हर साल 1 जुलाई को भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। डॉक्टरों के समर्पण और सेवाभाव को सलाम करने का दिन। लेकिन क्या हम जानते हैं कि इस पेशे में कदम रखना कभी इतना आसान नहीं था, खासकर महिलाओं के लिए ?

भारत में जब भी महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं या महिला सशक्तिकरण की बात होती है, तो एक नाम बार-बार उभरता है – आनंदीबाई गोपालराव जोशी। यह वह नाम है जिसने उन्नीसवीं सदी के कठोर सामाजिक ढांचे को चुनौती दी और डॉक्टर बनने की हिम्मत दिखाई, उस समय जब महिलाओं को स्कूल भेजना भी अपराध माना जाता था।

बचपन से संघर्ष

आनंदीबाई का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, 1865 में। बचपन का नाम था यमुना। परिवार आर्थिक रूप से मजबूत नहीं था, और सिर्फ 9 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई, जो की उस समय की एक आम परंपरा थी। शादी के बाद उनका नाम पड़ा आनंदी।

गोपालराव जोशी, उनके पति, एक डाक विभाग में काम करते थे, लेकिन उनकी सोच समय से काफी आगे की थी। उन्होंने आनंदी को पढ़ाने की ठान ली। यह एक आम आदमी का असाधारण निर्णय था। जब आनंदी महज 14 साल की थीं, तब उनका पहला बच्चा पैदा हुआ; लेकिन पर्याप्त चिकित्सा न मिलने के कारण वह कुछ ही दिनों में चल बसा। यह दुखद घटना आनंदीबाई के मन में महिला डॉक्टरों की जरूरत की भावना को गहरा कर गई।

शिक्षा की तरफ पहला कदम

गोपालराव ने कई स्कूलों और मिशनरी संस्थानों से संपर्क किया। कई जगहों से मना हुआ, तानों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होने हार नहीं मानी। अंत में कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक मिशन स्कूल में उन्हें पढ़ाई का अवसर मिला।

हालांकि शिक्षा सिर्फ कक्षा में नहीं हो रही थी, घर के बाहर हर दिन संघर्ष का सबक भी चल रहा था। उनके खिलाफ विरोधी पत्र लिखे जाते, समाज बहिष्कार की धमकी देता था। पर गोपालराव और आनंदी, दोनों अपने निर्णय पर अडिग रहे।

अमेरिका जाने का निर्णय

साल 1880 के आसपास, गोपालराव ने तय किया कि आनंदी को विदेश भेजा जाए, ताकि वो मॉडर्न मेडिसिन की पढ़ाई कर सकें। यह कदम उस समय अकल्पनीय था, एक ब्राह्मण महिला अकेले अमेरिका जाएगी, वो भी पढ़ने के लिए?

काफी कोशिशों के बाद, अमेरिका की एक महिला – थिओडेसिया कारपेंटर, आनंदीबाई की मदद के लिए सामने आईं। उन्होंने न सिर्फ रहने की व्यवस्था की, बल्कि कॉलेज में एडमिशन और आर्थिक सहायता भी दिलाई। 1883 में, आनंदीबाई ने अमेरिका के वुमन्स मेडिकल कॉलेज ऑफ पेंसिल्वेनिया में दाखिला लिया।

मेडिसिन की पढ़ाई: तीन साल का संघर्ष

अमेरिका पहुंचना सिर्फ पहला कदम था। वहां का वातावरण, भाषा, रहन-सहन – सब कुछ नया था। ऊपर से शरीर भी साथ नहीं दे रहा था। सर्द मौसम में उनकी तबीयत बार-बार खराब होती थी। लेकिन वो भी कहां हार मानने वालों मे से थी। ड़टी रहीं, सारी मुश्कीलों का सामना किया।

तीन साल के कठिन प्रशिक्षण के बाद, 1886 में उन्होंने एम.डी. की डिग्री प्राप्त की। उनकी थीसिस का विषय था – Hindu Obstetrics यानी हिंदू महिलाओं में प्रसव की परंपराएं और देखभाल। यह थीसिस भारतीय संस्कृति को चिकित्सा दृष्टिकोण से देखने का एक प्रयास था।

आनंदीबाई जब अमेरिका में पढ़ रही थीं, उस समय ही भारत में उनकी खबरें छपने लगी थीं। लोग उनकी कहानी से प्रभावित हो रहे थे। वे एक प्रेरणा बन रही थीं। क्वीन विक्टोरिया तक को उनकी उपलब्धि की जानकारी दी गई थी।

वापसी और दुखद अंत

डिग्री लेकर जब वे भारत लौटीं, तब उन्हें पुणे में नौकरी भी प्रस्तावित हुई थी। लेकिन तब तक टीबी ने उनका शरीर जकड़ लिया था। इलाज संभव नहीं हो पाया। और आखिरकार, 26 फरवरी 1887 को आनंदीबाई ने अंतिम सांसे ली।

उनकी राख अमेरिका में रहने वाली थिओडेसिया को भेजी गई, जिन्होंने एक स्मारक बनवाया। आज भी वह स्मारक न्यूयॉर्क में मौजूद है। सिर्फ 21 वर्षों की छोटी-सी जीवनयात्रा में, आनंदीबाई ने भारतीय महिलाओं के लिए एक प्रेरणादायक आदर्श खड़ा कर दिया। दुर्भाग्य से, उनकी बुद्धिमत्ता और चिकित्सा ज्ञान का लाभ समाज को मिल नहीं सका। 

उस दौर में जब महिलाओं का जीवन सिर्फ “चूल्हा और बच्चा” तक सीमित माना जाता था, आनंदीबाई जोशी ने एक नया रास्ता दिखाया, एक ऐसा मानदंड, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए मिसाल बन गया।

फिल्म ने फिर से जिंदा की उनकी कहानी

2019 में उनकी कहानी पर बनी मराठी फिल्म आनंदी गोपाळ” ने फिर से एक पीढ़ी को उनका नाम सिखाया। इस फिल्म ने उस समय की सामाजिक पृष्ठभूमि, स्त्री शिक्षा की जटिलता और पति-पत्नी के रिश्ते को बेहद संवेदनशीलता से दिखाया।

यह सिर्फ एक बायोपिक नहीं थी, यह उस युग की क्रांति की कहानी थी। एक प्रेमकथा थी जो शिक्षा, समर्थन और बराबरी के इर्दगिर्द घूमती थी।

आज की पीढ़ी के लिए सबक

एक ओर सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले स्त्री-शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे, तो दूसरी ओर आनंदी और गोपाल जोशी का यह जोड़ा अपने लक्ष्य को पाने के लिए लगातार मेहनत कर रहा था। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर जिद और दृढ़ता हो, तो कोई भी बड़ा काम असंभव नहीं होता। समाज में बदलाव लाना हो तो रास्ते में बाधाएं आएंगी ही, लेकिन उनसे डरकर रुकना नहीं चाहिए।

यह एक दुर्भाग्य ही था कि डॉक्टर बनने के बावजूद, आनंदीबाई को किसी भी भारतीय महिला का इलाज करने का मौका नहीं मिल सका। 

आज महिलाएं डॉक्टर बन रही हैं, वैज्ञानिक बन रही हैं, अंतरिक्ष में जा रही हैं – लेकिन यह सब कुछ संभव हुआ, क्योंकि एक लड़की ने 1800 के दशक में समाज को चुनौती देने की हिम्मत की थी।

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