिर्फ दिल्ली की पार्टी नहीं रही। वो एक राष्ट्रीय पार्टी बन गई थी।
लेकिन शायद यही वो मोड़ था जहाँ से रास्ता धीरे-धीरे बदलने लगा।
दरारें: जब अपने ही दुश्मन बन गए
बड़ी पार्टी बनने के साथ बड़ी ज़िम्मेदारियाँ आईं। और बड़े विवाद भी।
नवंबर 2021: में दिल्ली सरकार ने नई शराब नीति लागू की। उद्देश्य था शराब माफिया को तोड़ना, सरकारी राजस्व बढ़ाना।
लेकिन जल्द ही आरोप लगे कि इस नीति में घोटाला हुआ।
फरवरी 2023: में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को CBI ने गिरफ्तार किया। वही मनीष सिसोदिया जिन्हें दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प करने का श्रेय दिया जाता था। वो 17 महीने जेल में रहे।
फिर स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर भी आरोप लगे और उन्हें भी गिरफ्तार किया गया।
और फिर आया वो दिन जो किसी ने सोचा भी नहीं था।
21 मार्च 2024: ईडी ने खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया। वो भारत के पहले ऐसे बैठे मुख्यमंत्री बने जिन्हें पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया।
जेल से उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ा। AAP का प्रदर्शन बेहद कमज़ोर रहा। सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह आतिशी मार्लेना को CM बनाया गया।
वह पार्टी जो भ्रष्टाचार के खिलाफ उठी थी, अब खुद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी थी।
पतन: 2025 दिल्ली वो ज़मीन जो खिसक गई
फरवरी 2025।
दिल्ली ने फिर मतदान किया। और इस बार का नतीजा AAP के लिए एक करारा तमाचा था।
70 में से सिर्फ 22 सीटें।
वही दिल्ली जिसने 2015 में 67 सीटें दी थीं, वो 2025 में महज 22 पर सिमट गई।
BJP ने 48 सीटें जीतीं। खुद केजरीवाल अपनी नई दिल्ली सीट से हार गए। मनीष सिसोदिया भी हारे। यमुना सफाई का वादा अधूरा था। ‘शीश महल’ का विवाद था। ‘मुफ्त की रेवड़ी’ का आरोप था।
आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता से बाहर हो गई।
अंत: 24 अप्रैल 2026 जब पार्टी टूट गई
और फिर आया 24 अप्रैल 2026 का वो दिन।
राघव चड्ढा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए। साथ थे संदीप पाठक और अशोक मित्तल दोनों AAP के राज्यसभा सांसद।
चड्ढा ने माइक थामा और कहा:
“आम आदमी पार्टी, जिसे मैंने अपने खून और पसीने से सींचा, जिसे मैंने अपनी जवानी के 15 साल दिए, वो अब अपने मूल सिद्धांतों से पूरी तरह भटक चुकी है।”
उन्होंने कहा कि वो पिछले कई सालों से खुद को “गलत पार्टी में सही आदमी” महसूस कर रहे थे।
घोषणा हुई AAP के 10 में से 7 राज्यसभा सांसद BJP में विलय कर रहे हैं। राघव चड्ढा के साथ संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी ने भी पार्टी छोड़ने का ऐलान किया।
AAP का राज्यसभा में नामोनिशान मिट गया।
AAP नेता संजय सिंह ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने इसे “ऑपरेशन लोटस” करार दिया और कहा कि BJP ने ED और CBI का डर दिखाकर सांसदों को तोड़ा। पंजाब की भगवंत मान सरकार को अस्थिर करने की साज़िश बताया।
लेकिन नुकसान हो चुका था।
सवाल: क्या यह तय था?
यहाँ रुककर एक ज़रूरी सवाल पूछना ज़रूरी है।
क्या AAP का यह हश्र पहले से तय था?
इतिहास बताता है कि जब कोई आंदोलन राजनीतिक पार्टी बनता है, तो उसके सामने एक बुनियादी दुविधा आती है: या तो वो अपने आदर्शों से समझौता करे और टिका रहे। या अपने आदर्शों पर अड़ा रहे और हाशिये पर चला जाए।
AAP ने पहला रास्ता चुना।
2015 की जीत के बाद पार्टी धीरे-धीरे एक पारंपरिक राजनीतिक दल बनने लगी। आंतरिक लोकतंत्र कमज़ोर हुआ। एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सारी ताकत सिमटने लगी। वो नेता जो असहमत हुए योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास एक-एक करके बाहर होते गए।
जो पार्टी यह कहकर बनी थी कि “हम बाकी पार्टियों जैसे नहीं हैं” वो धीरे-धीरे बाकी पार्टियों जैसी ही दिखने लगी।
झाड़ू का सफर
2012 में एक झाड़ू उठाई गई थी भ्रष्टाचार बुहारने के लिए।
2013 में उस झाड़ू ने दिल्ली की राजनीति झकझोर दी।
2015 में उसी झाड़ू ने इतिहास लिख दिया।
2022 में उस झाड़ू ने पंजाब भी जीता।
2024 में उसी झाड़ू को थामने वाले हाथों में हथकड़ी पड़ी।
2025 में दिल्ली ने वो झाड़ू वापस कर दी।
2026 में पार्टी के अपने लोगों ने वो झाड़ू तोड़ दी।
राघव चड्ढा ने जो कहा, वो सिर्फ एक नेता का बयान नहीं था। वो उन तमाम लोगों की आवाज़ थी जिन्होंने 2011 में जंतर मंतर पर खड़े होकर सोचा था कि शायद इस देश की राजनीति बदल सकती है।
शायद ईमानदार आदमी भी चुनाव जीत सकता है। शायद बिना पैसे के भी पार्टी चला सकते हैं। शायद नेता सच में जनता का होता है।
वो सपना टूटा धीरे-धीरे, एक-एक करके।
AAP की कहानी सिर्फ एक पार्टी के उठान और पतन की कहानी नहीं है। यह उस सवाल का जवाब है जो हर आंदोलन से जन्मी पार्टी के सामने आता है:
क्या सत्ता में रहकर बदलाव लाया जा सकता है या सत्ता ही आपको बदल देती है?
AAP का जवाब, कम से कम अभी तक, दूसरे हिस्से में जाता दिखता है।
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