“भारत का लाड़ला दीनदयाल” एक ताज़गीभरा अध्याय है। विचारशील दर्शकों और गुणवत्ता के आग्रहियों के लिए यह अवश्य देखने योग्य है
हिंदी रंगमंच केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। समय-समय पर रंगमंच ने समाज, संस्कृति, राजनीति और मानवीय मूल्यों को केंद्र में रखकर यादगार सृजन दिए हैं। लेकिन मनोरंजन-प्रधान और हल्के विषयों के बीच ऐसे नाटक कम ही आते हैं जो विचारोत्तेजक हों। ऐसे नाटक जो दर्शकों को थिएटर से बाहर निकलने के बाद लंबे समय तक सोचने पर मजबूर कर दे। “भारत का लाड़ला दीनदयाल” ऐसा एक असाधारण और प्रयोगशील नाट्य अनुभव है।
“भारत का लाड़ला दीनदयाल” नाटक केवल पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की कथा नहीं कहता। यह नाटक भारत नामक राष्ट्र की आत्मा को समझने का एक स्तुत्य और प्रेरक प्रयास है। राजनीति अक्सर सत्ता, प्रचार और व्यक्तिपूजा के घने धुंधलके में खो जाती है। वहीं, “भारत का लाड़ला दीनदयाल” राष्ट्र-केंद्रित विचारधारा, आध्यात्मिकता और राष्ट्रभावना की बात करता है। निर्माता जश वीरा, लेखक प्रयाग दवे, निर्देशक प्रितेश सोढ़ा और दीनदयाल की भूमिका में प्रशंसनीय अभिनय करने वाले परेश भट्ट की टीम ने जो सृजन किया है, उसके लिए सचमुच कहा जा सकता हैः हर दर्शक को “भारत का लाड़ला दीनदयाल” अवश्य देखना चाहिए।
नाट्यलेखक प्रयाग दवे का लेखन नाटक का आधारस्तंभ है। दीनदयाल उपाध्याय के जीवनचरित्र, विचारों और विभिन्न पुस्तकों के माध्यम से किया गया गहरे संशोधन का नाटक के दृश्य-दृश्य और संवादों में अनुभव किया जा सकता है। प्रयाग केवल ऐतिहासिक जानकारी प्रस्तुत नहीं करते। वे दीनदयाल के विचारों की आत्मा को जीवंत करने का सच्चा प्रयास करते हैं। “एकात्म मानववाद,” “अंत्योदय,” “राष्ट्र की उन्नति के बिना व्यक्ति की उन्नति असंभव है,” जैसे विचारों को उन्होंने उपदेशात्मक बनाए बिना नाट्यरूप दिया है। इसके लिए प्रयाग अभिनंदन के पात्र हैं।
नाटक का सबसे शक्तिशाली पक्ष यह है कि वह राजनीतिक प्रचार जैसा नहीं लगता। यह नाटक विचारों की यात्रा है। कई जगह ऐसा महसूस होता है कि दर्शक केवल किसी पात्र को नहीं देख रहे। वे एक युग की विचारधारा को जीवंत होते देखने का साक्षात्कार कर रहे हैं।
अभिनेता परेश भट्ट का अभिनय नाटक की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। दीनदयाल के पात्र को उन्होंने शांति, गरिमा और आंतरिक तेज के साथ जीवंत किया है। उनका अभिनय इस वर्ष के श्रेष्ठ अभिनय में स्थान पाने जितना ईमानदार और दर्शनीय है। अक्सर जीवनचरित्र आधारित नाटकों में अभिनेता केवल व्यक्ति की नकल करते दिखाई देते हैं। यहाँ ऐसा बिल्कुल नहीं है। परेश उस सीमा को पार कर दीनदयाल के पात्र को एक अलग ही दुनिया तक ले जाते हैं। ऐसा करते हुए वे दर्शकों की उँगली थामकर, उनके हृदय पर स्नेहिल अधिकार स्थापित करते हुए, उन्हें भी नाटक में एकरस कर देते हैं। परेश दीनदयालजी के शारीरिक स्वरूप को नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा की गहराई को आत्मसात कर सके हैं।
कुछ दृश्यों में परेश भट्ट का मौन संवादों से भी अधिक प्रभावशाली बन जाता है। उनकी आँखों में दिखाई देने वाली राष्ट्रप्रेम की निष्ठा और आंतरिक संघर्ष दर्शकों को छू जाते हैं। रंगमंच पर अनेक प्रतिभाशाली कलाकार हैं। दीनदयाल को जीवंत करके परेश ने उस सूची में स्वयं को गौरवपूर्वक स्थापित किया है।
