एक ऐसे शासक की कहानी, जो मरने के 226 साल बाद भी सुर्खियों में है

फरवरी 2026 की बात है। महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में एक तस्वीर को लेकर बवाल मच गया। नवनिर्वाचित डिप्टी मेयर निहाल अहमद ने अपने दफ्तर में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाई। शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने विरोध किया और वो तस्वीर हटवा दी गई। बस, इसी एक घटना ने पूरे महाराष्ट्र की राजनीति में आग लगा दी।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने यहाँ तक कह दिया कि “टीपू सुल्तान की वीरता छत्रपति शिवाजी महाराज के समान थी।” BJP ने इसे हिंदू भावनाओं पर चोट बताया और पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

सवाल यह है कि एक ऐसा शासक जिसने कभी महाराष्ट्र पर राज नहीं किया, जो दक्षिण भारत के मैसूर का सुल्तान था वो आज महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा क्यों बन जाता है?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए पहले टीपू सुल्तान को जानना जरूरी है।

टीपू सुल्तान कौन थे? इतिहास के पन्नों से

टीपू सुल्तान का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली साहब टीपू था। उनका जन्म 1 दिसंबर 1751 को देवनहल्ली में हुआ था, जो आज बेंगलुरु के पास बेंगलुरु ग्रामीण जिले में स्थित है। वो अपने जमाने के सबसे शक्तिशाली और चतुर शासकों में से एक थे।

उनके पिता हैदर अली मैसूर साम्राज्य में एक सैन्य अधिकारी थे, जो 1761 में मैसूर के वास्तविक शासक बन गए। हैदर अली ने अपने बेटे को बचपन से ही युद्धकला, राजनीति और कई भाषाओं की शिक्षा दिलाई।

1782 में दूसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान हैदर अली की कैंसर से मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठे। उन्होंने 1799 तक  यानी 17 साल मैसूर पर शासन किया।

टीपू सुल्तान को “शेर-ए-मैसूर” (मैसूर का शेर) के नाम से जाना जाता था। वो अपने समय के कुछ गिने-चुने भारतीय शासकों में से एक थे जिन्होंने अंग्रेज़ों को युद्ध में हराया।

टीपू का राज्य कहाँ था? महाराष्ट्र से क्या संबंध?

यह समझना बहुत जरूरी है कि टीपू सुल्तान का राज्य मैसूर था, जो आज का कर्नाटक राज्य है। उनकी राजधानी श्रीरंगपट्टनम थी।

उन्होंने 1766 में मालाबार (आज का केरल) पर हमले से अपने सैन्य अभियानों की शुरुआत की। 1767 में उन्होंने कर्नाटक के कार्नाटिक क्षेत्र में मराठों के खिलाफ घुड़सवार सेना का नेतृत्व किया। 1775 से 1779 के बीच उन्होंने कई बार मराठों से युद्ध किया।

यानी टीपू सुल्तान ने महाराष्ट्र पर राज करना तो दूर, मराठों से लड़ाइयाँ लड़ी थीं। वो मैसूर, मालाबार, बेदनूर, कर्नाटक और त्रावणकोर के शासक थे  महाराष्ट्र उनके राज्य में कभी शामिल नहीं था।

चार युद्ध, एक अंत आंग्ल-मैसूर युद्धों की कहानी

टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों से चार बड़े युद्ध लड़े:

पहला आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767–1769): इसमें हैदर अली और युवा टीपू ने मिलकर अंग्रेजों को टक्कर दी। यह युद्ध मद्रास की संधि के साथ समाप्त हुआ।

दूसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780–1784): इस युद्ध में टीपू ने 1780 में पोलिलूर की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण जीत हासिल की। 1782 में उनके पिता की मृत्यु हो गई और टीपू ने गद्दी संभाली। 1784 में उन्होंने अंग्रेजों के साथ मंगलुरु की संधि की।

तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790–1792): इसका अंत श्रीरंगपट्टनम की संधि (मार्च 1792) से हुआ, जिसके तहत टीपू को अपना आधा राज्य देना पड़ा और अपने दो बेटों को अंग्रेजों के पास बंधक के रूप में भेजना पड़ा।

चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799): गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेज़्ली ने फ्रांस के साथ टीपू की बढ़ती दोस्ती को देखते हुए हमला किया। यह युद्ध 17 अप्रैल 1799 को शुरू हुआ और 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम में टीपू की वीरगति के साथ समाप्त हुआ।

टीपू सुल्तान ने अंत तक लड़ते हुए अपनी जान दी। उनका प्रसिद्ध कथन था  “एक दिन शेर की तरह जीना, हज़ार साल भेड़ की तरह जीने से बेहतर है।”

टीपू की उपलब्धियाँ जो उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती हैं

टीपू सुल्तान सिर्फ एक योद्धा नहीं, एक दूरदर्शी शासक भी थे:

1. रॉकेट तकनीक के जनक: टीपू सुल्तान रॉकेट तोपखाने के अग्रदूत थे। उन्होंने लोहे के आवरण वाले मैसूरी रॉकेट विकसित किए और अपनी सेना में 5,000 तक रॉकेट सैनिक तैनात किए। इन रॉकेटों ने बाद में ब्रिटिश कांग्रेव रॉकेट के विकास को प्रेरित किया, जो नेपोलियन युद्धों में इस्तेमाल हुए।

2. प्रशासनिक सुधार: टीपू ने नई मुद्रा प्रणाली, नया पंचांग और नई भूमि राजस्व प्रणाली लागू की। उन्होंने मैसूर में रेशम उद्योग की नींव रखी।

3. कूटनीतिक दृष्टि: टीपू ने फ्रांस, ओटोमन साम्राज्य और फारस से संपर्क किया। नेपोलियन बोनापार्ट ने भी टीपू के अंग्रेज़ विरोध की प्रशंसा की और उनसे गठबंधन का सपना देखा, हालांकि यह संभव नहीं हो सका।

महाराष्ट्र की राजनीति में टीपू क्यों?

अब वापस असली सवाल पर आते हैं।

घटना  मालेगांव की तस्वीर

फरवरी 2026 में मालेगांव की नवनिर्वाचित डिप्टी मेयर निहाल अहमद ने अपने दफ्तर में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाई। शिवसेना कार्यकर्ताओं ने इस पर ऐतराज़ जताया और प्रशासन के हस्तक्षेप से वो तस्वीर हटवा दी गई।

डिप्टी मेयर निहाल अहमद ने कहा कि तस्वीर दफ्तर की मरम्मत के कारण उतारी गई थी और वो इसे वापस लगाएंगी। उन्होंने यह भी कहा “पहले महात्मा गांधी की, फिर डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की तस्वीर होनी चाहिए। टीपू सुल्तान पर विवाद क्यों? क्या उन्होंने अंग्रेज़ों से लड़ते हुए जान नहीं दी?”

कांग्रेस का बयान और फिर बवाल

महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि जिस तरह की वीरता छत्रपति शिवाजी महाराज में थी और जो ‘स्वराज्य’ की अवधारणा उन्होंने दी उसी परंपरा से प्रेरणा लेकर बाद में टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों से युद्ध किया। BJP के लिए यह बयान किसी चिंगारी से कम नहीं था और पूरे महाराष्ट्र में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

BJP का पलटवार और “डबल स्टैंडर्ड” का आरोप

BJP मंत्री मंगल प्रभात लोढा ने कहा कि उन्होंने कभी किसी जगह का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखने का प्रस्ताव नहीं दिया और वो हमेशा इसके विरोध में रहे हैं।

वहीं कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने BJP पर “दोहरे मानदंड” अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने अकोला और मुंबई के नगर निकायों में BJP नेताओं द्वारा पहले टीपू सुल्तान को समर्थन दिए जाने के उदाहरण दिए।

शिवसेना UBT के मुखपत्र ‘सामना’ ने भी लिखा कि BMC में ऐसे दस्तावेज़ उपलब्ध हैं जो BJP के टीपू प्रेम को उजागर करते हैं और BJP ने अतीत में टीपू सुल्तान का राजनीतिक फायदे के लिए कई बार इस्तेमाल किया।

