अगर आप पहली बार वोटर बनने जा रहे हैं, तो अब सिर्फ अपनी जानकारी देना काफी नहीं होगा।

चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए भरे जाने वाले फॉर्म 6 में एक नई शर्त जोड़ दी है। अब नए आवेदकों को अपने माता-पिता से जुड़ी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR की जानकारी भी देनी होगी।

चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक, यह सिर्फ उन मौजूदा वोटरों पर लागू नहीं है जिनका नाम पिछली SIR प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाया था। हर नए आवेदक को भी यह जानकारी देनी होगी।

यह घोषणा फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई है। बिना इसे भरे ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ता।

क्या जानकारी देनी होगी

आवेदक को बताना होगा कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली वोटर लिस्ट में शामिल था।

अगर हां, तो विधानसभा क्षेत्र, पोलिंग बूथ यानी पार्ट नंबर, और सीरियल नंबर की जानकारी देनी होगी। यह वही नंबर है जिसके तहत उनका नाम सूची में दर्ज है।

अगर माता-पिता का नाम पिछली SIR में शामिल नहीं था, तो उनका नाम देना होगा। साथ ही, अगर उपलब्ध हो तो उनका EPIC यानी वोटर आईडी नंबर भी देना होगा।

जिन आवेदकों के पास न तो अपनी और न ही माता-पिता या दादा-दादी की SIR जानकारी है, उनके लिए एक तीसरा विकल्प भी रखा गया है। हालांकि इसे चुनने पर आगे क्या प्रक्रिया होगी, इसे लेकर अभी स्पष्टता नहीं है।

यह शर्त पहली बार कब आई

चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि यह घोषणा सबसे पहले पिछले साल जून में बिहार की SIR प्रक्रिया के दौरान जोड़ी गई थी।

उस समय भी नए वोटरों को फॉर्म 6 के साथ यह घोषणा भरनी पड़ती थी। बिहार की रोजाना जारी होने वाली SIR बुलेटिन में यह साफ दिखता था कि फॉर्म के साथ घोषणा भी भरी जा रही थी।

अब यही व्यवस्था बाकी राज्यों में भी लागू कर दी गई है।

कानूनी पेच क्या है

अधिकारियों ने साफ किया है कि यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक निर्देश के जरिए किया गया है। फॉर्म 6 में कोई औपचारिक संशोधन नहीं हुआ है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि फॉर्म 6 का प्रारूप कानून के तहत तय होता है। इसे बदलने के लिए केंद्र सरकार की अधिसूचना और आधिकारिक गजट में संशोधन जरूरी होता है।

अभी तक ऐसी कोई अधिसूचना सार्वजनिक रूप से जारी नहीं हुई है। यानी नियम में बदलाव तो हो चुका है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अब भी अधूरी है।

आयोग का तर्क क्या है

चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का मकसद वोटरों के परिवारों को आपस में जोड़ना है। साथ ही सत्यापन को आसान बनाना भी इसका उद्देश्य है।

एक अधिकारी ने बताया कि इससे नए वोटरों को कम दस्तावेज जमा करने पड़ेंगे। माता-पिता की जानकारी से ही उनकी पहचान की पुष्टि हो सकेगी।

SIR को लेकर पहले से विवाद

चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का भी जवाब दिया है। आयोग ने कहा है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और संवैधानिक है, और इसे सुप्रीम कोर्ट का भी समर्थन प्राप्त है।

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर्स ने भारत सरकार को लिखे एक पत्र में SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को लेकर चिंता जताई थी।

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम सहित कुछ इलाकों में अल्पसंख्यक वोटरों के नाम बड़ी संख्या में हटाए जाने के आरोप भी लगे थे। इस पर चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा कि वोटरों को अपने नाम हटाए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने का पूरा मौका दिया गया था। आयोग ने किसी तरह के पक्षपात से इनकार किया।

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का मकसद देश के सभी योग्य नागरिकों को वोटर लिस्ट में शामिल करना है। साथ ही डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और अवैध वोटरों के नाम सूची से हटाना भी इसका मकसद है।

नए वोटरों के लिए इसका मतलब

18 साल के होने पर पहली बार वोटर बनने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए यह बदलाव सीधा असर डालने वाला है।

अब तक सिर्फ अपनी उम्र और पते का प्रमाण देना काफी होता था। अब माता-पिता के पुराने वोटर रिकॉर्ड की जानकारी जुटाना भी जरूरी हो गया है।

जिन परिवारों के पास यह जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं है, उनके लिए यह प्रक्रिया थोड़ी उलझी हुई साबित हो सकती है।

फिलहाल यह साफ नहीं है कि तीसरे विकल्प के तहत घोषणा करने वाले आवेदकों के फॉर्म का आगे क्या होगा। चुनाव आयोग की तरफ से इस पर अभी कोई सफाई नहीं आई है।

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