उम्र 17 साल, रिपोर्टों के मुताबिक विश्व रैंकिंग में टॉप 1,000 से बाहर, और अब पहला पेशेवर खिताब जेब में। रिकॉर्ड सुर्खी है, पर असली कहानी कोयंबटूर की इस लड़की की है।
टेनिस में अब दो “लागोस” हैं, और दोनों में 17 साल की एक भारतीय खिलाड़ी ने जीत दर्ज की। अक्टूबर 2004 में 17 साल की सानिया मिर्ज़ा ने नाइजीरिया के लागोस में एकल खिताब जीता था। 22 साल बाद, रविवार 11 अक्टूबर 2026 को 17 साल की माया राजेश्वरन रेवती ने पुर्तगाल के अल्गार्वे इलाके के लागोस में डब्ल्यू35 टूर्नामेंट जीत लिया। फ़ाइनल में उन्होंने स्पेन की सेलिया सर्विनो रुइज़ को 6-4, 6-2 से हराया। डबल्स में यूक्रेन की येलिज़ावेता कोतलियार के साथ दूसरा खिताब भी जीता। सानिया ने भी नाइजीरिया वाले लागोस में एकल के साथ डबल्स खिताब जीता था। रिपोर्टों के अनुसार माया इस स्तर पर एकल खिताब जीतने वाली सबसे कम उम्र की भारतीय महिला हैं। सानिया तब 17 साल 10 महीने की थीं, माया 17 साल 3 महीने 29 दिन की हैं।
लेकिन रिकॉर्ड सिर्फ़ यह बताते हैं कि खिलाड़ी ने क्या किया। तो सवाल है, वह हैं कौन?
एक शौक, जो शौक नहीं रहा
माया का जन्म 12 जून 2009 को तमिलनाडु के कोयंबटूर में हुआ। टेनिस आठ साल की उम्र में स्कूल के बाद के एक खेल के रूप में शुरू हुआ। लेकिन 10 साल की उम्र तक वह तय कर चुकी थीं कि पेशेवर खिलाड़ी बनना है, क्योंकि उन्हें मुकाबला करना पसंद था। 2023 में उन्होंने पाँच जूनियर खिताब जीते और ऑस्ट्रेलियन ओपन के साथ होने वाले अंडर-14 शोकेस का न्योता पाया। कोर्ट के बाहर वह एक आम किशोरी हैं, जिसे इतिहास पढ़ना और ट्रेकिंग पसंद है।
वह हफ़्ता, जिसने उन्हें नक्शे पर ला दिया
ज़्यादातर भारतीयों ने उनका नाम पहली बार फ़रवरी 2025 में मुंबई ओपन में सुना, जो डब्ल्यूटीए 125 स्तर का टूर्नामेंट है। माया तब 15 साल की थीं, बिना रैंकिंग, और खेलने की योजना भी नहीं थी। क्वालिफ़ाइंग का वाइल्डकार्ड मिला और सब बदल गया। यह उनका सिर्फ़ पाँचवाँ पेशेवर टूर्नामेंट था।
उन्होंने बेलारूस की इरीना शिमानोविच, कज़ाख़स्तान की पूर्व टॉप 50 खिलाड़ी ज़रीना दियास और जापान की मेई यामागुची को हराया। सेमीफ़ाइनल में स्विट्ज़रलैंड की जिल टाइशमैन से हार मिली। फिर भी वह सानिया के बाद किसी घरेलू डब्ल्यूटीए टूर्नामेंट के एकल सेमीफ़ाइनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय बनीं, और डब्ल्यूटीए रैंकिंग पाने वाली सबसे कम उम्र की भारतीय भी। इसके बाद उन्हें स्पेन के मायोर्का में राफ़ा नडाल अकादमी की स्कॉलरशिप मिली।
बीच का मुश्किल दौर
