मुंबई को साफ़-सुथरा रखने के लिए पहले भी कई अभियान चले हैं। इसके बावजूद सड़कों पर कचरा और गंदगी एक रोज़ाना की चुनौती बनी हुई है। अब बृहन्मुंबई नगर निगम यानी बीएमसी ने एक नया दांव खेला है। इसे मुंबई क्लीन लीग का नाम दिया गया है। काग़ज़ पर यह योजना बहुत सीधी लगती है कि सबसे साफ़ वार्ड, सोसायटियों, सड़कों और बाज़ारों को नकद इनाम दिया जाए। इस हफ़्ते नगर निगम मुख्यालय में इसका आगाज़ हुआ। अभिनेता अक्षय कुमार इसके ब्रांड एंबेसडर बने हैं। मुंबई जैसे शहर में जहाँ सितारों की चमक सिर चढ़कर बोलती है, वहाँ इस पहल ने सबका ध्यान खींचा है।
इनामों का गणित और ज़मीनी हक़ीक़त
इस मुक़ाबले में शहर के हर हिस्से को शामिल किया गया है। इसमें रिहायशी सोसायटियाँ, झुग्गी बस्तियाँ, दुकानें, अस्पताल, स्कूल और सार्वजनिक शौचालय शामिल हैं। यहाँ तक कि बगीचों और सड़कों के लिए भी अलग श्रेणियाँ रखी गई हैं। बीएमसी के पोर्टल पर पंजीकरण शुरू हो चुका है। निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी इन सबका मूल्यांकन करेगी। जीतने वालों को १.५ लाख रुपये से लेकर सबसे साफ़ वार्ड के लिए २५ लाख रुपये तक का इनाम मिलेगा। दिसंबर २०२६ में अंतिम पुरस्कार दिए जाएँगे। यह आम मुंबईकरों की भागीदारी पर लगाया गया एक बड़ा दांव है।
सबसे मोटी रक़म सबसे साफ़ प्रशासनिक वार्ड को मिलेगी। यह तर्कसंगत भी है क्योंकि एक वार्ड लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। सोसायटियों और व्यावसायिक केंद्रों के लिए कुछ कम रक़म रखी गई है। बीएमसी का कहना है कि इसका मक़सद लोगों में असली उत्साह जगाना है। पहले की कोशिशें सिर्फ़ बगीचों या रूफ़टॉप टेरेस तक सिमटकर रह जाती थीं। इस बार जाल बड़ा बिछाया गया है। सॉलिड वेस्ट विभाग को उम्मीद है कि क्यूआर कोड और ऑनलाइन ट्रैकिंग से पक्षपात की गुंजाइश ख़त्म हो जाएगी।
पैसे किसके खाते में जाएँगे
हालाँकि एक व्यावहारिक उलझन अभी भी बनी हुई है। मान लीजिए कि क्रॉफर्ड मार्केट या भुलेश्वर जैसा कोई भीड़भाड़ वाला बाज़ार जीत जाता है। तो वह पैसा आख़िर जाएगा किसके पास? क्या वह व्यापारियों के संगठन के खाते में जमा होगा? या फिर छोटे दुकानदारों के बीच बाँटा जाएगा? यही सवाल सोसायटियों के मामले में भी है। क्या चेक सीधे ट्रेज़रर को मरम्मत के लिए मिलेगा या किसी सामान्य फंड में चला जाएगा? नगर निगम ने अभी तक इस प्रक्रिया पर साफ़ तौर पर कुछ नहीं कहा है। अभी सारा ज़ोर केवल श्रेणियों और पारदर्शिता पर है। यह अस्पष्टता बाद में भ्रम पैदा कर सकती है।
राजनीति और प्रोटोकॉल का तड़का
लॉन्च के दौरान स्थानीय नेताओं का अच्छा जमावड़ा रहा। मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमित साटम ने इस विचार का स्वागत किया। उन्होंने बताया कि यह आईडिया जनसंपर्क के दौरान सामने आया था। लेकिन कार्यक्रम में सब कुछ सहज नहीं था। शिवसेना के एक नेता ने बैठने की व्यवस्था को लेकर कमिश्नर को पत्र लिख दिया। उनकी पार्टी के डिप्टी मेयर को चौथी पंक्ति में जगह मिली थी। मुंबई की राजनीति में ऐसी बातें अक्सर होती रहती हैं। यह दिखाता है कि एक सफ़ाई अभियान भी प्रोटोकॉल और कुर्सी की लड़ाई में कैसे उलझ सकता है।
दुनिया के दूसरे कोनों से क्या सीखें
यूरोप में इस तरह की प्रतियोगिताएँ बरसों से चल रही हैं। यूरोपियन ग्रीन कैपिटल अवार्ड इसका बड़ा उदाहरण है। हाइडलबर्ग और लाहती जैसे शहर लाखों यूरो के इनाम जीत चुके हैं। वह पैसा नए पर्यावरण प्रोजेक्ट्स में लगाया जाता है। वहाँ जज केवल वादे नहीं बल्कि ठोस नतीजे देखते हैं। यह साबित करता है कि अगर नियम साफ़ हों तो पैसा शहर की सूरत बदल सकता है।
