जब गैस सिलेंडर ने बदल दी रसोई की तस्वीर
मिडिल ईस्ट तनाव के बीच एलपीजी सिलेंडर की किल्लत ने भारत की रसोई को एक नई राह दिखाई इंडक्शन कुकटॉप की।
जब सिलेंडर की हो गई मारामारी
मार्च २०२६ में जब ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंचा, तब भारत के करोड़ों घर एक अलग ही तरह की चिंता में डूब गए एलपीजी गैस सिलेंडर मिलेगा या नहीं? मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में हलचल मचते ही, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और चेन्नई में लोगों ने एक साथ सिलेंडरों की बुकिंग शुरू कर दी। डीलरों के दरवाज़े पर भीड़ उमड़ पड़ी, हेल्पलाइनें जाम हो गईं।
सरकार ने तुरंत सामने आकर भरोसा दिलाया कि देश में एलपीजी की कोई कमी नहीं है। एक अहम बदलाव यह किया गया कि सिलेंडर बुकिंग का इंतज़ार अब २१ दिन से बढ़ाकर २५ दिन कर दिया गया, ताकि ज़रूरत से ज़्यादा जमाखोरी न हो। सरकार ने चेतावनी दी कि सिलेंडर जमाखोरी करने वालों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत ७ साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है।
“अगर किसी डीलर ने बुकिंग के बावजूद सिलेंडर देने से मना किया या अतिरिक्त पैसे मांगे, तो तुरंत शिकायत दर्ज करें ऐसी हरकत पूरी तरह गैरकानूनी है।” सरकारी अधिसूचना, मार्च २०२६
लेकिन इन सब सरकारी आश्वासनों के बावजूद लोगों का डर खत्म नहीं हुआ। और इसी डर ने भारत में एक नए उत्पाद की तलाश शुरू कर दी।
गैस सिलेंडर की मार से इंडक्शन कुकटॉप की बहार
जब भी गैस सिलेंडर की किल्लत होती है, एक उत्पाद हर बार खोज इंजन पर शीर्ष पर पहुंच जाता है इंडक्शन कुकटॉप। और इस बार भी वही हुआ। ऑनलाइन बाज़ारों पर इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया। बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स विक्रेताओं ने बताया कि कुछ शहरों में मांग सामान्य से कई गुना अधिक हो गई।
“हर बार जब एलपीजी संकट आता है, हमारे इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री रातोंरात दोगुनी हो जाती है। यह एक तय चलन बन गया है।” एक प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स विक्रेता, दिल्ली
यह महज़ एक संयोग नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकेत है। आईएमएआरसी समूह के अनुसार, भारत में इंडक्शन कुकटॉप का बाज़ार २०२४ में ७३.६७ करोड़ डॉलर का था, और २०३३ तक यह १५१.३६ करोड़ डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है यानी ८.३३ प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर।
इंडक्शन कुकटॉप: एक छोटी सी मशीन का बड़ा सफर
इंडक्शन पाककला की कहानी शुरू होती है १९०० के दशक के यूरोप से, जब वैज्ञानिकों ने विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के इस खाना पकाने के उपयोग के बारे में पहली बार सोचा। १९७० के दशक में अमेरिका की वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक निगम ने दुनिया का पहला व्यावसायिक इंडक्शन कुकटॉप बाज़ार में उतारा। यह एक अद्भुत यंत्र था ऊपर से ठंडा, लेकिन अंदर से खाना पकाने की पूरी ताक़त लिए हुए।
१९८० के दशक तक जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड के बड़े होटलों और रेस्तराँ में यह तकनीक आम हो गई थी। १९९० के दशक में जापान ने इसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए अपनाया। जापानी कंपनियों ने इंडक्शन को घर-घर पहुंचाने की कोशिश की।
“जापान में इंडक्शन कुकटॉप की सफलता ने दुनिया को दिखाया कि यह सिर्फ एक प्रयोगशाला की तकनीक नहीं, बल्कि आम रसोई की ज़रूरत बन सकती है।” रसोई उपकरण इतिहासकार, टोक्यो
भारत में इंडक्शन कुकटॉप की असली शुरुआत हुई २००० के दशक में, जब बजाज, फिलिप्स, हैवेल्स और प्रेस्टीज जैसी कंपनियों ने इस बाज़ार में कदम रखा। शुरुआत में यह शहरी मध्यम वर्ग का वैकल्पिक साधन था। लेकिन असली क्रांति आई २०१२–२०१४ के बीच।
भारत की रसोई में इंडक्शन क्रांति
२०१२–२०१४ में जब संप्रग सरकार के समय एलपीजी सिलेंडर की कीमत बार-बार बढ़ाई गई, तब भारत में इंडक्शन कुकटॉप की पहली असली तेज़ी आई। बाज़ार में ७०० रुपये से ५,००० रुपये तक के विकल्प मौजूद थे। ब्रांडों के बीच प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई कि तकनीक स्वाभाविक रूप से सस्ती होती गई।
२०२०–२१ में कोविड-१९ की महामारी के दौरान इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री एक करोड़ इकाई से ऊपर पहुंच गई। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, उस दौर में इस बाज़ार की मात्रा में १२ प्रतिशत से अधिक की वृद्धि रही।
“लॉकडाउन में जब हम घर पर थे और गैस सिलेंडर के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता था, तब मैंने पहली बार इंडक्शन खरीदा। आज यह मेरी रसोई का सबसे ज़रूरी हिस्सा है।” सविता देशपांडे, गृहिणी, पुणे
कैसे होती है यह जादुई पकाई?
