प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब २५ फ़रवरी २०२६ को तेल अवीव पहुंचेंगे, तो वे महज़ एक कूटनीतिक एजेंडा लेकर नहीं जाएंगे। वे उस रिश्ते का बोझ भी साथ लाएंगे जो पिछले तीन दशकों में धीरे-धीरे, कभी चुपचाप और कभी विवादों के बीच, पकता रहा है। भारत सरकार इस यात्रा को ऐतिहासिक बता रही है। शब्द सटीक है। लेकिन अब यह शब्द थोड़ा घिसा हुआ भी लगता है।
किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह केवल दूसरी इज़रायल यात्रा होगी। पहली यात्रा भी मोदी ने ही की थी, २०१७ में, जब उन्होंने दशकों की कूटनीतिक सावधानी को तोड़ा था। वह यात्रा प्रतीकात्मक थी। इस बार की यात्रा से ठोस नतीजों की उम्मीद है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, क्वांटम तकनीक और नवाचार जैसे क्षेत्रों में कई समझौते होने की संभावना है। इज़रायल में भारत के राजदूत ने कहा है कि दोनों देश आतंकवाद पर एकमत हैं और अब रणनीतिक साझेदारी को नए मुकाम पर ले जाने का वक़्त आ गया है।
लेकिन यह तस्वीर इतनी सरल नहीं है। न भारत में, न इज़रायल में, और न ही उस पूरे क्षेत्र में जो इस यात्रा को बेचैनी के साथ देख रहा है।
पहचान में इतनी देर क्यों लगी?
भारत और इज़रायल के बीच १९४८ से ही आंशिक कूटनीतिक संपर्क था, लेकिन भारत ने दशकों तक इज़रायल को पूर्ण राजनयिक मान्यता नहीं दी। इसके पीछे की वजहें जटिल थीं और हमेशा सैद्धांतिक नहीं थीं। एक बड़ी आबादी मुस्लिम मतदाताओं की थी और सरकारें जानती थीं कि इज़रायल से नज़दीकी उन्हें चुनावी नुकसान पहुंचा सकती है। विदेश नीति कभी-कभी वोट गणित से तय होती थी, सिद्धांतों से नहीं।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संदर्भ में भारत ने अरब देशों और फ़िलिस्तीनी मुद्दे का पक्ष लिया। संयुक्त राष्ट्र में इज़रायल के ख़िलाफ़ मतदान अरब देशों को साथ रखने की एक रणनीति थी, न कि केवल वैचारिक प्रतिबद्धता।
लेकिन इस सब के बीच, पर्दे के पीछे एक व्यावहारिक ख़ुफ़िया रिश्ता बन रहा था। भारत की विदेश ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ और इज़रायल की मोसाद के बीच १९६० के दशक से ही संपर्क था। कश्मीर में उग्रवाद के दौर में, जब जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन सक्रिय थे, तब इज़रायली ख़ुफ़िया सहयोग की क़ीमत और स्पष्ट हो गई। और यह सब तब हो रहा था जब भारत की आधिकारिक कूटनीतिक स्थिति इज़रायल से दूरी बनाए रखने की थी। यह एक किस्म का दोहरापन था।
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने इस विरोधाभास को जनवरी १९९२ में खत्म किया और इज़रायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। सोवियत संघ का पतन हो चुका था, शीत युद्ध की रूपरेखा टूट रही थी और ओस्लो शांति प्रक्रिया चल रही थी। राव ने मौके का फ़ायदा उठाया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण विदेश नीति फ़ैसलों में से एक था।
शारोन की दिल्ली यात्रा
