29 जुलाई को राज्यसभा ने प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पेश किया था। इस विधेयक में वंदे मातरम के अपमान को अपराध घोषित करने की मांग की गई है। अगर यह कानून बनता है, तो राष्ट्रगीत को भी उतनी ही कानूनी सुरक्षा मिलेगी, जितनी राष्ट्रगान को मिलती है। इस घटनाक्रम ने एक पुराना सवाल फिर से उठा दिया है क्या हम सभी वंदे मातरम को पूरी तरह जानते हैं, या सिर्फ उसकी शुरुआती दो पंक्तियों तक सीमित हैं?
ज़्यादातर भारतीय स्कूल, समारोह और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल पहले दो छंद ही सुनते हैं। लेकिन बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की मूल रचना में कुल छह छंद हैं। बाकी चार छंद आम जनता के लिए लगभग अनजाने ही रह गए हैं।
एक कविता जो उपन्यास से निकली
वंदे मातरम सबसे पहले 7 नवंबर 1875 को लिखा गया था। यह अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ बांग्ला भाषा में रचा गया एक गीत है। बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने 1882 के उपन्यास “आनंदमठ” में शामिल किया।
इस गीत को पहली बार सार्वजनिक रूप से 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। धीरे-धीरे यह स्वतंत्रता आंदोलन का एक भावनात्मक प्रतीक बन गया, और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना को व्यक्त करने वाला गीत माना जाने लगा।
आज़ादी के बाद सिर्फ दो छंद ही क्यों चुने गए?
जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने पर विचार हुआ। लेकिन पूरा गीत नहीं, केवल इसके पहले दो छंदों को आधिकारिक मान्यता दी गई।
इसका मुख्य कारण यह माना जाता है कि शुरुआती दो छंद मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता जल, फल, हवा और हरियाली का वर्णन करते हैं, और इन्हें अधिक समावेशी समझा गया। आगे के छंदों में जो भाव और प्रतीक आते हैं, उन्हें उस समय व्यापक स्वीकृति की दृष्टि से जटिल माना गया।
यही कारण है कि आज भी विद्यालयों और सरकारी आयोजनों में केवल यही दो छंद गाए जाते हैं, जबकि पूरा गीत कहीं अधिक विस्तृत और बहुस्तरीय है।
छह छंदों की यात्रा मातृभूमि से लेकर शक्ति की देवी तक
पहला छंद मातृभूमि को नमन करता है जल से भरपूर, फलों से समृद्ध, मलय पर्वत की शीतल हवा से सुवासित और हरी-भरी फसलों से आच्छादित धरती के रूप में।
दूसरा छंद मातृभूमि की कोमलता और सौंदर्य का चित्रण करता है चांदनी रातों की चमक, खिले हुए फूल और मुस्कुराती हुई मां जैसी भूमि, जो सुख और वरदान देने वाली है।
तीसरा छंद शक्ति और एकता का प्रतीक है। इसमें करोड़ों कंठों की पुकार और करोड़ों हाथों की रक्षा-भावना का वर्णन है। कवि पूछता है इतनी शक्ति होते हुए भी मातृभूमि को दुर्बल कैसे कहा जा सकता है?
चौथा छंद मातृभूमि को केवल भूमि नहीं, बल्कि विद्या, धर्म और शक्ति का स्वरूप बताता है हर हृदय में बसी श्रद्धा और हर भुजा में बसा बल।
पांचवां छंद मातृभूमि की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से करता है यानी साहस, समृद्धि और ज्ञान की त्रिमूर्ति के रूप में।
छठा और अंतिम छंद फिर से आरंभिक भावना पर लौटता है जल से परिपूर्ण, फलों से भरी, हरी-भरी और सदा मुस्कुराती मातृभूमि की छवि के साथ गीत का समापन होता है।
विवाद क्यों जुड़ा रहा है इस गीत से?
वंदे मातरम को लेकर बहस नई नहीं है। समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या इसे सार्वजनिक अवसरों पर गाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। पांचवें छंद में आने वाले देवी-स्वरूप प्रतीकों को लेकर भी अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं।
यही वजह है कि जब भी वंदे मातरम राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आता है, तो यह चर्चा भी लौट आती है कि हम इस गीत को कितना जानते हैं और कितना केवल दो पंक्तियों तक सीमित समझ बैठे हैं।
एक गीत जो किसी उपन्यास के पन्नों से निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज़ बना, आज भी अपनी पूरी गहराई के साथ बहुत कम लोगों तक पहुंच पाया है।
नया विधेयक भले ही कानूनी सुरक्षा की बात करे, लेकिन असली सम्मान शायद तभी पूरा होगा जब हम इस गीत को केवल एक रस्म की तरह नहीं, बल्कि इसकी पूरी रचना और भावना के साथ समझें।
छह छंदों की यह यात्रा मातृभूमि की सुंदरता से लेकर उसकी शक्ति, ज्ञान और दिव्यता तक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की उस दृष्टि को दर्शाती है, जो एक गीत में पूरे भारत को समेटने की कोशिश करती है।
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