ईरान और इज़राइल के बीच चल रहे युद्ध ने एक बार फिर ईरान और उसकी राजधानी तेहरान को वैश्विक सुर्खियों में ला दिया है। दुनिया के सबसे प्राचीन, वैभवशाली और कला-संस्कृति में समृद्ध शहरों में से एक — तेहरान — आज अस्त-व्यस्त जीवन की साक्षी बन चुका है। आइए, जानें इस ऐतिहासिक नगर की विरासत और परंपरा को…
अल्बोर्ज़ की पहाड़ियों की गोद में, जहाँ सितारे पहाड़ों से बातें करते हैं, तेहरान समय की किताब का एक जीवित पन्ना है। इसकी चट्टानों पर साम्राज्यों की दास्तानें खुदी हैं और हवाओं में कवियों की रचनाएँ गूंजती हैं। एक समय का छोटा-सा गाँव, आज इतिहास की भट्टी में तपकर एक चमकता सितारा बन चुका है। इसका हृदय अखमेनिद साम्राज्य के सपनों और सफाविद काल की कलाओं से बुना गया है, जो आज युद्ध की आँच में भी धड़कता है।
सिल्क रोड के कारवाँ यहाँ मसाले और स्वप्न लेकर आए थे। 16वीं सदी में सफाविद बादशाहों ने इसे सांस्कृतिक मशाल बनाया था। 18वीं सदी में काजर शासकों ने इसे ईरान का केंद्र बनाया था और गोलस्तान महल को स्वर्ग सा सजाया था।
“तेहरान फारस की आँख है,” यह कथन जेम्स मोरियर ने 19वीं सदी में इसकी भव्यता देखकर लिखा था। जून 2025 में जब इज़राइली हवाई हमले इसके आसमान को हिला रहे हैं, तब भी तेहरान की लौ अडिग है, ये एक ऐसा शहर है जो कभी नहीं झुकता। इसकी कहानी आज भी विद्वानों और स्वप्नदृष्टाओं को पुकारती है।
तेहरान का अतीत अद्वितीय है। अखमेनिद साम्राज्य की 2,500 किलोमीटर लंबी “रॉयल रोड” रोम की सड़कों से भी आगे थी। सूचनाएँ पलक झपकते महाद्वीपों तक पहुँचती थीं। तेहरान के निकट ससानिद विद्वानों ने चिकित्सा में क्रांति की और इस्लामी और यूरोपीय चिकित्सा को नई दिशा दी। अल-बिरूनी ने तारे गिने और मध्यकालीन यूरोप को चकित कर दिया। “फारस के तारों के जानकार स्वर्ग को छूते हैं,” यह प्रशंसा 10वीं सदी में अल-मसूदी ने की थी। 13वीं सदी तक फारसी वेधशालाएँ अद्वितीय खगोलीय नक्शे बना रही थीं।
फिर उस देश की संस्कृति भारत तक भी पहुँची। 8वीं से 10वीं सदी के बीच इस्लामी अत्याचारों से बचकर पारसी भारत के गुजरात पहुँचे। राजा जादी राणा ने उन्हें अपनाया। उनकी अवेस्तन भाषा संस्कृत से मिलती-जुलती थी, जिसने ईरान और भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ा। पारसी समुदाय ने ‘फरोहर’ प्रतीक को संरक्षित रखा जो तेहरान की ज़रथुस्त्री जड़ों का प्रतीक है।
तेहरान की आत्मा उसका संघर्ष है। मंगोलों ने इसे जलाया, तैमूर और उस्मानियों ने हमला किया, लेकिन इसके बाज़ार कभी रुके नहीं। 19वीं सदी में काजर महलों ने फारसी कला को यूरोपीय भव्यता से सजाया। चायख़ाने सूफी कविताओं और नई सोच से गूंजते रहे। “तेहरान की रूह दुनिया को जोड़ती है,” 1850 में मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था। आज भी इसके विश्वविद्यालय और टेक्नोलॉजी हब इस अलगाव को चुनौती देते हैं।
अब जब इज़राइली जेट परमाणु ठिकानों और नागरिक क्षेत्रों पर हमले कर रहे हैं, तब तेहरान लोग डरे है लेकिन शहर के कलाकार दीवारों पर विरोध उकेरते हैं। इतिहास ने तेहरान को अडिग रहना सिखाया है, ठीक वैसे ही जैसे भारत आए पारसियों ने एक नई शुरुआत की थी, व्यापार और परोपकार से अपनी पहचान बनाई थी।
