भारत में गर्मी अब केवल एक मौसम नहीं रह गई है। पिछले कुछ वर्षों में तापमान के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं और हीटवेव यानी लू की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्र रूप में सामने आ रही हैं। देश के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम हीटवेव को अब भी केवल मौसमी परेशानी मान रहे हैं, जबकि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।
हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, अत्यधिक गर्मी का एक दिन देशभर में लगभग 3,400 अतिरिक्त मौतों से जुड़ा हो सकता है। वहीं पांच दिनों तक चलने वाली भीषण हीटवेव के दौरान करीब 30,000 अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया है। ये आंकड़े वैज्ञानिक मॉडल पर आधारित अनुमान हैं, न कि वास्तविक रूप से दर्ज मौतों की संख्या। फिर भी ये इस संकट की गंभीरता को समझने के लिए पर्याप्त हैं।
खामोश इसलिए क्योंकि इसके निशान दिखाई नहीं देते
बाढ़, भूकंप या चक्रवात जैसी आपदाएं अपने पीछे विनाश के स्पष्ट निशान छोड़ जाती हैं। लेकिन हीटवेव का असर अक्सर दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि इसे कई बार “खामोश आपदा” कहा जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी शरीर पर गंभीर असर डाल सकती है। इससे हृदय, किडनी और श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। कई मामलों में मौत का तत्काल कारण किसी अन्य बीमारी के रूप में दर्ज हो जाता है, जिससे गर्मी के वास्तविक प्रभाव का आकलन करना कठिन हो जाता है। इसी कारण कई शोधकर्ताओं का मानना है कि हीटवेव से जुड़ा वास्तविक स्वास्थ्य बोझ आधिकारिक आंकड़ों से अधिक हो सकता है।
सबसे ज्यादा खतरा किन लोगों को?
हीटवेव का असर सभी पर पड़ता है, लेकिन कुछ वर्ग इससे अधिक प्रभावित होते हैं। निर्माण कार्यों में लगे मजदूर, किसान, डिलीवरी कर्मचारी, सड़क किनारे काम करने वाले लोग और अन्य श्रमिक लंबे समय तक खुले आसमान के नीचे काम करते हैं। इसलिए उनके लिए गर्मी का खतरा अधिक होता है।
इसके अलावा बुजुर्ग, छोटे बच्चे और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोग भी अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए गर्मी से बचाव के साधन जुटाना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
शहर क्यों बन रहे हैं गर्मी के केंद्र?
भारत के कई शहर तेजी से फैल रहे हैं। कंक्रीट की इमारतें, चौड़ी सड़कें और घटते हरित क्षेत्र गर्मी को बढ़ाने का काम करते हैं। वैज्ञानिक इसे “अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” कहते हैं। इसके कारण शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक हो सकता है।
हालिया अध्ययन में अहमदाबाद, जयपुर और सूरत जैसे कई शहरों और जिलों को हीटवेव के लिहाज से अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है। यह संकेत देता है कि शहरी विकास और जलवायु परिवर्तन मिलकर गर्मी की समस्या को और गंभीर बना सकते हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने नई चुनौती
कोविड-19 महामारी ने दिखाया था कि किसी बड़े स्वास्थ्य संकट का असर पूरे देश पर पड़ सकता है। अब विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती हीटवेव भी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।
अत्यधिक गर्मी के दौरान हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और गर्मी से जुड़ी अन्य समस्याओं के मामलों में वृद्धि देखी जाती है। यदि भविष्य में हीटवेव की तीव्रता और अवधि बढ़ती है, तो अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए स्वास्थ्य तंत्र को भी बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुसार तैयार करना होगा।
अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है असर
हीटवेव का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। अत्यधिक गर्मी लोगों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है। विशेष रूप से कृषि, निर्माण और अन्य बाहरी कार्यों में लगे लोगों के लिए लंबे समय तक काम करना मुश्किल हो जाता है।
इसके साथ ही बिजली की मांग भी बढ़ती है। एयर कूलर, पंखों और अन्य शीतलन उपकरणों के अधिक उपयोग से ऊर्जा की खपत बढ़ जाती है। इससे बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
क्या केवल जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में अत्यधिक गर्मी की घटनाओं को अधिक बार और अधिक तीव्र बना रहा है। भारत भी इस बदलाव का असर महसूस कर रहा है। हालांकि समस्या केवल जलवायु परिवर्तन तक सीमित नहीं है।
तेजी से हो रहा शहरीकरण, घटते हरित क्षेत्र और पर्यावरणीय असंतुलन भी गर्मी के प्रभाव को बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। इसलिए इस चुनौती का समाधान भी कई स्तरों पर करना होगा।
अब क्या किया जाना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि हीटवेव को केवल मौसम संबंधी घटना के रूप में नहीं देखना चाहिए। राज्यों और शहरों को प्रभावी हीट एक्शन प्लान लागू करने, लोगों को समय पर चेतावनी देने और सार्वजनिक स्थानों पर पीने के पानी तथा छाया जैसी सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत है।
इसके साथ ही अधिक पेड़ लगाने, शहरी हरित क्षेत्रों को बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने जैसे कदम भी महत्वपूर्ण हैं। लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है ताकि वे गर्मी के दौरान आवश्यक सावधानियां अपना सकें।
एक चेतावनी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
हीटवेव धीरे-धीरे भारत की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बनती जा रही है। यह ऐसी आपदा है जो बिना किसी बड़े शोर के लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इसे केवल मौसम की सामान्य घटना मानना उचित नहीं होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि हम बढ़ती गर्मी के खतरे को समझें और इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और विकास से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में देखें। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह खामोश आपदा और भी बड़ी चुनौती बन सकती है।
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