मुंबई देश की आर्थिक राजधानी, हर साल मानसून आते ही पानी-पानी हो जाती है। बरसात शुरू होते ही सड़कें दरिया बन जाती हैं, लोकल ट्रेनें थम जाती हैं और ऑफिस जाने वाले लोग घंटों तक ट्रैफिक में फंसे रहते हैं। इस बार भी कुछ अलग नहीं हुआ। 26 मई 2025 को आई पहली ही जोरदार बारिश ने पूरे शहर को थाम दिया। सवाल वही है – आखिर मुंबई हर साल बरसात में क्यों डूब जाती है? इस बारिशने लोगों को 26 जुलाई, 2005 को मुंबई में बारिश के कारण भयावह बाढ़ की याद दिलाई जहॉ 24 घंटे की अवधि में 944 मिमी बारिश हुई थी।
26 मई की बारिश: रिकॉर्ड टूटे, जनजीवन रूका
इस बार मानसून ने 1950 के बाद सबसे जल्दी दस्तक दी। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, सांताक्रूज़ वेधशाला में 24 घंटे में 268 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो 2019 के बाद सबसे ज़्यादा है। कोलाबा में 83.8 मिमी बारिश हुई। कई इलाकों में घंटों तेज बारिश हुई, जिससे पूरा शहर ठहर गया।
कहां-कहां भरा पानी? मुंबई के कई इलाकों में भारी जलभराव हुआ। प्रमुख प्रभावित इलाके थे:
- दादर, हिंदमाता, वडाला, चेंबूर, अंधेरी, बांद्रा, जुहू कोलीवाड़ा
- सियॉन-पनवेल हाईवे (मानखुर्द के पास)
- घाटकोपर, कुर्ला, मुलुंड और कांदिवली में भी सड़कों पर पानी भर गया
यह वही इलाके हैं, जहां हर साल जलभराव होता है। लेकिन इसके समाधान अब तक नहीं निकले।
लोगों की परेशानियां: स्कूल बंद, लोकल ट्रेनें ठप
भारी बारिश के कारण सेंट्रल रेलवे की लोकल ट्रेन सेवाएं CSMT-ठाणे रूट पर जलभराव की वजह से रुक गईं। बीएमसी को स्कूलों और कॉलेजों में छुट्टी घोषित करनी पड़ी। बस सेवाएं भी बाधित रहीं। कई लोग ऑफिस या जरूरी काम पर समय पर नहीं पहुंच पाए।
शहर की सड़कें ट्रैफिक जाम से जूझती रहीं और लोग घुटनों तक पानी में फंसे रहे। पहली ही बारिश ने लोगों को दिखा दिया कि आने वाले तीन महीनों में क्या हालात रहने वाले हैं।
बीएमसी की तैयारियां – सिर्फ कागज़ों तक?
बीएमसी हर साल दावा करती है कि वह मानसून से निपटने के लिए तैयार है। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं:
- बीएमसी ने कहा कि 82% नालों की सफाई हो चुकी है, लेकिन उनके खुद के डैशबोर्ड पर यह आंकड़ा 71% दिखा।
- 2022 में जहां 482 डिवाटरिंग पंप लगाए गए थे, इस बार उनकी संख्या घटाकर 417 कर दी गई।
- हिंदमाता जैसे जलभराव प्रभावित इलाके में अंडरग्राउंड टैंक को पंपों से जोड़ा ही नहीं गया।
यानी बारिश आई नहीं कि शहर पहले से ही घुटने टेक देता है।
हर साल एक जैसी कहानी क्यों?
मुंबई की जल निकासी व्यवस्था 100 साल पुरानी है। शहर की आबादी, निर्माण और ट्रैफिक अब कई गुना बढ़ चुका है, लेकिन सीवेज सिस्टम वही पुराना है। अतिक्रमण, खराब प्लानिंग, नालों की समय पर सफाई न होना और ड्रेनेज सिस्टम का जर्जर होना, ये सब मिलकर हर साल मुंबई को डुबोते हैं।
कई बिल्डिंग प्रोजेक्ट्स ने नालों पर निर्माण कर दिया है। इससे बारिश का पानी बह नहीं पाता और सड़कों पर भर जाता है। इसके अलावा, प्लास्टिक और कचरे से नाले अक्सर जाम रहते हैं।
राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप
26 मई की बारिश के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज हो गई। विपक्ष के नेता आदित्य ठाकरे ने बीएमसी और राज्य सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि “शहर को बीएमसी नहीं, मुख्यमंत्री कार्यालय चला रहा है।” वहीं, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि इतनी जल्दी और इतनी तेज बारिश की उम्मीद नहीं थी।
राजनीति अपने जगह है, लेकिन आम मुंबईकर को इससे कोई राहत नहीं मिलती।
समाधान कब मिलेगा?
मुंबई का हर नागरिक जानता है कि बारिश आएगी, पानी भरेगा, ट्रेनें रुकेंगी और दफ्तर देर से पहुंचेंगे। लेकिन प्रशासन हर साल आश्वासन ही देता है। जब तक दीर्घकालिक समाधान नहीं लाया जाएगा – जैसे कि नई ड्रेनेज प्रणाली, प्रभावशाली नाला सफाई, अनधिकृत निर्माण पर कार्रवाई और प्लास्टिक कचरे की सख्त निगरानी – तब तक मुंबई यूं ही हर मानसून में डूबती रहेगी।


