अगर आपसे पूछा जाए कि आप अपने पुराने कपड़े, जिन्हें अब आप नहीं पहनना चाहते, उनका क्या करते हैं?
तो शायद आपका जवाब होगा कि आप उन कपड़ों को ज़रूरतमंदों में बाँट देते हैं, बर्तन वाली को दे देते हैं और बदले में घर के लिए बर्तन ले लेते हैं, या फिर अगर कपड़े बहुत पुराने हो चुके हों तो उन्हें घर की सफ़ाई के लिए पोंछे के रूप में इस्तेमाल कर लेते हैं। है न?
लेकिन अगर आपसे कहा जाए कि ये सारे कपड़े आप ऐसी जगह दे सकते हैं जहाँ इनका सही उपयोग हो सके, तो कैसा लगेगा?
जी हाँ, अब आप अपने ये सारे कपड़े ऐसी जगह दान कर सकते हैं जहाँ उन्हें साफ़ करके ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जाता है, और इससे टेक्सटाइल कचरे की समस्या भी कम होती है।
इसका नाम है अर्पण केंद्र दिल्ली सरकार द्वारा मेट्रो स्टेशनों पर स्थापित छोटे-छोटे वस्त्र-दान केंद्र, जिनका उद्देश्य है पुराने कपड़ों को कचरा बनने से रोकना और उन्हें सही जगह तक पहुँचाना।
अर्पण केंद्र क्या है?
ये केंद्र फ़िलहाल दिल्ली के कुछ चुनिंदा मेट्रो स्टेशनों पर संचालित हो रहे हैं मयूर विहार फ़ेज़ 1, शालीमार बाग़, पंजाबी बाग़ वेस्ट, शाहदरा, और डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर हॉस्पिटल मेट्रो स्टेशन (रोहिणी वेस्ट)। आने वाले समय में और भी मेट्रो स्टेशनों पर ये केंद्र खोले जाएँगे, ताकि अधिक से अधिक लोग इनका लाभ उठा सकें।
इन केंद्रों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें मेट्रो स्टेशन जैसी सुलभ जगह पर स्थापित किया गया है यानी किसी भी यात्री के लिए अपने कपड़े दान करना बेहद आसान हो जाता है। रोज़ाना दफ़्तर या घर आते-जाते समय ही यह काम हो जाता है, न अलग से समय निकालने की ज़रूरत पड़ती है, न कहीं दूर जाने की।
यह काम कैसे करता है?
प्रक्रिया बहुत सरल है। आपको बस अपने पुराने कपड़े चाहे वे शर्ट हों, जींस हों, बिस्तर की चादरें हों या तकिए के कवर साफ़ और सूखी हालत में वहाँ ले जाना होता है। वहाँ स्वयं सहायता समूह (SHG) की महिलाएँ इन कपड़ों को तौलती हैं। इसके बाद आपको एक QR कोड दिया जाता है, जिसमें आप अपना नाम, फ़ोन नंबर और कपड़ों का वज़न दर्ज करते हैं। फ़ॉर्म भरने के बाद आपको एक डिजिटल प्रमाण-पत्र मिलता है, जो आपके योगदान का प्रमाण होता है।
इसके बाद इन कपड़ों की छँटाई की जाती है। जो कपड़े अच्छी हालत में होते हैं, उन्हें गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के माध्यम से ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जाता है। और जो कपड़े अब पहनने लायक नहीं रहते, उन्हें पुनर्चक्रित (रीसायकल) करके दोबारा धागा बनाया जाता है, जिससे नए वस्त्र-उत्पाद तैयार किए जा सकें।
यह ज़रूरी क्यों है?