इतिहासकार क्या कहते हैं?  दो नजरिए

टीपू सुल्तान एक विवादास्पद ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। इतिहासकारों में उनके बारे में दो मत हैं:

पहला नजरिया  देशभक्त योद्धा: भारत के महान नाटककार गिरीश कर्नाड ने कहा था कि “अगर टीपू सुल्तान हिंदू होते, तो महाराष्ट्र में उनका वही दर्जा होता जो शिवाजी महाराज का है।” टीपू के समर्थक उन्हें एक ऐसे शासक के रूप में देखते हैं जिसने अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ डटकर लड़ाई लड़ी।

उल्लेखनीय है कि टीपू सुल्तान की तस्वीर भारत के मूल हस्तलिखित संविधान के पृष्ठ 144 पर रानी लक्ष्मीबाई के साथ उन लोगों में शामिल है जिन्होंने अंग्रेज़ों से लड़ाई लड़ी।

दूसरा नजरिया  विवादास्पद धार्मिक नीतियाँ: इतिहासकार केट ब्रिटलबैंक के अनुसार टीपू की कुछ समुदायों पर की गई कार्रवाइयाँ धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से थीं। जिन समुदायों को निशाना बनाया गया, वो अंग्रेज़ों के समर्थन में थे।

असली सवाल महाराष्ट्र में यह राजनीति क्यों?
1. पहचान की राजनीति

महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज सर्वोच्च आदर्श हैं। किसी भी ऐतिहासिक मुस्लिम शासक की तुलना शिवाजी से करना चाहे वो टीपू हों, औरंगज़ेब हों या कोई और यहाँ राजनीतिक भूचाल ला देता है।

2. ध्रुवीकरण का हथियार

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सपकाल ने स्वयं BJP पर आरोप लगाया कि वो टीपू सुल्तान के मुद्दे का इस्तेमाल बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए कर रही है।

3. वोट बैंक की गणित

महाराष्ट्र में मुस्लिम मतदाताओं की एक महत्वपूर्ण संख्या है। टीपू सुल्तान को नायक के रूप में पेश करना एक ओर अल्पसंख्यक वोटों को साधने की कोशिश हो सकती है, तो दूसरी ओर BJP इसे हिंदू भावनाओं को एकजुट करने के लिए इस्तेमाल करती है।

4. औरंगज़ेब के बाद टीपू

2026 की शुरुआत में ही महाराष्ट्र की राजनीति में औरंगज़ेब को लेकर बड़ा विवाद हो चुका था। टीपू सुल्तान का मुद्दा उसी कड़ी में अगला अध्याय बनकर सामने आया। यह एक चक्र है जब भी चुनाव नज़दीक हों या सरकार पर दबाव हो, इतिहास के पन्नों से कोई न कोई विवादास्पद नाम निकाल लिया जाता है।

टीपू सुल्तान एक जटिल ऐतिहासिक शख्सियत हैं। वो मैसूर के शासक थे, महाराष्ट्र के नहीं। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी यह सच है। उनके कुछ कदमों पर ऐतिहासिक विवाद भी है यह भी सच है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम इतिहास से सीखना चाहते हैं, या उसे राजनीति का हथियार बनाना चाहते हैं?

टीपू सुल्तान 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम में वीरगति को प्राप्त हुए। आज 226 साल बाद, वो मैसूर से हजारों किलोमीटर दूर महाराष्ट्र की राजनीति में जीवित हैं। यह उनकी ऐतिहासिक महत्ता का प्रमाण भी है और भारतीय राजनीति की उस कमज़ोरी का भी, जो हर मुश्किल दौर में इतिहास के पन्नों में समाधान ढूंढने निकल पड़ती है।

जब तक राजनीति में असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की ज़रूरत होगी टीपू सुल्तान, औरंगज़ेब और ऐसे तमाम नाम बार-बार सुर्खियों में आते रहेंगे।

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