वहीं अफ़्रीका का नज़ारा थोड़ा अलग है। रवांडा का किगाली शहर महाद्वीप के सबसे साफ़ शहरों में गिना जाता है। वहाँ हर महीने ‘उमुगांडा’ के दिन अधिकारी और बच्चे मिलकर सड़कों की सफ़ाई करते हैं। वहाँ कोई नकद इनाम नहीं है बल्कि सामूहिक गौरव की भावना काम करती है। लैटिन अमेरिका में ब्राज़ील के कुरीतिबा शहर ने कचरे के बदले खाने के कूपन या बस टोकन देने की शुरुआत की थी। यह तरीका सीधे रोज़ाना की ज़रूरत से जुड़ा है इसलिए सफल रहा।
क्या इनाम से जागेगा मुंबईकर
यही सबसे दिलचस्प बहस है। मुंबई हमेशा अपनी रफ़्तार और भागदौड़ के लिए जानी जाती है। वर्सोवा के कोली हों या लोअर परेल के मिल मज़दूर, सब अपने काम में मशगूल रहते हैं। फिर भी कचरा जमा होता है क्योंकि नगर निगम की गाड़ियाँ देरी से आती हैं और कुछ लोगों को फ़र्क नहीं पड़ता। बीएमसी को भरोसा है कि २५ लाख रुपये की रक़म व्यवहार बदल देगी। शायद यह काम कर जाए। एक जीतने वाली सोसायटी अपनी लाइटें ठीक करा सकती है या ज़्यादा पेड़ लगा सकती है।
लेकिन क्या साफ़ रहने के लिए हमें पैसों के लालच की ज़रूरत है? स्वच्छ भारत अभियान ने दिखाया था कि जब लोग अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं तो बदलाव आता है। मुंबई की लोकल ट्रेनों में भीड़ बहुत होती है फिर भी वे अंदर से काफ़ी हद तक साफ़ रहती हैं क्योंकि मुसाफ़िर उसे अपना मानते हैं। बाज़ारों में दुकानदार सफ़ाई रखते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वहाँ ग्राहक आते हैं। पैसा थोड़े समय के लिए मदद कर सकता है लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब इनाम बंद हो जाएँगे।
आम ज़िंदगी पर इसका असर
अंधेरी ईस्ट की किसी आम हाउसिंग सोसायटी के बारे में सोचिए। वहाँ निर्माण कार्य की धूल कारों पर जमी रहती है और कचरे के डिब्बे भरे रहते हैं। यह लीग निवासियों को एक ठोस वजह देती है कि वे बेहतर ढंग से कचरा प्रबंधन करें। झुग्गी बस्तियों में चुनौती और बड़ी है। वहाँ साझा शौचालय और तंग गलियों की निगरानी ज़रूरी है। इनाम की रक़म से वहाँ बुनियादी सुधार किए जा सकते हैं जो लंबे समय तक काम आएँगे।
मरीन ड्राइव से वर्ली तक का तटीय हिस्सा पहले से ही साफ़ दिखता है। अगर यही सफ़ाई गिरगाँव या सायन की गलियों तक पहुँच जाए तो शहर को सुकून मिलेगा। बाज़ार हमारे शहर की धड़कन हैं लेकिन वे अक्सर प्लास्टिक और सड़ी हुई सब्ज़ियों के बीच दबे रहते हैं। एक विजेता बाज़ार दूसरे दुकानदारों को भी बेहतर कूड़ेदान रखने के लिए प्रेरित कर सकता है।
मुंबई हर साल और घनी होती जा रही है। इमारतों का दबाव बढ़ रहा है और ट्रेनों में पैर रखने की जगह नहीं है। ऐसे में सफ़ाई की कोई भी कोशिश मायने रखती है। अक्षय कुमार जैसे चेहरे से युवाओं को जोड़ने में मदद मिल सकती है। आख़िरकार बात तो आम आदमी की ही है। एक सब्ज़ी बेचने वाली महिला जो अपनी जगह रोज़ साफ़ करती है या वह वॉचमैन जो कचरा अलग करने की याद दिलाता है। ये छोटे काम बिना किसी इनाम के भी होते रहे हैं। यह लीग बस उन पर रोशनी डालने का काम कर रही है।
इनाम बाँटने का समारोह अभी महीनों दूर है। तब तक हमें पता चल जाएगा कि कौन सी सोसायटियाँ और कौन से बाज़ार आगे रहे। असली कहानी दिसंबर २०२६ तक गलियों में लिखी जाएगी। क्या यह पैसा स्थायी बदलाव लाएगा या चेक क्लियर होते ही उत्साह ठंडा पड़ जाएगा? मुंबई ने पहले भी हमें हैरान किया है। शायद इस बार भी यह शहर अपने शोर और भीड़ के बीच एक साफ़ सुथरा कल ढूँढ ही लेगा।

