जिस मद्रास को हम आज चेन्नई के नाम से जानते हैं, कभी वह मद्रास के नाम से जाना जाता था। क्या आपको इसके पीछे की कहानी पता है? चलिए जानते हैं मद्रास से चेन्नई तक का सफर।
कहानी शुरू होती है 22 अगस्त 1639 से। इसी दिन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी फ्रांसिस डे ने स्थानीय नायक शासक दामरला वेंकटाद्री नायक से एक ज़मीन की डील की। यह ज़मीन दो छोटे गांवों की थी मद्रासपट्टनम और चेन्नापट्टनम। इसी डील के दस्तावेज़ पर दस्तखत चंद्रगिरी किले में हुए थे, जो आज के आंध्र प्रदेश में, तिरुपति के पास स्थित है।
इसी ज़मीन पर ब्रिटिशों ने बनाया फोर्ट सेंट जॉर्ज भारत में बना पहला ब्रिटिश किला। दिलचस्प बात यह है कि यही किला आज भी खड़ा है, और इसके अंदर आज तमिलनाडु विधानसभा चलती है। यानी जहां से कभी औपनिवेशिक भारत की शुरुआत हुई थी, वहीं से आज लोकतांत्रिक तमिलनाडु की सरकार भी चलती है।
अब आते हैं नाम की असली कहानी पर। जो ज़मीन खरीदी गई थी, वह असल में दो गांवों की थी। एक था मद्रासपट्टनम, जिससे “मद्रास” नाम निकला। दूसरा था चेन्नापट्टनम, जिसका नाम दामरला वेंकटाद्री नायक के पिता चेन्नप्पा नायक की याद में रखा गया था। समय के साथ दोनों गांव आपस में मिल गए, और दोनों की पहचान धुंधली पड़ने लगी।
ब्रिटिशों ने इनमें से “मद्रास” नाम को अपनाया, और यही नाम आधिकारिक तौर पर आगे बढ़ा। लेकिन स्थानीय लोग हमेशा इस शहर को “चेन्नापट्टनम” या “चेन्नापुरी” कहकर ही बुलाते रहे। यानी एक ही शहर की दो पहचानें सदियों तक साथ-साथ चलती रहीं एक कागज़ों में, दूसरी लोगों की ज़ुबान पर।
मद्रास नाम की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में आज भी मतभेद है। कुछ मानते हैं कि यह नाम पुर्तगाली मूल का है, जो “मद्रे दे सोइस” जैसे किसी शब्द से निकला हो सकता है। वहीं कुछ इतिहासकार इसे तमिल मूल का नाम भी मानते हैं। दिलचस्प विडंबना यह है कि जिस “चेन्नई” नाम को आज ज़्यादा भारतीय माना जाता है, उसकी जड़ें भी उतनी ही स्थानीय हैं जितनी मद्रास की बस इतिहास ने मद्रास को आगे बढ़ा दिया।
फोर्ट सेंट जॉर्ज के आसपास शहर धीरे-धीरे फैलने लगा। 1652 तक यह एक “प्रेसीडेंसी” के तौर पर मान्यता पा चुका था, यानी एक प्रशासनिक इकाई जिसे एक प्रेसिडेंट संभालता था। 1801 तक ब्रिटिश दक्षिण भारत के पूरी तरह मालिक बन चुके थे, और मद्रास उनकी प्रशासनिक और व्यापारिक राजधानी बन गया।
आज़ादी के बाद भी शहर का नाम मद्रास ही बना रहा, और यह मद्रास स्टेट यानी आज के तमिलनाडु की राजधानी बना रहा। बदलाव आया 17 जुलाई 1996 को, जब तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक तौर पर शहर का नाम मद्रास से बदलकर चेन्नई कर दिया। इसके पीछे मकसद था शहर की पहचान को औपनिवेशिक अतीत से अलग करना, क्योंकि मद्रास नाम को अक्सर पुर्तगाली-ब्रिटिश विरासत से जोड़कर देखा जाता था।
लेकिन नाम बदलने से शहर की भावना नहीं बदली। आज भी दुनिया भर में बसे लाखों लोग अपने शहर को प्यार से “मद्रास” ही बुलाते हैं। जैसा कि अक्सर कहा जाता है चेन्नई एक शहर है, लेकिन मद्रास एक एहसास है।
एक और दिलचस्प बात यह है कि मद्रास डे कोई सरकारी छुट्टी नहीं है, और न ही यह किसी सरकारी आदेश से शुरू हुआ था। यह उत्सव 2004 में शुरू हुआ, जब चेन्नई के दो पत्रकारों विंसेंट डिसूज़ा और शशि नायर ने इतिहासकार एस. मुथैया से बातचीत के दौरान यह सुझाव दिया कि शहर के इतिहास को सेलिब्रेट किया जाना चाहिए। इसके बाद मुथैया इस आयोजन के मुख्य संयोजक बने, और हर साल यह उत्सव बढ़ता गया। आज यह हेरिटेज वॉक, प्रदर्शनियों, क्विज़ और स्कूल-कॉलेज कार्यक्रमों के साथ हफ्तों तक मनाया जाता है बिना किसी सरकारी फरमान के, सिर्फ शहर के अपने लोगों के दम पर।
आज चेन्नई की पहचान भी बहुत कुछ बदल चुकी है। यह भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग का बड़ा केंद्र है, जिसकी वजह से इसे “डेट्रॉइट ऑफ इंडिया” भी कहा जाता है। साथ ही यह आईटी इंडस्ट्री, शास्त्रीय संगीत, भरतनाट्यम और मशहूर मरीना बीच के लिए भी जाना जाता है, जो दुनिया के सबसे लंबे समुद्र तटों में गिना जाता है। चेन्नई की नगर निगम व्यवस्था भी खास है यह भारत की सबसे पुरानी और लंदन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी नगर निगम मानी जाती है, जिसकी स्थापना 1866 में हुई थी।
मद्रास से चेन्नई तक का यह सफर सिर्फ एक नाम बदलने की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे शहर की कहानी है जिसने औपनिवेशिक शुरुआत से निकलकर अपनी खुद की पहचान गढ़ी, और आज भी अपने दो नामों एक दफ्तरी, एक भावनात्मक के साथ उतनी ही सहजता से जीता है। यही वजह है कि हर साल 22 अगस्त को, बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के, यह पूरा शहर अपने जन्मदिन का जश्न मनाता है।
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