आजकल फ़ास्ट फ़ैशन ब्रांड्स की वजह से कपड़ों की ख़रीदारी काफ़ी बढ़ गई है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन शॉपिंग ने लोगों को सस्ते और चलन में रहने वाले कपड़ों तक आसान पहुँच दे दी है, लेकिन इन्हें सही तरीक़े से नष्ट करने या पुनर्चक्रित करने की व्यवस्था उतनी तेज़ी से विकसित नहीं हुई।
इसी वजह से आज दिल्ली में टेक्सटाइल कचरा, कुल ठोस कचरे का लगभग 10 से 15 प्रतिशत बन चुका है। भारत सरकार की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत हर साल लगभग 7,073 किलो टन टेक्सटाइल कचरा उत्पन्न करता है, जिसमें से लगभग 4,100 किलो टन पोस्ट-कंज़्यूमर कचरा होता है यानी वे कपड़े जो घरों से इस्तेमाल के बाद फेंके जाते हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि नगर निगम की कचरा-प्रबंधन व्यवस्था में केवल गीला कचरा, सूखा कचरा और प्लास्टिक के लिए ही अलग श्रेणियाँ हैं। कपड़ों के लिए कोई अलग संग्रहण या छँटाई व्यवस्था नहीं है, जिसकी वजह से ये कपड़े चाहे-अनचाहे कचरे के ढेर में ही मिल जाते हैं।
पुराने तरीक़े पर्याप्त क्यों नहीं हैं?
हमारे यहाँ सदियों से एक अनौपचारिक व्यवस्था चलती आई है बर्तन वाली को कपड़े देना, घरेलू सहायकों को देना, या फिर पुराने कपड़े सेकंड-हैंड बाज़ार में बेच देना। दिल्ली की वाघरी समुदाय, जो दशकों से लोगों के घरों से पुराने कपड़े लेकर बदले में बर्तन देती आई है, इसका एक अच्छा उदाहरण है।
लेकिन यह व्यवस्था भी पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। आज भी लगभग आधा टेक्सटाइल कचरा लैंडफ़िल में ही पहुँच जाता है। दिवाली के आसपास, जब लोग घर की सफ़ाई करते हैं, तब अक्सर फ़्लाईओवर के नीचे या कचरे के डिब्बों के पास कपड़ों के बड़े-बड़े थैले छोड़े हुए दिखते हैं इस उम्मीद में कि कोई ज़रूरतमंद उन्हें उठा लेगा। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता, और कई कपड़े वहीं पड़े रह जाते हैं।
केवल देना ही काफ़ी नहीं, ज़िम्मेदारी लेना भी ज़रूरी है
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने वाली है केवल कपड़े दान कर देना ही पर्याप्त नहीं है, यह जानना भी उतना ही ज़रूरी है कि वे कपड़े अंततः कहाँ पहुँच रहे हैं। दान को केवल एक “अंतिम समय की अलमारी-सफ़ाई” की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक सोच-समझकर लिया गया क़दम होना चाहिए, जिससे कपड़े अधिक से अधिक समय तक उपयोग में रह सकें।
अच्छी बात यह है कि भारत के पास टेक्सटाइल पुनर्चक्रण की अच्छी क्षमता पहले से मौजूद है। कमी केवल इतनी है कि घरों से लेकर पुनर्चक्रण केंद्रों तक कपड़ों को पहुँचाने का एक उचित और कारगर नेटवर्क नहीं था और अर्पण केंद्र जैसी पहलें इसी कमी को पूरा करने की कोशिश कर रही हैं।
एक छोटा क़दम, बड़ी सोच के साथ
अर्पण केंद्र अकेले इस पूरी टेक्सटाइल कचरा समस्या का समाधान नहीं कर सकता फ़ास्ट फ़ैशन की वजह से बढ़ती ख़रीदारी अभी भी इन छोटे केंद्रों की क्षमता से कहीं अधिक बड़ी है। लेकिन यह एक शुरुआत ज़रूर है। मेट्रो स्टेशन जैसी सुलभ जगह पर इस तरह की सुविधा होने से लोगों के लिए ज़िम्मेदारी से कपड़े दान करना काफ़ी आसान हो जाता है न किसी अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत, न किसी अलग यात्रा की।
शायद यही असली बदलाव है जिसकी ज़रूरत थी कपड़ों को “फेंकने” से “ज़िम्मेदारी से देने” तक का सफ़र, जो एक धागे से शुरू होकर पूरे समाज तक पहुँचता है।
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