तेहरानी लोग गर्मजोशी और जज्बे का प्रतीक हैं। संघर्षों ने इन्हें गढ़ा है। 1906 में इन्होंने एशिया की पहली संवैधानिक क्रांति की शुरुआत की थी। कवियित्री फ़ोरूघ फ़र्रोखजाद ने सच्चाई की बेबाक आवाज़ दी, फिल्मकार अब्बास कियारोस्तामी ने विश्व सिनेमा को चुनौती दी। 19वीं सदी में माणेकजी जैसे पारसियों ने तेहरान के ज़रथुस्त्री स्कूलों को संबल दिया। आज जब युद्ध की आग है, तब भी तेहरानी हौसले से खड़े हैं, गुजरात के पारसी भाइयों की तरह।
लेकिन खतरे कम नहीं। 1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान और पश्चिम के बीच लंबी दूरी बना दी। 1980–1988 के ईरान-इराक युद्ध में करीब दो लाख जानें गईं और $350 बिलियन का नुकसान हुआ। 1990 के खाड़ी युद्ध ने अलगाव को और बढ़ाया। 1995 से अमेरिकी प्रतिबंधों ने भी ईरान की 80% अर्थव्यवस्था को पंगु किया। जनवरी 2024 से जून 2025 तक रियाल की कीमत 62% गिरी, महंगाई 32% तक पहुंची और बेरोज़गारी 25% हो गई।
इस बार इज़राइली हमलों में तेहरान के परमाणु और नागरिक ठिकाने निशाने पर आए है। 224 लोग मारे गए है। जवाब में ईरान की 380 मिसाइलों और 100 ड्रोनों ने 24 इज़राइली जानें लीं है। डर के बीच भी, ईरान में स्टार्टअप्स और छुपी हुई कला जीवित है।
ईरान-इज़राइल 1979 से पहले सहयोगी थे। लेकिन क्रांति के बाद इज़राइल को पश्चिमी प्यादा बताया गया। हिज़्बुल्लाह और हमास के समर्थन ने विवाद बढ़ाया। इज़राइल के परमाणु हथियार और ईरान की परमाणु आकांक्षाओं ने गुप्त युद्ध को जन्म दिया। 2002 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खुलासे के बाद साइबर हमले और वैज्ञानिकों की हत्याएँ बढ़ीं। 13 जून 2025 को इज़राइल ने तेहरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया, जिस में देश के वरिष्ठ कमांडर मारे गए, और युद्ध का खतरा और गहराया।
तेहरान और पारसी के संबंध गहरे हैं। पारसी ज़रथुस्त्री प्रकाश को भारत ले आए। उनके अवेस्तन भजन वैदिक मंत्रों से गूंजते हैं। 19वीं सदी में माणेकजी ने तेहरान में ज़रथुस्त्री शिक्षा को पुनर्जीवित किया। आज, तेहरान के लगभग 30,000 ज़रथुस्त्री इज़राइली हमलों की निंदा करते हुए भारत के पारसियों से एकजुटता दिखाते हैं।
विषम हालात के चलते भी तेहरान की आत्मा अडिग है। मिसाइलों के बीच भी, इसके बाजार ज़िंदा हैं। यदि शांति लौटे तो तेहरान एक बार फिर अपनी पुरानी शान पा सकता है, और दूर बैठे पारसी भाई-बहन उसकी हिम्मत को सराहते रहेंगे।
तेहरान सिर्फ एक शहर नहीं, हौसले की मिसाल है। इसका अतीत गौरवशाली, वर्तमान संघर्षपूर्ण और भविष्य आशान्वित है। अखमेनिद साम्राज्य की सड़कें हों या पारसियों का पलायन, इस शहर ने विश्व को आकार दिया है। युद्ध की मार झेलकर भी, यह शहर डटा हुआ है। मिसाइलें इसके आसमान को चीर सकती हैं, लेकिन इसकी रूह अमर है, पारसियों की यात्रा की तरह।
कोई ताकत तेहरान की ज्योति को मंद नहीं कर सकती। यह साहस, संस्कृति और स्वप्नों की अनूठी मिसाल है, युगों तक चमकने वाला दीपक।


