अगर आप भारत की आज़ादी की जद्दोजहद और उसके बाद की राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, तो 3 मई एक ऐसा दिन है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यही वो तारीख़ है जब सुभाष चंद्र बोस ने ‘ऑल इंडिया फ़ॉरवर्ड ब्लॉक’ यानी एआईएफबी की नींव रखी थी। ये पार्टी न सिर्फ़ आज़ादी की लड़ाई के दौरान एक अहम ताक़त बनी, बल्कि आज़ादी के बाद भी वक़्त-वक़्त पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही।
कांग्रेस से अलग होकर बना था फ़ॉरवर्ड ब्लॉक
1939 में जब सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी के बीच विचारों की टकराव अपने चरम पर पहुंची, तब बोस ने 29 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। गांधी अहिंसक रास्ता अपनाना चाहते थे, जबकि बोस सीधे और सख़्त संघर्ष में विश्वास रखते थे। कुछ ही दिन बाद, 3 मई 1939 को उत्तर प्रदेश के माकूर (उन्नाव) में उन्होंने ‘फ़ॉरवर्ड ब्लॉक’ का गठन किया।
बोस का मक़सद था कि कांग्रेस के भीतर जो क्रांतिकारी और समाजवादी सोच रखने वाले लोग हैं, उन्हें एकजुट कर एक नया मंच दिया जाए। कोलकाता में उन्होंने अपने समर्थकों से आह्वान किया कि अब आर-पार की लड़ाई होगी। इसी दौरान 17 युवतियों ने अपने ख़ून से पार्टी के प्रति निष्ठा की शपथ लिखी… एक ऐसा दृश्य जो आज भी याद किया जाता है।
पहला सम्मेलन, संविधान और अख़बार
जून 1939 में पार्टी का पहला सम्मेलन मुंबई में हुआ। यहां पार्टी का संविधान तैयार किया गया और विचारधारा तय की गई। अगस्त में बोस ने ‘फ़ॉरवर्ड ब्लॉक’ नाम से पार्टी का अख़बार शुरू किया, जिससे उनके विचार जन-जन तक पहुंचे। पूरे देश में घूम-घूमकर उन्होंने समर्थन जुटाया और पार्टी को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर खड़ा करने की कोशिश की।
समाजवाद की ओर बढ़ते क़दम
1940 में नागपुर में हुए ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस में पार्टी ने समाजवाद को अपनी विचारधारा के केंद्र में रखा। यहीं से ‘सारी ताक़त भारत की जनता को’ का नारा भी शुरू हुआ। इस सम्मेलन में 22 जून को पार्टी की आधिकारिक स्थापना तिथि घोषित की गई। सुभाष बोस अध्यक्ष बने रहे, जबकि एच.वी. कामथ महासचिव बने।
गिरफ़्तारी और फिर से एक रोमांचक पलायन
लेकिन यही साल बोस के लिए चुनौतीभरा भी रहा। 2 जुलाई 1940 को उन्हें गिरफ़्तार कर कोलकाता की प्रेसिडेंसी जेल में डाल दिया गया। बाद में उन्हें नज़रबंद किया गया, लेकिन जनवरी 1941 में उन्होंने एक बार फिर सबको चौंकाते हुए नज़रबंदी से भागने में सफलता पाई। अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते सोवियत संघ जाने की कोशिश की, लेकिन जब वहां से समर्थन नहीं मिला तो जर्मनी पहुंचे। वहीं ‘फ़्री इंडिया सेंटर’ की स्थापना की और भारतीय सैनिकों की ‘इंडियन लीजन’ बनाई जो ब्रिटिश सत्ता के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तैयार थी।
पार्टी भारत में भी सक्रिय रही
बोस भले ही विदेश में थे, लेकिन भारत में पार्टी के कार्यकर्ता संघर्ष करते रहे। भले ही इंडियन नेशनल आर्मी (INA) से उनका सीधा संबंध न रहा हो, लेकिन जैसे ‘आज़ाद दस्ते’ जैसे गुट Bose की सोच से प्रेरित होकर क्रांतिकारी पर्चे और संदेश फैलाते रहे।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद नई राह
1946 में जब युद्ध ख़त्म हुआ, तो फ़ॉरवर्ड ब्लॉक फिर से खड़ा होने लगा। जबलपुर में आर.एस. रुइकर ने पार्टी की राष्ट्रीय बैठक बुलाई और ‘एफबी वर्कर्स असेंबली’ का गठन हुआ। यही पार्टी का कानूनी चेहरा बना जब पार्टी पर औपचारिक पाबंदी लगी हुई थी।