अगर १९९२ की मान्यता नींव थी, तो सितंबर २००३ में इज़रायली प्रधानमंत्री एरियल शारोन की भारत यात्रा उस पर खड़ी पहली बड़ी इमारत थी। शारोन इज़रायल के पहले प्रधानमंत्री थे जो भारत आए और यह उस समय जितना ध्यान पाने योग्य था, उससे कम चर्चा में रहा।
शारोन एक विवादास्पद व्यक्तित्व थे। साल २००० में अल-अक़्सा मस्जिद परिसर में उनके प्रवेश को कई विश्लेषक दूसरे इंतिफ़ादा की शुरुआत की एक वजह मानते हैं। अरब सरकारें नाख़ुश थीं। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आलोचनाओं को दरकिनार कर दिया। रक्षा और तकनीक सहयोग के फ़ायदे कूटनीतिक असुविधा से बड़े लगे। यह सवाल इस यात्रा पर भी उतना ही लागू होता है।
द्विपक्षीय रिश्ते की असली बुनावट
आज इज़रायल भारत के सबसे अहम रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। मानवरहित विमान, मिसाइल प्रणाली, निगरानी तकनीक और नौसैनिक उपकरण इस साझेदारी के हिस्से हैं। लेकिन जो बात अक्सर रक्षा और भू-राजनीति की चर्चा में दब जाती है, वह है कृषि के क्षेत्र में इज़रायल का योगदान।
भारत-इज़रायल कृषि परियोजना २००० के शुरुआती वर्षों में शुरू हुई और २०१२ के बाद इसका काफ़ी विस्तार हुआ। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए। नेगेव रेगिस्तान में विकसित टपक सिंचाई तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाकर किसानों तक पहुंचाया गया। राजस्थान में हज़ारों किसानों ने यह तकनीक अपनाई, पानी की खपत कम हुई और उत्पादन बढ़ा। यह उस किस्म का व्यावहारिक सहयोग है जो लोगों की ज़िंदगी में सीधा फ़र्क़ डालता है।
साइबर सुरक्षा के मोर्चे पर भी दोनों देशों के बीच सहयोग ठोस रहा है। २०१७ में साइबर सहयोग समझौते के बाद दोनों देशों ने ख़तरे की जानकारी साझा करने और राज्य-प्रायोजित साइबर हमलों से निपटने के लिए मिलकर काम किया है।
द्विपक्षीय व्यापार हाल के वर्षों में लगभग ४७,००० करोड़ रुपये के आसपास रहा है। आंकड़े भारत के बड़े व्यापारिक रिश्तों की तुलना में बहुत बड़े नहीं हैं, लेकिन जो चीज़ें बदली जा रही हैं, ख़ासकर तकनीक के मोर्चे पर, वे संख्याओं से ज़्यादा अहमियत रखती हैं।
वक़्त पर सवाल
यहीं से यात्रा जटिल होती है।
मध्य पूर्व अभी भी अस्थिर है। ग़ज़ा संघर्ष लंबा खिंचा है और उसकी मानवीय क़ीमत अनुमान से कहीं अधिक रही है। भारत की एक संसदीय समिति ने इस यात्रा के समय पर औपचारिक सवाल उठाए हैं। चिंता यात्रा को लेकर नहीं बल्कि इसके संदेश को लेकर है। जब कोई बड़ा लोकतंत्र इज़रायल की इस तरह उच्चस्तरीय यात्रा करे और क्षेत्र अस्थिर हो, तो यह संकेत देश की वास्तविक कूटनीतिक स्थिति के बारे में कुछ कहता है।
फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण ने कूटनीतिक चैनलों के ज़रिए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है। उसका तर्क है कि बिना ग़ज़ा पर दबाव बनाए इज़रायल की यात्रा करना एक तरह की मौन स्वीकृति है। भारत इस व्याख्या से असहमत होगा, लेकिन यह व्याख्या हो रही है और नई दिल्ली को इसका पता है।
अरब दुनिया एकजुट नहीं है
यह मान लेना कि पूरी अरब और मुस्लिम दुनिया एक सुर में बोलती है, एक बड़ी भूल है।