इंडक्शन कुकटॉप की सतह के नीचे एक तांबे की कुंडली होती है जिसमें प्रत्यावर्ती विद्युत धारा डाली जाती है। यह धारा एक चुंबकीय क्षेत्र बनाती है। जब कोई लौहचुंबकीय बर्तन इस सतह पर रखा जाता है, तो चुंबकीय क्षेत्र बर्तन में भंवर धाराएं पैदा करता है इन्हीं धाराओं की वजह से बर्तन खुद ही गर्म होता है, न कि कुकटॉप की सतह। इसीलिए यदि आप बिना बर्तन रखे इस पर हाथ लगाएं, तो सतह बिल्कुल ठंडी रहती है।
ग्लेन उपकरण के अनुसार, इंडक्शन कुकटॉप ८५–९० प्रतिशत ऊर्जा को सीधे खाना पकाने में उपयोग करता है, जबकि गैस चूल्हे की दक्षता केवल ४०–५५ प्रतिशत होती है। छह कप पानी उबालने में गैस को जहाँ ८ मिनट लगते हैं, वहीं इंडक्शन यही काम ५ मिनट में कर देता है।
गैस बनाम इंडक्शन: एक नज़र में तुलना
| पहलू | गैस चूल्हा | इंडक्शन कुकटॉप |
|---|---|---|
| ऊर्जा दक्षता | ४०–५५ प्रतिशत | ८५–९० प्रतिशत |
| पानी उबालने का समय (६ कप) | लगभग ८ मिनट | लगभग ५ मिनट |
| मासिक लागत (औसत) | ₹१,२८०–१,८१८ | ₹७२०–१,१०० |
| सुरक्षा | खुली लौ का जोखिम | सतह ठंडी रहती है |
| सफाई | कठिन | बेहद आसान |
| तापमान नियंत्रण | अनुमान पर निर्भर | सटीक अंकीय नियंत्रण |
| बिजली जाने पर | काम करता है | बंद हो जाता है |
| परंपरागत बर्तन | सभी चलते हैं | केवल चुम्बकीय बर्तन |
स्रोत: ग्लेन उपकरण, क्रॉम्पटन, आईएमएआरसी समूह
फायदे भी हैं, चुनौतियां भी
इंडक्शन के फायदों की सूची लंबी है २०–५० प्रतिशत तेज़ पकाई, ठंडी सतह से सुरक्षा, आसान सफाई, सटीक तापमान नियंत्रण और कम मासिक खर्च औसतन ₹७२०–१,१०० बनाम गैस के ₹१,२८०–१,८१८।
लेकिन चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी सिर्फ सपाट तले वाले लौहचुंबकीय बर्तन काम करते हैं। पारंपरिक एल्युमीनियम की कड़ाही या मिट्टी के बर्तन सीधे इंडक्शन पर नहीं चलते। दूसरा बिजली पर निर्भरता। लेकिन अब बाज़ार में ऐसी आधार प्लेटें मिलती हैं जो पुराने बर्तनों को भी इंडक्शन के योग्य बना देती हैं।
आज: गैस और इंडक्शन दोनों साथ-साथ
आज भारत में अधिकांश शहरी घर एक मिश्रित व्यवस्था अपना रहे हैं एक तरफ गैस चूल्हा जो दाल-सब्ज़ी और रोटी के लिए है, दूसरी तरफ इंडक्शन जो चाय, दूध और झटपट नाश्ते के लिए। उत्तर और पश्चिम भारत में यह चलन सबसे ज़्यादा दिखता है। बाज़ार में अब बुद्धिमान इंडक्शन कुकटॉप आ गए हैं जो वाईफाई से जुड़ते हैं, पहले से तय पाककला विकल्प रखते हैं और आवाज़ के आदेश पर काम करते हैं।
“इंडक्शन अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है। हर एलपीजी मूल्य वृद्धि के साथ यह बाज़ार और मज़बूत होता जाता है।” रसोई उपकरण उद्योग विश्लेषक
ईरान-इज़राइल-अमेरिका तनाव ने भारत की रसोई तक अपनी आंच ज़रूर पहुंचाई, लेकिन इस आंच ने कुछ नई राहें भी रोशन कीं। आईएमएआरसी समूह की रिपोर्ट बताती है कि २०३३ तक भारत का इंडक्शन कुकटॉप बाज़ार १५१ करोड़ डॉलर से ऊपर पहुंच जाएगा। सिलेंडर की किल्लत ने आम इंसान को सोचने पर मजबूर किया कि क्या कोई और रास्ता है और इंडक्शन ने हाथ बढ़ाकर कहा: हाँ, मैं हूँ यहाँ।
शायद यही होती है तकनीकी प्रगति की असली कहानी ज़रूरत से जन्म लेती है क्रांति, और संकट में छुपा होता है समाधान।

