असम के करबी अंगलॉंग जिले में हाल ही में हुई हिंसा ने फिर एक बार स्थानीय भूमि और पहचान के मुद्दों को उभार दिया है। 23 दिसंबर 2025 को पश्चिम करबी अंगलॉंग के खेरोनी क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति तब उत्पन्न हुई जब जनजातीय समूहों ने गाँव के गेजिंग रिज़र्व्स (VGRs) और पेशेवर गेजिंग रिज़र्व्स (PGRs) में ‘बाहरी’ लोगों की उपस्थिति के विरोध में प्रदर्शन किया। इन दोनों प्रकार की जमीनों को सरकार ने खास सुरक्षा और जनजातीय अधिकारों के तहत रखा है।
हिंसा के दौरान दो लोगों की मृत्यु हुई। एक मृतक स्थानीय जनजातीय प्रदर्शनकारी था, जबकि दूसरा गैर-जनजातीय व्यक्ति था जो आग में फंसकर जल गया। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच भिड़ंत में 38 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिसमें एक आईपीएस अधिकारी भी शामिल थे। पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और रबर बुलेट का इस्तेमाल करते हुए स्थिति को काबू में करने की कोशिश की।
इस हिंसा ने इंटरनेट और संचार पर भी असर डाला। असम सरकार ने पश्चिम करबी अंगलॉंग और करबी अंगलॉंग जिलों में इंटरनेट सेवा अस्थायी रूप से बंद कर दी, ताकि अफवाहों और गलत सूचनाओं के फैलाव को रोका जा सके। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा कि प्रारंभिक हिंसा की वजह गलत जानकारी थी, जिसमें यह अफवाह फैली थी कि नौ लोग भूख हड़ताल के दौरान गिरफ्तार किए गए थे। वास्तविकता में उनकी सेहत खराब होने के कारण उन्हें गुवाहाटी लाया गया था।
करबी अंगलॉंग ऑटोनॉमस काउंसिल (KAAC) के अंतर्गत आने वाले ये जिले सिक्स्थ शेड्यूल के अंतर्गत आते हैं, जहाँ जनजातीय क्षेत्रों की विशेष प्रशासनिक और भूमि सुरक्षा व्यवस्था लागू है। इस विवाद ने स्थानीय प्रशासन और समुदाय के बीच लंबे समय से चल रही भूमि और पहचान की जटिलताओं को उजागर किया।
स्थानीय समुदायों और प्रशासन के बीच संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि प्रभावित क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए जाएंगे और सभी संबंधित पक्षों से बात कर स्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास किया जाएगा।
करबी अंगलॉंग की यह घटना केवल हिंसा का मामला नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि जमीन, अधिकार और पहचान के मुद्दे किस प्रकार स्थानीय समुदायों और प्रशासन के बीच संघर्ष का कारण बन सकते हैं। भविष्य में स्थायी समाधान के लिए संवाद, समझौता और संवैधानिक प्रावधानों का पालन अत्यंत आवश्यक है।
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