संयुक्त अरब अमीरात ने २०२० में अब्राहम समझौतों के तहत इज़रायल से संबंध सामान्य कर लिए। बहरीन, मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए। मिस्र और जॉर्डन के साथ इज़रायल की क्रमशः १९७९ और १९९४ से शांति संधि है। सऊदी अरब ने औपचारिक सामान्यीकरण नहीं किया है लेकिन दोनों देशों के बीच परोक्ष व्यापार और पर्दे के पीछे की कूटनीति जगज़ाहिर है। क़तर ने ग़ज़ा बंधक वार्ता में इज़रायल के साथ सीधी भूमिका निभाई है।
भारत भी ऐसी ही गणनाएं कर रहा है। अंतर यह है कि भारत पर सार्वजनिक नज़र ज़्यादा है, उसका एक मुखर घरेलू वर्ग है और फ़िलिस्तीनी समर्थन की लंबी आधिकारिक परंपरा है जिससे इस दिशा में आगे बढ़ना बिना विरोधाभास के मुश्किल हो जाता है।
इज़रायल में विपक्ष क्या कह रहा है
इज़रायल में भी मोदी की आने वाली यात्रा सियासी रंग लिए है। पूर्व प्रधानमंत्री याइर लापिड और नेशनल यूनिटी ब्लॉक के नेताओं ने यात्रा का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही नेतन्याहू सरकार की अप्रत्यक्ष आलोचना भी की है। कुछ विपक्षी नेताओं का तर्क है कि ऐसी यात्राएं नेतन्याहू को घरेलू राजनीतिक फ़ायदा देंगी, जबकि वे पहले से ही कानूनी विवादों में घिरे हैं। इज़रायली नागरिक समाज के कुछ हिस्से, ख़ासकर शांति-समर्थक वर्ग, ग़ज़ा की मानवीय स्थिति के मद्देनज़र इस यात्रा पर असहज हैं।
इससे यात्रा रुकेगी नहीं, लेकिन यह एक परत जोड़ती है जिसे साधारण द्विपक्षीय आख्यान अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है।
हकाबी का बयान और नई मुश्किल
इसी माहौल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी का एक बयान आया जिसने कई सरकारों को असहज कर दिया। हकाबी ने एक साक्षात्कार में कहा कि इज़रायल का मध्य पूर्व के विस्तृत इलाके पर बाइबिल-आधारित अधिकार है। यह कोई अकादमिक टिप्पणी नहीं थी क्योंकि यह एक अमेरिकी राजदूत के मुंह से निकली थी।
अरब सरकारों को सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देने पर मजबूर होना पड़ा। फ़िलिस्तीनी नेतृत्व ने बयान को सिरे से नकार दिया। यूरोपीय सरकारों ने असुविधा जताई। संयुक्त राष्ट्र ने दोहराया कि क्षेत्रीय विवाद अंतरराष्ट्रीय क़ानून के ढांचे में सुलझाए जाने चाहिए।
भारत के लिए मुश्किल यह है कि वह अमेरिका, इज़रायल और अरब देशों, तीनों के साथ एक साथ संबंध चलाता है। इस तरह के बयान हर सरकार को पक्ष लेने के लिए मजबूर करते हैं और चुप्पी भी एक पक्ष होती है। नई दिल्ली ने हकाबी के बयान पर अब तक सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है। यह चुप्पी रामल्लाह में ही नहीं, और भी कई जगह नोट की जाएगी।
ट्रंप की ग़ज़ा योजना
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग़ज़ा को लेकर जो फ्रेमवर्क सामने रखा है उसे शांति बोर्ड कहा जा रहा है। इसमें फ़िलिस्तीनियों के बड़े पैमाने पर विस्थापन और ग़ज़ा के पुनर्निर्माण की बात है। मिस्र और जॉर्डन ने फ़िलिस्तीनियों को अपने यहां बसाने से साफ़ इनकार किया है। अरब देशों, यूरोपीय सरकारों और संयुक्त राष्ट्र ने इस पर आपत्ति जताई है।
