एक अपमान जिसने इतिहास बदल दिया

बात 1840 के दशक की है।

पुणे में एक ब्राह्मण मित्र की बारात निकल रही थी। जोतिबा फुले भी उस बारात में शामिल होने गए  एक दोस्त की खुशी में शामिल होने, जैसा कोई भी करता है।

लेकिन उस दोस्त के घरवालों ने जोतिबा को बीच रास्ते में रोक दिया।

कारण? उनकी जाति।

जोतिबा माली जाति से थे  तथाकथित “निचली जाति।” उन्हें साफ़ शब्दों में कह दिया गया कि वो बारात में नहीं चल सकते। उस दिन जो अपमान जोतिबा ने महसूस किया, वो किसी तलवार से कम नहीं था।

लेकिन जोतिबा फुले कोई साधारण इंसान नहीं थे।

उन्होंने उस अपमान का जवाब न लड़कर दिया, न चिल्लाकर  बल्कि पढ़कर, पढ़ाकर और सोच बदलकर।

 कौन थे जोतिबा फुले?

महात्मा जोतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंदराव फुले था और उनका परिवार माली समुदाय से था।

बचपन में पढ़ाई बीच में छूट गई। लेकिन उनके एक ब्राह्मण मित्र सदाशिव गोवंडे और एक ईसाई मिशनरी के प्रोत्साहन से उन्होंने दोबारा स्कॉटिश मिशन स्कूल, पुणे से अपनी पढ़ाई पूरी की।

जब उन्होंने थॉमस पेन की किताब “Rights of Man” पढ़ी तो उनके भीतर का विद्रोही जाग उठा।

उन्हें समझ आ गया 

“जो ज़ंजीर दिखती नहीं, वो सबसे मज़बूत होती है  और वो ज़ंजीर है अज्ञान।”

 वो काम जो किसी ने नहीं किया था

सन् 1848 में जोतिबा फुले ने वो कर दिखाया जो उस दौर के हिसाब से किसी क्रांति से कम नहीं था।

उन्होंने पुणे के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला।

उस ज़माने में लड़कियों का पढ़ना पाप माना जाता था। समाज ने विरोध किया, लोगों ने ताने दिए, यहाँ तक कि जोतिबा के पिता पर भी दबाव डाला गया।

लेकिन जोतिबा नहीं रुके।

उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले उस स्कूल की पहली शिक्षिका बनीं। जब सावित्रीबाई स्कूल जाती थीं, तो रास्ते में लोग उन पर गोबर और पत्थर फेंकते थे। वो एक अतिरिक्त साड़ी अपने थैले में रखकर चलती थीं  स्कूल पहुँचकर बदल लेती थीं।

यह जोड़ी टूटी नहीं। झुकी नहीं।

इसके बाद जोतिबा ने अछूत बच्चों के लिए भी स्कूल खोला  जो उस समय की सामाजिक व्यवस्था के मुँह पर एक करारा तमाचा था।

 जब एक कुएँ ने तोड़ी जाति की दीवार

सन् 1868 में जोतिबा फुले ने अपने घर का कुआँ अछूत समझे जाने वाले लोगों के लिए खोल दिया।

उस दौर में अछूतों को सार्वजनिक कुओं से पानी लेने की मनाही थी। उन्हें प्यासे रहना पड़ता था या बचा-खुचा पानी पीना पड़ता था।

जोतिबा का यह एक छोटा-सा कदम, असल में एक बहुत बड़ा संदेश था 

“मेरे घर में कोई ऊँचा-नीचा नहीं।”

कलम जो तलवार से तेज़ निकली

जोतिबा फुले सिर्फ काम करने वाले नहीं थे, वो लिखने वाले भी थे।

सन् 1873 में उन्होंने “गुलामगिरी” नामक किताब लिखी। इस किताब में उन्होंने जाति व्यवस्था को गुलामी के समान बताया। उन्होंने यह किताब उन अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों को समर्पित की जो अमेरिका में अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे थे यह दिखाता है कि उनकी सोच कितनी वैश्विक थी।

सन् 1881 में उन्होंने “शेतकऱ्याचा असूड” (किसान का कोड़ा) लिखी, जिसमें किसानों की दुर्दशा और उनके शोषण का पर्दाफाश किया।

उनकी कलम ने वो काम किया जो हज़ारों आंदोलन नहीं कर पाते।

 सत्यशोधक समाज  सच की तलाश

24 सितंबर 1873 को जोतिबा फुले ने “सत्यशोधक समाज” की स्थापना की।

इस संगठन का एक ही उद्देश्य था समाज को उस झूठ से आज़ाद करना जो सदियों से धर्म और जाति के नाम पर थोपा गया था।

सत्यशोधक समाज ने बिना पंडित-पुजारी के शादियाँ करवाईं। विधवाओं के पुनर्विवाह की वकालत की। और यह संदेश दिया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी बिचौलिए की ज़रूरत नहीं।

 “महात्मा” की उपाधि

सन् 1888 में मुंबई में एक बड़े सार्वजनिक सम्मान समारोह में विट्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर ने जोतिराव फुले को “महात्मा” की उपाधि दी।

यह उपाधि किसी सरकार ने नहीं दी, किसी राजा ने नहीं दी  यह दी उस जनता ने, जिसके लिए उन्होंने पूरी ज़िंदगी लगा दी।

 विदाई, लेकिन विचार अमर

28 नवंबर 1890 को महात्मा जोतिबा फुले इस दुनिया से चले गए।

लेकिन जाते-जाते वो एक ऐसी मशाल जला गए जो आज भी बुझी नहीं है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद माना था कि उनकी सोच पर जोतिबा फुले का गहरा प्रभाव था। फुले ने जो बीज बोए, उनके फल बाद की पीढ़ियों ने चखे।

आज के दौर में फुले की ज़रूरत

आज जब हम 199वीं जयंती मना रहे हैं, तो एक सवाल ज़रूर पूछना चाहिए

क्या हमने फुले का सपना पूरा किया?

जब तक देश में कोई बच्चा जाति की वजह से स्कूल से दूर है, जब तक कोई लड़की सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ पाती क्योंकि परिवार को उसकी पढ़ाई ज़रूरी नहीं लगती  तब तक फुले का काम अधूरा है।

और अधूरे काम को पूरा करना  यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

जोतिबा फुले ने कोई फ़ौज नहीं बनाई। कोई हिंसक आंदोलन नहीं किया। कोई सत्ता नहीं माँगी।

उन्होंने बस एक किताब उठाई, एक स्कूल बनाया, और एक सोच बदली।

और यही उन्हें भारत का असली विद्रोही बनाता है।

 आज, 11 अप्रैल 2026 को, महात्मा जोतिबा फुले की 199वीं जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।

“विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र टूट गए इतना अनर्थ एक अविद्या ने किया।”  महात्मा जोतिबा फुले

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