जून 1946 में ब्रिटिश सरकार ने पार्टी से बैन हटा दिया। इसके बाद पार्टी ने औपचारिक राजनीति में फिर से क़दम रखा। एच.वी. कामथ संविधान सभा के सदस्य बने, लिला रॉय और हेमंत कुमार बसु ने बंगाल में चुनाव जीते।
विचारधारा में फूट और संगठन में बिखराव
लेकिन जल्द ही एकता में दरारें आने लगीं। 1947 में बिहार के आरा में हुए सम्मेलन में एस.एस. कविशर अध्यक्ष और मार्क्सवादी नेता शील भद्र यागी महासचिव बने। इसके बाद पार्टी के भीतर विचारधारा को लेकर तनातनी शुरू हो गई।
1948 में कांग्रेस ने अपने भीतर के असंतुष्टों को निकाल दिया। इसके जवाब में फ़ॉरवर्ड ब्लॉक ने कांग्रेस से संबंध तोड़ दिए। फिर पार्टी ने भारत और पाकिस्तान के लिए अलग-अलग इकाइयां बनाने का फ़ैसला किया, जिससे बंगाल की शाखा नाराज़ हो गई। पार्टी दो गुटों में बंट गई… एक रुइकर और कविशर का गुट चंद्रनगर से चला और दूसरा यागी का गुट कोलकाता से।
चुनाव, असफलताएं और टूटन
1950 के दशक में पार्टी का जनाधार गिरने लगा। त्रिपुरा में चुनाव लड़ा लेकिन कोई सीट नहीं मिली। 1952 में पुरी में हुए सम्मेलन में मोहन सिंह अध्यक्ष और ढिल्लों महासचिव बने।
1955 में यागी और सिंह ने कांग्रेस से विलय का ऐलान कर दिया, यह कहकर कि अब कांग्रेस समाजवादी हो चुकी है। इससे पार्टी में उबाल आ गया। नागपुर में केंद्रीय समिति की बैठक में दोनों को बाहर निकाल दिया गया और हेमंत कुमार बसु व आर.के. हल्दुलकर को उनकी जगह लाया गया।
नए गठबंधन और फिर बिखराव
1964 में पार्टी ने संयुक्त समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर कुछ अभियान चलाए, लेकिन विलय नहीं हुआ। तमिलनाडु में मुथुरामलिंगम थेवर की मृत्यु के बाद पी.के. मूकैयाह थेवर और ससीवरना थेवर के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हुआ, और नया गुट बना… ‘सुभाषिस्ट फ़ॉरवर्ड ब्लॉक’।
त्रिपुरा में CPI और दूसरी पार्टियों के साथ प्रोग्रेसिव फ्रंट बना, लेकिन 1967 के चुनावों से पहले गठबंधन टूट गया।
आंतरिक कलह और वैचारिक बदलाव
1968 में तमिलनाडु में एक और टूट हुई। वेलायुधम नायर और एस. आंडी थेवर ने पार्टी पर दक्षिणपंथी स्वातंत्र्य पार्टी से समझौता करने का आरोप लगाया और ‘रिवोल्यूशनरी फ़ॉरवर्ड ब्लॉक’ बना लिया।
उसी साल बंगाल के पश्चिम दिनाजपुर में किसानों और शरणार्थियों के बीच झड़पें हुईं। CPI(M) नेता हरे कृष्ण कोनार ने इसे किसान एकता की विफलता बताया।
बदलती राजनीति में संघर्ष
1969 में जब कांग्रेस पार्टी टूटी और इंदिरा गांधी ने अलग राह पकड़ी, तब देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। इससे छोटी पार्टियां जैसे फ़ॉरवर्ड ब्लॉक हाशिये पर चली गईं। धीरे-धीरे पार्टी सिर्फ़ पश्चिम बंगाल और कुछ गिने-चुने क्षेत्रों तक सिमट कर रह गई।
आज की स्थिति और विरासत
आज फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का नेतृत्व जी. देवराजन के हाथ में है। पार्टी की राष्ट्रीय पहचान लगभग ग़ायब हो चुकी है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। सुभाष चंद्र बोस की साहसी सोच, उनका पलायन और उनका निडर रवैया आज भी पार्टी की आत्मा में जीवित है।
फ़ॉरवर्ड ब्लॉक आज भले ही चुनावी ताक़त न हो, लेकिन उसकी कहानी बताती है कि कैसे विचार, जुनून और नेतृत्व एक आंदोलन को जन्म दे सकते हैं, और इतिहास में अपनी जगह बना सकते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
यह लेख ऐतिहासिक घटनाओं और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। इसमें व्यक्त किए गए विचार ऐतिहासिक विश्लेषण का हिस्सा हैं और किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का प्रचार नहीं करते। लेख का उद्देश्य केवल जानकारी देना और इतिहास पर सोचने का अवसर देना है।