यहीं से लागोस की जीत परीकथा से ज़्यादा दिलचस्प हो जाती है। मुंबई के बाद सफ़र सीधा नहीं रहा। माया की करियर-सर्वश्रेष्ठ एकल रैंकिंग 642 मार्च 2025 में आई थी, और रिपोर्टों के मुताबिक पुर्तगाल पहुँचते समय वह टॉप 1,000 से बाहर थीं। जूनियर ग्रैंड स्लैम के एकल में इस साल वह दूसरे दौर से आगे नहीं बढ़ सकीं, और उन्होंने खुद माना है कि नतीजे उम्मीद से कमज़ोर रहे। डबल्स में वह यूएस ओपन जूनियर के सेमीफ़ाइनल और विंबलडन जूनियर के क्वार्टरफ़ाइनल तक पहुँचीं।
लागोस में वह क्वालिफ़ायर और अंडरडॉग थीं। पहले ही दौर में उन्होंने टॉप सीड जस्टिना मिकुलस्काइटे को हराया, जो दुनिया में 246वें नंबर की खिलाड़ी हैं। मुख्य ड्रॉ में उन्होंने एक भी सेट नहीं गँवाया। सेमीफ़ाइनल में ब्रिटेन की ब्रिट डु प्री के हटने से वॉकओवर मिला। डबल्स में माया और कोतलियार पहला सेट 0-6 से गँवाकर भी वापसी करके सुपर टाई-ब्रेक 10-7 से जीतीं।
माया कहती हैं कि वह बिना किसी उम्मीद के उतरी थीं और बस अपना सर्वश्रेष्ठ खेलना चाहती थीं। फ़ाइनल के दूसरे सेट में उन्होंने खुद को शांत रखने के लिए गुनगुनाना शुरू किया, ताकि ध्यान खिताब पर नहीं, हर अंक पर रहे।
एक बड़ा फ़ैसला, महीने भर पहले
लागोस से करीब एक महीने पहले माया ने नडाल अकादमी छोड़कर दक्षिण फ़्रांस के एलीट टेनिस सेंटर से जुड़ने का फ़ैसला किया। वहाँ वह संस्थापक और मुख्य कोच जाँ-रेने लिस्नार्ड के मार्गदर्शन में खेल रही हैं। उन्होंने बस इतना कहा कि परिवार ने वही चुना जो उनके लिए सबसे बेहतर लगा। सफलता से ठीक पहले ठिकाना बदलना जोखिम भरा था। यह जीत उसी का नतीजा है या संयोग, अभी कोई नहीं कह सकता।
सानिया और तुलना का बोझ
सानिया से तुलना तय थी, और माया ने इसे परिपक्वता से संभाला। उनके मुताबिक सानिया को कोई पीछे नहीं छोड़ सकता, वह दिग्गज हैं और हमेशा उनकी आदर्श रहेंगी। उन्होंने अपनी उपलब्धि बढ़ाकर पेश करने से भी इनकार किया: पहला खिताब सिर्फ़ शुरुआत है, जिसने भरोसा दिया कि वह इस स्तर पर मुकाबला कर सकती हैं।
माया और पेशेवर टूर्नामेंट खेलना चाहती हैं, खासकर यूरोप में, और महिला रैंकिंग में ऊपर चढ़ना चाहती हैं। साथ में जूनियर ग्रैंड स्लैम भी खेलेंगी। अगले कुछ महीने शारीरिक मजबूती, चोटों से बचाव, फुर्ती और कुछ तकनीकी बदलावों पर लगेंगे।
डब्ल्यू35 पेशेवर टेनिस की निचली सीढ़ी है, और आगे का रास्ता लंबा और अक्सर निराश करने वाला है। लेकिन जो किशोरी अंडरडॉग बनकर इस तरह जीतती है और फिर भी इसे सिर्फ़ शुरुआत कहती है, उस पर नज़र रखना बनता है। माया राजेश्वरन की कहानी अभी बस शुरू हुई है।
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