निर्देशक प्रितेश सोढ़ा… युवा और अत्यंत प्रतिभाशाली इस कलाकार की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। प्रितेश ने नाटक को अत्यंत संतुलित ढंग से आकार दिया है। विषय गंभीर और कम स्पर्शित होने के बावजूद उन्होंने उसे बोझिल या अपरिचित नहीं बनने दिया। उन्होंने दृश्यों की गति, प्रकाश व्यवस्था, संगीत और मंच सज्जा, हर बात में सावधानी रखी है। उसमें उनकी रंगमंचीय समझ और परिपक्वता स्पष्ट झलकती है। यही कारण है कि “भारत का लाड़ला दीनदयाल” एक अलग नाट्य अनुभूति बन जाता है।
हम जानते हैं कि रंगमंच को कई बार अनिच्छा से भी सुरक्षित और व्यावसायिक विषयों की ओर झुकना पड़ता है। “भारत का लाड़ला दीनदयाल” उस प्रकार का बहाव में बहकर बना हुआ नाटक नहीं है। यह उत्कृष्ट विचारों पर आधारित नाटक है। यह एक प्रशंसनीय नाट्य साहस है। इसके लिए निर्माता जश वीरा की प्रशंसा करना आवश्यक है। अपने पहले ही निर्माण में जश वीरा ने ऐसा अलग विषय दर्शकों को भेंट किया, यह उनके विज़न की विशेषता है। इसमें उनका आत्मविश्वास तो है ही, उससे भी बढ़कर रंगमंच के प्रति उनकी अडिग प्रतिबद्धता है।
क्रिएटिव निर्देशक मिहिर त्रिवेदी का संयोजन नाटक को विशेष ऊँचाई देता है। मंच पर विभिन्न दृश्यों के बीच का तालमेल, भावनात्मक परिवर्तन और दृश्यगति में उनकी समझ अनुभव की जा सकती है। प्रस्तुतकर्ता आसिफ पटेल का अनुभव नाटक को मजबूत आधार देता है और उसे दर्शकों तक उत्कृष्ट रूप से पहुँचाने में सहायक होगा।
“भारत का लाड़ला दीनदयाल” का विशेष महत्व इस बात में भी है कि वह “भारत” शब्द के वास्तविक अर्थ को समझने और समझाने का समर्पित प्रयास है। नाटक में राष्ट्रवाद आक्रामक नारे के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनकर हमारी आँखों में उतरता है। “भारत का लाड़ला दीनदयाल” एक ताज़गीभरा अध्याय है। विचारशील दर्शकों और गुणवत्ता के आग्रहियों के लिए यह अवश्य देखने योग्य है। उनके माध्यम से यह नाटक अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त करने के साथ-साथ अन्य दर्शकों तक भी पहुँचेगा। उत्कृष्ट विचारों और सच्चे मूल्यों से आंतरिक संवाद तक ले जाने वाले इस नाटक में मनोरंजन और मनोमंथन एक-दूसरे का हाथ थामकर समय के रथ पर सवारी करते हैं। “भारत का लाड़ला दीनदयाल” मनोरंजन परोसते हुए दर्शकों को मानो एक प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करता है… अपने देश की महानता के बारे में आप फिर से, सही तरीके से, कब सोचेंगे?
संक्षेप में, “भारत का लाड़ला दीनदयाल” रंगमंच पर जीवंत हुई एक अनुकरणीय विचारधारा है। यह आध्यात्मिक संवाद है, राष्ट्रभावना की गहन अनुभूति है।
सबसे महत्वपूर्ण बात कि “भारत का लाड़ला दीनदयाल” एक नहीं, बल्कि दो भाषाओं में प्रस्तुत किया गया है। यह दर्शाता है कि उसके सर्जक अपने सृजन और उसकी लोकस्वीकार्यता को लेकर कितने स्पष्ट हैं।
“भारत का लाड़ला दीनदयाल” का अगला प्रयोग मुंबई के रोयल ऑपेरा हाउस में, हिंदी में, शनिवार, 06 जून 2026 को शाम 07:30 बजे आयोजित होगा।
तो, परिवार समेत पहुँच जाइए, “भारत का लाड़ला दीनदयाल” देखने।
भारत का लाड़ला दीनदयाल
कलाकार एवं टीम
- बॅनरः वीरा एन्टरटेनमेन्ट्स एन्ड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड
- निर्माताः जश नीता प्रफुल वीरा
- निर्देशक: प्रितेश सोढ़ा
- लेखक: प्रयाग दवे
- क्रिएटिव निर्देशक: मिहिर त्रिवेदी
- संगीतः केयूर भगत (एसटूएम स्टडियोज़)
- विज्यूअल्सः हार्दिक कापडिया (फील्यूज़न्स)
- सहायक निर्देशकः कल्पित कालावडिया
- प्रस्तुति: आसिफ पटेल
कलाकार
- परेश भट्ट
- माहेक भट्ट
- ओमकार तिरोडकर
- अभिजित चित्रे
- प्रतीक शर्मा
- हेमांक्ष वैष्णव
- प्रतीक पटेल
- कृशन दोशी
- पार्थ सोनी
- अमीषा प्रधान
- राजदीप गढ़ेर
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