भारत ने औपचारिक रूप से इस योजना का समर्थन नहीं किया है और दो-राज्य समाधान की बात दोहराई है। लेकिन अमेरिका और इज़रायल के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकी का मतलब है कि ग़ज़ा के पुनर्निर्माण या स्थिरीकरण में भागीदारी का सवाल एक दिन नई दिल्ली के दरवाज़े पर आएगा। भारत की प्रतिक्रिया यह बताएगी कि वह वैश्विक नेतृत्व की अपनी आकांक्षाओं को कितनी गंभीरता से लेता है।
घरेलू राजनीति का कोण
देश के भीतर यह यात्रा विदेश नीति और राजनीतिक पहचान के चौराहे पर खड़ी है।
कांग्रेस पार्टी ने, जिसने १९९२ में इज़रायल के साथ संबंध स्थापित किए थे, अब विपक्ष की कुर्सी से इस यात्रा के वक़्त और उसके संदेश पर सवाल उठाए हैं। इसमें कुछ राजनीतिक पोज़िशनिंग भी है, यह सच है। लेकिन बुनियादी सवाल बेकार नहीं हैं। क्या भारत ने चुपचाप फ़िलिस्तीनी राजकीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कम कर ली है? क्या यह यात्रा रणनीतिक कारणों से उतनी ही की जा रही है जितनी घरेलू दर्शकों के लिए? इन सवालों का जवाब सरकार ने अभी तक स्पष्ट रूप से नहीं दिया है।
तो भारत को मिलेगा क्या?
सारी बहस और टिप्पणियों को परे रखें तो यात्रा की वजह साफ़ है।
भारत को तकनीक चाहिए। उसे रक्षा साझेदारियां चाहिए जो किसी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भर न हों। इज़रायल उन चीज़ों की पेशकश करता है जो कम देश कर सकते हैं: अत्याधुनिक सैन्य तकनीक, कृषि नवाचार और साइबर सुरक्षा में वास्तविक विशेषज्ञता। पिछले दो दशकों में इस साझेदारी ने भारत की क्षमताओं में ठोस सुधार किए हैं।
इस यात्रा में हस्ताक्षरित होने वाले समझौते सजावटी नहीं होंगे। वे नतीजे देने के लिए बनाए जाएंगे। हालांकि क्रियान्वयन कभी-कभी इस रिश्ते का कमज़ोर पहलू रहा है, दोनों तरफ़ से।
एक चौराहे पर रिश्ता
मोदी की इज़रायल यात्रा ऐसे वक़्त में आ रही है जब हर कूटनीतिक संकेत को असामान्य सावधानी से पढ़ा जा रहा है। भारत ने दशकों तक एक ऐसी विदेश नीति बनाई जो विकल्प खुले रखे। वह इज़रायल से हथियार ख़रीदे और संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीनी अधिकारों के लिए मतदान करे। वह वाशिंगटन के साथ क़रीब आए लेकिन किसी गठबंधन में औपचारिक रूप से शामिल न हो। यह सोच-समझकर बनाई गई अस्पष्टता अभी जितने दबाव में है, उतने में पहले शायद ही कभी रही हो।
यात्रा को रणनीतिक और आर्थिक आधार पर उचित ठहराया जा सकता है और वे तर्क कमज़ोर नहीं हैं। इसके समय पर उठाए गए सवाल भी वास्तविक हैं और वे जाने वाले नहीं हैं। दोनों बातें एक साथ सच हैं। यह तनाव भारत की विदेश नीति की विफलता नहीं है बल्कि इस बात का प्रतिबिंब है कि दुनिया कितनी जटिल हो गई है।
भारत को इस यात्रा के फ़ायदे और उसके अनुत्तरित सवाल, दोनों के साथ जीना होगा। और यह सब सबके सामने, उस दर्शक वर्ग के सामने जो पहले से कहीं ज़्यादा ध्यान दे रहा है।
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