कुछ साल पहले तक सोशल मीडिया पर लोग मजेदार वीडियो, डांस, खाना, यात्रा और दोस्तों के साथ बिताए पलों को शेयर करते थे। इंटरनेट मनोरंजन और जानकारी का एक साधन माना जाता था। लेकिन अब सोशल मीडिया की दुनिया तेजी से बदल रही है। आज इंटरनेट पर गुस्सा, झगड़ा, अपमान और लोगों को परेशान करने वाले वीडियो सबसे ज्यादा वायरल हो रहे हैं।

धीरे धीरे एक नया ट्रेंड सामने आया है जिसे “रेजबेट कंटेंट” कहा जाता है। इसका मतलब है ऐसा कंटेंट जो लोगों को जानबूझकर गुस्सा दिलाए ताकि वे ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया दें। जितना ज्यादा विवाद होगा, उतने ज्यादा व्यूज, कमेंट और शेयर मिलेंगे। यही वजह है कि अब कई लोग सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए किसी को भी कैमरे के सामने शर्मिंदा करने से पीछे नहीं हटते।

आज इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर ऐसे वीडियो की भरमार है जहां लोग सार्वजनिक जगहों पर अजनबियों को परेशान करते दिखाई देते हैं। कोई किसी का मजाक उड़ाता है, कोई दुकानदारों को उकसाता है, तो कोई जानबूझकर लड़ाई शुरू करने की कोशिश करता है। कई बार लोगों की अनुमति के बिना उनके वीडियो रिकॉर्ड किए जाते हैं और फिर उन्हें लाखों लोगों के सामने मनोरंजन के तौर पर पेश किया जाता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब यह सब सामान्य होता जा रहा है।

पहले प्रैंक वीडियो हल्के फुल्के मजाक तक सीमित होते थे। उनका उद्देश्य लोगों को हंसाना होता था। लेकिन अब इंटरनेट पर “कंटेंट” के नाम पर लोगों की बेइज्जती करना, उन्हें मानसिक रूप से परेशान करना और उनकी भावनाओं का मजाक उड़ाना आम बात बन चुकी है।

सोशल मीडिया एल्गोरिदम भी इस समस्या को और बढ़ा रहे हैं। जिन वीडियो पर ज्यादा लोग गुस्सा दिखाते हैं, बहस करते हैं या कमेंट करते हैं, वे तेजी से वायरल हो जाते हैं। प्लेटफॉर्म के लिए हर प्रतिक्रिया “एंगेजमेंट” है। इसका मतलब है कि चाहे लोग वीडियो को पसंद करें या नफरत, दोनों ही स्थितियों में उस वीडियो की पहुंच बढ़ती है।

यही कारण है कि कई कंटेंट क्रिएटर्स अब जानबूझकर विवाद पैदा करते हैं।

कुछ वीडियो में गरीब लोगों का मजाक बनाया जाता है। कुछ में महिलाओं को असहज स्थिति में डालने की कोशिश की जाती है। कहीं कर्मचारियों को अपमानित किया जाता है तो कहीं सड़क पर चल रहे आम लोगों को परेशान किया जाता है। कई बार यह सब सिर्फ कैमरे के सामने “फनी कंटेंट” बनाने के लिए किया जाता है।

इंटरनेट पर वायरल होने की यह भूख अब इंसानियत से बड़ी होती जा रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि लगातार ऐसे वीडियो देखने से लोगों की संवेदनशीलता कम हो सकती है। जब रोजाना स्क्रीन पर अपमान, चीखना, गाली गलौज और सार्वजनिक बेइज्जती को मनोरंजन की तरह दिखाया जाता है, तो धीरे धीरे लोग उसे सामान्य मानने लगते हैं। इससे सहानुभूति कम होती है और ऑनलाइन व्यवहार अधिक आक्रामक बन सकता है।

इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं और किशोरों पर पड़ रहा है।

आज कई युवा कंटेंट क्रिएटर्स जल्दी वायरल होने का दबाव महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि साधारण वीडियो से लोकप्रियता नहीं मिलेगी। इसलिए वे ज्यादा शॉकिंग, ज्यादा विवादित और ज्यादा आक्रामक कंटेंट बनाने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग दूसरों को परेशान करके खुद को “बोल्ड” या “फियरलेस” दिखाना चाहते हैं।

सोशल मीडिया पर फेम पाने की यह दौड़ कई बार खतरनाक भी साबित होती है।

कई मामलों में ऐसे प्रैंक और रेजबेट वीडियो असली झगड़ों में बदल चुके हैं। लोगों के बीच हिंसा तक हुई है। कुछ कंटेंट क्रिएटर्स पर कानूनी कार्रवाई भी हुई है। इसके बावजूद यह ट्रेंड रुकता दिखाई नहीं देता क्योंकि विवादित कंटेंट अभी भी सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है।

एक और बड़ी समस्या यह है कि अब लोग वास्तविक भावनाओं और मनोरंजन के बीच का फर्क भूलते जा रहे हैं। किसी की शर्मिंदगी, डर या गुस्से को कैमरे में रिकॉर्ड करके लाखों लोगों तक पहुंचाना अब कई लोगों को “एंटरटेनमेंट” लगने लगा है।

यह केवल कंटेंट क्रिएटर्स की समस्या नहीं है। दर्शकों की भी इसमें बड़ी भूमिका है।

जब लोग ऐसे वीडियो को लाखों व्यूज देते हैं, उन्हें शेयर करते हैं और मजेदार मानते हैं, तब इस तरह के कंटेंट को और बढ़ावा मिलता है। सोशल मीडिया वही दिखाता है जिसे लोग सबसे ज्यादा देखते हैं। अगर गुस्सा और ड्रामा सबसे ज्यादा देखा जाएगा, तो प्लेटफॉर्म उसी तरह के वीडियो आगे बढ़ाएंगे।

हालांकि इंटरनेट पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। सोशल मीडिया ने कई लोगों को अपनी कला दिखाने, सीखने और सकारात्मक बदलाव लाने का मौका भी दिया है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब लोकप्रियता इंसानियत से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल दुनिया में जिम्मेदारी की जरूरत पहले से ज्यादा बढ़ गई है। लोगों को यह समझना होगा कि हर वायरल वीडियो harmless नहीं होता। ऑनलाइन कंटेंट का असर असली जिंदगी पर भी पड़ता है।

आज जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, कंटेंट क्रिएटर्स और दर्शक तीनों अपनी जिम्मेदारी समझें। इंटरनेट मनोरंजन का माध्यम जरूर है, लेकिन अगर मनोरंजन किसी की बेइज्जती और मानसिक परेशानी पर आधारित हो, तो यह केवल कंटेंट नहीं बल्कि एक खतरनाक सामाजिक प्रवृत्ति बन सकता है।

गुस्सा, ड्रामा और अपमान शायद कुछ सेकंड के लिए वायरल हो जाएं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम धीरे धीरे ऐसे इंटरनेट की तरफ बढ़ रहे हैं जहां संवेदनाएं पीछे छूटती जा रही हैं?

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